mohna ko fansi
mohna ko fansi

मोहना की कहानी सुनाते हरखू दादा अब थक चुके थे।…

उनके मँह से निकलते शब्द भी कई बार इधर-उधर जा गिरते। जैसे अपने शब्दों पर उनका कोई बस न रह गया हो। बीच-बीच में वे हाँफने भी लगते थे।…

पर कहानी का सुर उनके हाथ से छूटता न था। और वे अपने दोस्त मोहना की यादों में बह रहे थे, बहते जा रहे थे…

तभी बाबू गंगासहाय उठे। उन्होंने बड़े आदर से पानी का गिलास उठाकर उन्हें दिया। बोले, “दादा, मोहना की कहानी तो अकथ है, सो वह चलती रहेगी।…पहले आप थोड़ा पानी पियो…!”

हरखू दादा ने दो-चार घूँट पानी पिया, फिर बड़ी विकलता से कहानी के छूटे हुए तार को ढूँढ़ने लगे…

जल्दी ही वह उनके हाथ में आ गया, और मोहना की कहानी फिर आगे चल पड़ी, उसी भीगे हुए से सुर में…

हाँ, तो हिरनापुर में बड़ी दूर-दूर से आए मेरे प्यारे भाइयो—हरखू दादा अब नए जोश के साथ बोल रहे थे—मोहना की कहानी अब आगे चलती है…! मोहना तो नहीं रहा, पर उसकी कहानी कहाँ खत्म हुई? वह तो आज भी चल रही है और हमेशा चलती रहेगी। आज हम और आप सब उस कहानी में ही तो शामिल होने के लिए यहाँ आए हैं।…तो भाइयो, मोहना की शहादत की यह कहानी हमेशा-हमेशा के लिए रहस्य ही बनी रहती, अगर एक और चमत्कार न होता। एक ऐसा चमत्कार, जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं था।…शायद आपके लिए भी यकीन करना मुश्किल होगा, कि वही दरोगा खुदाबख्श, जिसने मोहना की बेंतों से पिटाई की थी, आखिर इस अन्याय का बोझ नहीं सह पाया। और मोहना की फाँसी के बाद तो उसकी आत्मा उसे धिक्कारने लगी।…उसे बार-बार मोहना की बात याद आती, “इस अन्याय की वर्दी को उतारकर, गुलामी के जुए को उतार फेंको, दरोगा साहब, और गाँधी जी के बताए रास्ते पर चलो…!”

आखिर उसने नौकरी से इस्तीफा दिया और सुराजियों के साथ मिल गया। उसने लोगों से साफ-साफ कहा, “मोहना को फाँसी अंग्रेजों की सोची-समझी चाल थी, जिससे कि हिरनापुर के लोग डर जाएँ।”

पर हिरनापुर के लोग डरे नहीं। उन सबके दिल में मोहना जो बसा हुआ था।…

पहले मोहना जिस तरह गाँव-गाँव जाकर लोगों को जगाता था, वही काम अब खुदाबख्श ने सँभाल लिया। अब वह दरोगा नहीं था। गाँधी जी का विनम्र अनुयायी था। मोहना की तरह, और रात-दिन एक करके गाँव-गाँव में अलख जगा रहा था।

उसी ने कहा, “हम मोहना की याद में हर बरस शहीद मेले का आयोजन करेंगे। इसी तालाब के पास वाले मैदान में।”

और यों हिरनापुर में शहीद मेला लगने लगा। बरस-दर-बरस। सन् बयालीस से मैं इसे देखता आ रहा हूँ। तब से कोई पचहत्तर बरस हो गए, और आगे भी, मुझे यकीन है, यह चलता रहेगा।…

कहते-कहते हरखू दादा एक पल के लिए चुप हो गए। चेहरा ऐसा, जैसे उनकी आँखें अब भी अपने प्यारे दोस्त मोहना को खोज रही हों।

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)