‘ना?’
‘संडास तो है? ‘
‘सबसे पहले वह वहीं जाएँगे।’
‘अच्छा, यह सामने कोठी कैसी है?’
‘हां, है तो, लेकिन कहीं खोलकर देखा तो?’
‘क्या बहुत डबल आदमी है?’
‘तुम-जैसे दो को बगल दबा ले।’
‘तो खोल दो कोठरी। वह ज्यों ही अंदर आएगा, मैं दरवाजा खोलकर निकल भागूँगा।’
हसीना ने कोठरी खोल दी। मैं अंदर जा घुसा। दरवाजा फिर बंद हो गया। मुझे कोठरी में बंद करके हसीना ने जाकर दरवाजा खोला और बोली- ‘क्यों किवाड़ तोड़े डालते हो? आ तो रही हूँ।’
मैंने कोठरी के किवाड़ों के दराजों से देखा। आदमी क्या, पूरा देव था। अंदर आते ही बोला- ‘तुम सरेशाम से सो गई थीं।’
‘हां, जरा आंख लग गई थी।’
‘मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा था, तुम किसी से बातें कर रही हो।’
वहम की दवा तो लुकमान के पास भी नहीं।’
‘मैंने साफ सुना। कोई-न-कोई था जरूर। तुमने उसे कहीं छिपा रखा है।’
‘इन्हीं बातों पर तुमसे मेरा जी जलता है। सारा घर तो पड़ा है, देख क्यों नहीं लेते।’
‘देखूँगा तो मैं जरूर ही, लेकिन तुमसे सीधे-सीधे पूछता हूँ बतला दो, कौन था?’
हसीना ने कुंजियों का गुच्छा फेंकते कहा- अगर कोई था तो घर ही में न होगा। लो, सब जगह देख आओ। सुई तो है नहीं कि मैंने कहीं छिपा दी हो।
यह शैतान इन चकमों में न आया। शायद पहले भी ऐसा ही चटका खा चुका था। कुंजियों का गुच्छा उठाकर सबसे पहले मेरी कोठरी के द्वार पर आया और उसके ताले को खोलने की कोशिश करने लगा। गुच्छे में उस ताले की कुंजी न थी। बोला- ‘इस कोठरी की कुंजी कहां है?
हसीना ने बनावटी ताज्जुब से कहा- ‘अरे, तो क्या उसमें कोई छिपा बैठा है? यह तो लकड़ियों से भरी पड़ी है।’
‘तुम कुंजी दे दो न।’
‘तुम कभी-कभी पागलों के-से काम करने लगते हो। अंधेरे में कोई साँप-बिच्छू निकल आये तो? न भैया, मैं उसकी कुंजी न दूंगी।’
‘बला से सौंप निकल आएगा। अच्छा ही हो, निकल आये। इस बेहयाई की जिंदगी से तो मौत ही अच्छी।’
हसीना ने इधर-उधर तलाश करके कहा- ‘न जाने, उसकी कुंजी कहां रख दी। खयाल नहीं आता।’
‘इस कोठरी में तो मैंने कभी ताला नहीं देखा।’
‘मैं तो रोज लगाती हूँ। शाम कभी लगाना भूल गयी हूं तो नहीं कह सकती।’
‘तो तुम कुंजी न दोगी?’
‘कहती तो हूँ इस वक्त तो नहीं मिल रही है।’
‘कहे देता हूँ कच्चा ही खा जाऊंगा।’
अब तक तो मैं किसी तरह जब्त किए खड़ा रहा। बार-बार अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था कि यहाँ क्यों आया। न जाने, यह शैतान कैसे पेश आए। कहीं तैश में आकर मार ही न डाले। मेरे हाथों में तो कोई छुरी भी नहीं। या खुदा अब तू ही मालिक है। दम रोके हुए खड़ा था कि एक पल का भी मौका मिले तो निकल भागूं, लेकिन अब उस मरदूद ने किवाड़ों को जोर से धमधमाना शुरू किया, तब तो रूह ही फना हो गई। इधर-उधर निगाह डाली कि किसी कोने में छिपने की जगह है या नहीं। किवाड़ की दराजों से कुछ रोशनी आ रही थी। ऊपर जो निगाह डाली, तो एक मचान-सा दिखाई दिया। डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। उचक कर चाहता था कि ऊपर चढ़ जाऊँ कि मचान पर एक आदमी को बैठे देखकर उस हालत में भी मेरे मुँह से चीख निकल आयी। हजरत अचकन पहने, घड़ी लगाए, एक खूबसूरत साफा बाँधे, उकड़ूं बैठे हुए थे। अब मुझे मालूम हुआ कि मेरे लिए दरवाजा खोलने में हसीना ने क्यों इतनी देर की थी। अभी उनको देख ही रहा था कि दरवाजे पर मूसल की चोटें पड़ने लगीं। मामूली किवाड़ तो थे ही, तीन-चार चोटों में दोनों किवाड़ नीचे आ रहे, और यह मरदूद लालटेन लिये कमरे में घुसा। उस वक्त मेरी क्या हालत थी, इसका अन्दाज आप खुद कर सकते हैं। उसने मुझे देखते ही लालटेन रख दी और मेरी गर्दन पकड़कर बोला- ‘अच्छा, आप यहाँ तशरीफ रखते हैं। आइए आपकी कुछ खातिर करूँ। ऐसे मेहमान रोज कहां मिलते हैं?’
