Lakshmiji's ka mukut moral story
Lakshmiji's ka mukut moral story

पुराने समय की बात है, एक था रामखिलावन। वह मिट्टी के खिलौने बनाकर बेचा करता था। मिट्टी के शेर, भालू, हिरन, बारहसिंगा, लोमड़ी, हाथी और मटरूमल की बारात। दीवाली पर वह मिट्टी की लक्ष्मी और गणेशजी की मूर्तियाँ भी बनाता था। बच्चे एक-एक, दो-दो रुपए में बड़े चाव से उन्हें खरीदते। रामखिलावन के खिलौने होते भी सुंदर थे।

एक दिन रामखिलावन ने सोचा, ‘ऐसे मैं कब तक खिलौने बनाकर दो-दो रुपए में बेचता रहूँगा? मुझे कोई और तरीका सोचना चाहिए जिससे ज्यादा पैसा आए।’

दीवाली पास आ रही थी। रामखिलावन ने एक बड़ा सा सुनहरा मुकुट बनाया। उसे खूब अच्छी तरह सजाकर शहर के चौराहे पर आकर खड़ा हो गया। बोला, ”भाइयो, मेरे हाथ में है लक्ष्मीजी का सुनहरा मुकुट। यह बड़ा चमत्कारी है। जिसके पास होगा, उसकी किस्मत बदल जाएगी। रात में इससे सोने-चाँदी की बारिश होती है। जो भी इसे ले जाएगा, उसका घर सोने-चाँदी से भर जाएगा। पर मैं इसे सौ रुपए से कम नहीं दूँगा।”

सुनते ही लोग ठिठककर उस सुनहरे मुकुट को देखने लगे। हर कोई उसे लेना चाहता था। एक सेठ ने कहा, ”भाई, मैं इस मुकुट के लिए सौ तो क्या, दो सौ भी देने को तैयार हूँ। तुम यह मुकुट किसी और को नहीं, मुझी को देना।”

दूसरे सेठ ने पाँच सौ रुपए की बोली लगा दी।

तीसरे सेठ ने कहा, ”मैं इस मुकुट के पूरे एक हजार दूँगा। लाओ, यह मुकुट मुझे दे दो।”

एक बूढ़ा फकीर उधर से निकल रहा था। वह भी बड़ी देर से यह नाटक देख रहा था।

अचानक वह खड़ा-खड़ा हँस पड़ा। इस पर सबका ध्यान उसकी ओर चला गया। तब उस फकीर ने ऊँची आवाज में कहा, ”अरे मूर्खो, कुछ तो अक्ल से काम लो! अगर यह मुकुट सचमुच सोने-चाँदी बरसाने वाला होता, तो यह आदमी इसे सड़क पर खड़ा होकर क्यों बेचता? अपने घर पर ही न रख लेता! अफसोस, तुम इस धूर्त की बातों में आकर ठगे जा रहे हो।”

फकीर की यह बात सुनते ही सारी भीड़ छँट गई।

अब चौराहे पर रामखिलावन अलग-थलग खड़ा था। शर्म से सिर झुकाए वह घर लौट गया। उसके बाद इस शहर में वह कभी दिखाई नहीं पड़ा।

सुनते हैं, किसी और शहर में जाकर उसने फिर से खिलौने बनाने का अपना पुराना काम ही शुरू कर दिया है।

अब उसकी समझ में आ गया है कि आदमी को इज्जत मेहनत और ईमानदारी से काम करने पर मिलती है। और धोखे की टट्टी ज्यादा दिन तक नहीं चलती।