मेहता – भाव देखो, शब्दों पर न जाओ।
राजेश्वरी – जब तुम्हारे और उसके आदर्शों में विरोध है तो उसे तुम पर श्रद्धा क्यों कर हो सकती है?
लेकिन मेहता महाशय जामें से बाहर हो रहे थे। राजेश्वरी की सहिष्णुतापूर्ण बातों से वे और जल उठे। दफ्तर में जाकर उसी क्रोध में पत्र लिखने लगे जिसका एक-एक शब्द छुरी और कटार से भी ज्यादा तीखा था।
उपर्युक्त घटना के दो सप्ताह पीछे मिस्टर मेहता ने विलायती डाक खोली तो बालकृष्ण का कोई पत्र न था। समझे, मेरी चोटें काम कर गयी, आ गया सीधे रास्ते पर, तभी तो उत्तर देने का साहस नहीं हुआ। ‘लंदन टाइम’ की चिट फाड़ी (इस पत्र को बड़े चाव से पढ़ा करते थे) और तार की खबरें देखने लगे। सहसा उनके मुंह से एक आह निकली। पत्र हाथ से छूटकर गिर पड़ा। पहला समाचार था –
लंदन में भारतीय देशभक्तों का जमाव, ऑनरेबुल मिस्टर
मेहता की वक्तृता पर असंतोष, मिस्टर बालकृष्ण
मेहता का विरोध और आत्महत्या
गत शनिवार को बैक्सटन हाल में भारतीय युवकों और नेताओं की एक बड़ी सभा हुई। सभापति मिस्टर तालिबजा ने कहा हमको बहुत खोजने पर भी काउंसिल के किसी अंग्रेज मेम्बर की वक्तृता में ऐसे मर्मभेदी, ऐसे कठोर शब्द नहीं मिलते। हमने अब तक किसी राजनीतिज्ञ के मुख से ऐसे भ्रांतिकारक, ऐसे निरंकुश विचार नहीं सुने। इस वक्तृता ने सिद्ध कर दिया कि भारत के उद्धार का कोई उपाय है तो वह स्वराज्य है, जिसका आशय है – मन और वचन की पूर्ण स्वाधीनता। क्रमागत उन्नति (Evaluation) पर से हमारा एतबार अब तक नहीं उठा था तो अब उठ गया। हमारा रोग असाध्य हो गया है। यह अब चूर्णों और अवलेहों से अच्छा नहीं हो सकता। उससे निवृत्त होने के लिए हमें कायाकल्प की आवश्यकता है। ऊंचे राज्यपद हमें स्वाधीन नहीं बनाते, बल्कि हमारी आध्यात्मिक पराधीनता को और भी पुष्ट कर देते हैं। हमें विश्वास है कि ऑनरेबुल मिस्टर मेहता ने जिन विचारों का प्रतिपादन किया है उन्हें वे अंतःकरण से मिथ्या समझते हैं लेकिन सम्मान-लालसा, श्रेय-प्रेम और पदानुराग ने उन्हें अपनी आत्मा का गला घोंटने पर बाध्य कर दिया है… (किसी ने उच्च स्वर से कहा: यह मिथ्या दोषारोपण है।)
लोगों ने विस्मित होकर देखा तो मिस्टर बालकृष्ण अपनी जगह पर खड़े थे। क्रोध से उनका शरीर कांप रहा था। वे बोलना चाहते थे, लेकिन लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनकी निंदा और अपमान करने लगे। सभापति ने बड़ी कठिनाई से लोगों को शांत किया, किंतु मिस्टर बालकृष्ण वहां से उठकर चले गए।
दूसरे दिन जब मित्रगण बालकृष्ण से मिलने गए तो उसकी लाश फर्श पर पड़ी हुई थी। पिस्तौल की दो गोलियां छाती से पार हो गयी थीं। मेज़ पर उनकी डायरी खुली पड़ी थी, उस पर ये पंक्तियां लिखी हुई थी –
आज सभा में मेरा गर्व दलित हो गया। मैं यह अपमान नहीं सह सकता। मुझे अपने पूज्य पिता के प्रति ऐसे कितने ही निंदासूचक दृश्य देखने पड़ेंगे। इस आदर्श विरोध का अंत ही कर देना अच्छा है। सम्भव है, मेरा जीवन उनके निर्दिष्ट मार्ग में बाधक हो। ईश्वर मुझे बल प्रदान करें!