यह कहते हुए उसने मेरा एक हाथ पकड़कर इतने जोर से बाहर की तरफ धकेला कि मैं आंगन में औंधा जा गिरा। उस शैतान की आँखों से अंगारे निकल रहे थे। मालूम होता था, उसके होंठ मेरा खून पीने के लिए बढ़े चले आ रहे हैं। मैं अभी जमीन से उठ भी न पाया था कि वह कसाई एक बड़ा सा तेज छुरा लिये मेरी गर्दन पर आ पहुँचा। मगर जनाब, हूँ पुलिस का आदमी। उस वक्त मुझे एक चाल सूझ गयी। उसने मेरी जान बचा ली, वरना आज आपके साथ ताँगे पर न बैठा होता। मैंने हाथ जोड़कर कहा- हुजूर, मैं बिलकुल बेकसूर हूँ। मैं तो मीर साहब के साथ आया था।
उसने गरज कर पूछा–‘कौन मीर साहब?’
मैंने जी कड़ा करके कहा- ‘यह जो मचान पर बैठे हुए हैं। मैं तो हुजूर का गुलाम ठहरा, जहाँ हुक्म पाऊंगा, आपके साथ जाऊंगा । मेरी इसमें क्या खता है?’
‘अच्छा, तो कोई मीर साहब भी मचान पर तशरीफ रखते हैं?’
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कोठरी में जाकर मचान पर देखा। वह हजरत सिमटे-सिमटाए, भीगी बिन्नी बने बैठे थे। चेहरा ऐसा पीला पड़ गया था, गोया बदन में जान ही नहीं।
‘तू कौन है।’
‘जी, मैं-मेरा मकान, यह आदमी झूठ बोलता है, यह मेरा नौकर नहीं है।’
‘तू यहाँ क्या करने आया था?’
‘मुझे यही बदमाश (मेरी तरफ देखकर) धोखा देकर लाया था।’
‘यह क्यों नहीं कहता कि मजे उड़ाने आया था। दूसरों पर इल्जाम रखकर अपनी जान बचाना चाहता है, सुअर? ले, तू भी क्या समझेगा कि किसके पाले पड़ा था।’
यह कहकर उसने उसी तेज छुरे से उन साहब की नाक काट ली। मैं मौका पाकर बेतहाशा भागा लेकिन हाय-हाय की आवाज मेरे कानों में आ रही थी। इसके बाद उन दोनों में कैसी छनी, हसीना के सिर पर क्या आफत आयी, इसकी मुझे कुछ खबर नहीं। मैं तब से बीसों बार सदर आ चुका हूँ पर उधर भूलकर भी नहीं गया। यह पत्थर फेंकने वाले हजरत वहीं हैं, जिनकी नाक कटी थी। आज न जाने कहां से दिखाई पड़ गए और मेरी शामत आयी कि उन्हें सलाम कर बैठा। आपने उनकी नाक की तरफ शायद खयाल नहीं किया।
मुझे अब खयाल आया कि उस आदमी की नाक कुछ चिपटी थी। बोला- हां नाक कुछ चपटी तो थी। मगर आपने उस गरीब बुरा फंसा दिया। ‘और करता ही क्या?’
‘आप दोनों मिलकर उस आदमी को क्या न दबा लेते?’
‘दबा लेते, मगर चोर का दिल आधा होता है। उस वक्त अपनी-अपनी पड़ी थी कि मुकाबला करने की सूझती। कहीं उस रमझल्ले में धर लिया जाता, तो आबरू अलग जाती और नौकरी से अलग हाथ धोता। मगर अब इस आदमी से होशियार रहना पड़ेगा।’
इतने में चौक आ गया और हम दोनों ने अपनी-अपनी राह ली।
□□□
