मैंने दिल में कहा-यहाँ तुम्हारी नीयत साफ है लेकिन घर पहुँच कर भी यही नीयत रहेगी इसका क्या प्रमाण है नीयत साफ रहने पर भी मेरे रुपये दे सकोगे या नहीं यह कौन जाने कम से कम तुमसे वसूल करने का मेरे पास कोई साधन नहीं है। प्रकट में कहा-इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है लेकिन खेद है कि मेरे पास रुपये नहीं हैं। हाँ तुम्हारी जितनी तनख्वाह निकलती हो वह ले सकते हो।
उसने कुछ जवाब नहीं दिया किंकर्तव्यविमूढ़ की तरह एक बार आकाश की ओर देखा और चला गया। मेरे हृदय में कठिन वेदना हुई। अपनी स्वार्थपरता पर ग्लानि हुई। पर अंत को मैंने जो निश्चय किया था उसी पर स्थिर रहा। इस विचार से मन को संतोष हो गया कि मैं ऐसा कहाँ का धनी हूँ जो यों रुपये पानी में फेंकता फिरूँ।
यह है उस कपट का परिणाम जो मेरे कवि मित्र ने मेरे साथ किया।
मालूम नहीं आगे चल कर इस निर्बलता का क्या कुफल निकलता पर सौभाग्य से उसकी नौबत न आयी। ईश्वर को मुझे इस अपयश से बचाना मंजूर था। जब वह आँखों में आँसू-भरे मेरे पास से चला तो कार्यालय के एक क्लर्क पं. पृथ्वीनाथ से उसकी भेंट हो गयी। पंडित जी ने उससे हाल पूछा। पूरा वृत्तांत सुन लेने पर बिना किसी आगा-पीछा के उन्होंने 15 रु. निकाल कर उसे दे दिये। ये रुपये उन्हें कार्यालय के मुनीम से उधार लेने पड़े। मुझे यह हाल मालूम हुआ तो हृदय के ऊपर से एक बोझ-सा उतर गया। अब वह बेचारा मजे से अपने घर पहुँच जायगा। यह संतोष मुफ्त ही में प्राप्त हो गया। कुछ अपनी नीचता पर लज्जा भी आयी। मैं लंबे-लंबे लेखों में दया मनुष्यता और सद्व्यवहार का उपदेश किया करता था पर अवसर पड़ने पर साफ जान बचा कर निकल गया ! और यह बेचारा क्लर्क जो मेरे लेखों का भक्त था इतना उदार और दयाशील निकला ! गुरु गुड़ ही रहे चेला शक्कर हो गये। खैर उसमें भी एक व्यंग्य-पूर्ण संतोष था कि मेरे उपदेशों का असर मुझ पर न हुआ न सही दूसरों पर तो हुआ! चिराग के तले अँधेरा रहा तो क्या हुआ उसका प्रकाश तो फैल रहा है ! पर कहीं बेचारे को रुपये न मिले (और शायद ही मिलें इसकी बहुत कम आशा है) तो खूब छकेंगे। हजरत को आड़े हाथों लूँगा। किंतु मेरी यह अभिलाषा न पूरी हुई। पाँचवें दिन रुपये आ गये। ऐसी और आँखें खोल देनेवाली यातना मुझे और कभी नहीं मिली थी। खैरियत यही थी कि मैंने इस घटना की चर्चा स्त्री से नहीं की थी नहीं तो मुझे घर में रहना भी मुश्किल हो जाता।
उपर्युक्त वृत्तांत लिख कर मैंने एक पत्रिका में भेज दिया। मेरा उद्देश्य केवल यह था कि जनता के सामने कपट-व्यवहार के कुपरिणाम का एक दृश्य रखूँ। मुझे स्वप्न में भी आशा न थी कोई प्रत्यक्ष फल निकलेगा। इसी से जब चौथे दिन अनायास मेरे पास 75 रु. का मनीआर्डर पहुँचा तो मेरे आनंद की सीमा न रही। प्रेषक वही महाशय थे-उमापति। कूपन पर केवल क्षमा लिखा हुआ था। मैंने रुपये ले जाकर पत्नी के हाथों में रख दिये और कूपन दिखलाया।
उसने अनमने भाव से कहा-इन्हें ले जा कर यत्न से अपने संदूक में रखो। तुम ऐसे लोभी प्रकृति के मनुष्य हो यह मुझे आज ज्ञात हुआ। थोड़े-से रुपयों के लिए किसी के पीछे पंजे झाड़ कर पड़ जाना सज्जनता नहीं है। जब कोई शिक्षित और विनयशील मनुष्य अपने वचन का पालन न करे तो यही समझना चाहिए कि वह विवश है। विवश मनुष्य को बार-बार तकाजों से लज्जित करना भलमनसी नहीं है। कोई मनुष्य जिसका सर्वथा नैतिक पतन नहीं हो गया है यथाशक्ति किसी को धोखा नहीं देता। इन रुपयों को मैं तब तक अपने पास नहीं रखूँगी जब तक उमापति का कोई पत्र नहीं आ जायगा कि क्यों रुपये भेजने में इतना विलंब हुआ।
पर इस समय मैं ऐसी उदार बातें सुनने को तैयार न था। डूबा हुआ धन मिल गया इसकी खुशी से फूला नहीं समाता था।
