ईश्वर के अतिरिक्त शेख सादी कभी किसी के सम्मुख नहीं झुके। न ही उन्होंने किसी से किसी भी प्रकार की कभी आशा नहीं की। वह बहुत पहुँचे हुए संत थे।
उस समय के राजा को इस संत को मिलने, प्रवचन सुनने की बड़ी तमन्ना रहती। एक बार बिना बताए वह उनकी कुटिया में आ पहुँचा। प्रणाम कर बोले- “मैं आपकी शरण में आया हूँ।”
‘वह तो मैं देख ही रहा हूँ’ शेख सादी ने आंखें बंद कर रखी थीं। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति के बल पर राजा के जीवन की किताब को पढ़ लिया। उनके कार्यकलापों और व्यवहार को खूब जान लिया।
‘शेख जी! संत जी! आप मुझे कुछ शिक्षा दें। उपदेश दें। सही रास्ता दिखाएं।’
फकीर ने आधी आंखें खोलीं। पूछा- ‘राजन तुम्हें नींद कैसी आती है?’
जी! हर रात, जब-जब समय मिलता है। मैं सो लेता हूँ। यही कोई तीन-चार घंटे सो पाता हूँ।
“क्यों?” यह तो बहुत कम है।
मेरी मानो राजा! तुम खूब सोया करो। रातभर गहरी नींद सोने की आदत बनाओ। हो सके तो दिन में भी दो-तीन घंटे सोया करो। ऐसा क्यों? ज्यादा सोना तो अच्छा नहीं।
हां। ठीक कहा। भले लोग कम सोयें तो अच्छा रहता है, किंतु दुर्जन जितना ज्यादा सोएगा, लोग उतने सुखी रहेंगे। यदि दुर्जन राजा ही हो तो… उसके ज्यादा देर तक सोने से प्रजा को राहत मिलती है। उस राजा का भी इसी में भला है… तुम्हें तो अधिक से अधिक देर तक ही सोना चाहिए।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
