manto ki kahani fundane

Manto Story in Hindi: कोठी से लगे घने और दूर तक फैले बाग में झाड़ियों के पीछे एक बिल्ली ने बच्चे दिए थे जो बिल्ला खा गया था। उसके कुछ ही दिनों बाद एक कुतिया ने बच्चे दिए थे जो बड़े-बड़े हो गए थे और दिन रात कोठी के अंदर भौंकते और गंदगी बिखेरते रहते थे। उनको जहर दे दिया गया था। एक एक करके वे सब भी मर गए थे। उनकी मां भी मर गई थी। उनका बाप पता नहीं कहां था और होता तो उसकी मौत भी तय थी।

जाने कितने साल बीत गए थे। कोठी से सटे बाग की झाड़ियां सैकड़ों-हजारों पीछे बच्चे दिए थे, जिनका नामोनिशान भी नहीं रहा था। अलबत्ता मुर्गियां वहां अंडे दिया करती थी, जिनको हर सुबह उठा कर वह अंदर ले जाती थी।

उस बाग में किसी आदमी ने उनकी नौजवान नौकरानी का बड़ी बेदर्दी से कत्ल था जो उसने दो दिन पहले फेरीवाले से आठ आने में खरीदा था। कातिल ने इस जोर से पेंच दिए थे कि उसकी आंखें बाहर निकल आई थीं।

उसको देखकर उसे इतना तेज बुखार चढ़ा कि बेहोश हो गई थी और शायद अभी तक बेहोश थी। लेकिन नहीं, ऐसा क्यों कर हो सकता था, इसलिए कि उस कत्ल के बाद मुर्गियों ने अंडे नहीं, बिल्लियों ने बच्चे दिए थे और एक शादी हुई थी-कुतिया की, जिसके गले में लाल दुपट्टा था। उसकी आंखें बाहर निकली हुई नहीं थीं, अंदर धंसी हुई थीं

बाग में बैंड बजा था। सुर्ख वर्दियों वाले सिपाही आए थे, जो रंग-बिरगी मश्कें बगलों में दबा कर मुंह से अजीब-अजीब आवाज निकालते थे। उनकी वर्दियों के साथ कई फुंदनें लगे थे जिनको उठा-उठा कर लोग अपने इजारबंदों में लगाते जाते थे, पर जब सुबह हुई तो उनका नामोनिशान तक नहीं था। सबको जहर दे दिया गया था।

दुल्हन को जाने क्या सूझी, कमबख्त ने झाड़ियों के पीछे नहीं, अपने बिस्तर पर सिर्फ एक बच्चा दिया जो बड़ा गुल-गुथना, लाल फुंदना था। उसकी मां मर गई, बाप भी। दोनों को बच्चे ने मारा। उसका बाप पता नहीं था। वह होता तो उसकी मौत भी उन दोनों के साथ होती।

सुर्ख वर्दियों वाले सिपाही बड़े-बड़े फुंदने लटकाए जाने कहां गायब हुए कि फिर नहीं आए। बाग में बिल्ले घूमते थे, जो उसे घूरते थे। उसको छिछड़ों से भरी हुई टोकरी समझते थे, हालांकि टोकरी में नारंगियां थीं।

एक दिन उसने अपनी दो नारंगियां निकाल कर आइनें के सामने रख दी। उसके पीछे होकर उसने उनको देखा मगर नजर न आई। उसने सोचा, इसकी वजह यह है कि छोटी हैं, मगर वे उसके सोचते-सोचते ही बड़ी हो गईं और उसने रोशनी में कपड़ें में लपेटकर आतिशदान पर रख दीं।

अब कुत्ते भौंकने लगे। नारंगियां फर्श पर लुढ़कने लगीं। कोठी के हरे-हरे फर्श पर उछलीं, हर कमरे में कूदीं और उछलती-कूदती बड़े-बड़े बागों में भागने-दौड़ने लगी। कुत्ते उनसे खेलते और आपस में लड़ते-झगड़ते रहते।

जाने क्या हुआ, उन कुत्तों में से दो जहर खाकर मर गए। जो बाकी बचे वे उनकी अधेड़ उम्र की हट्टी-कट्टी नौकरानी खा गई। यह उस नौजवान की जगह आई थी जिसको किसी ने कत्ल कर दिया था, गले में उसी के फुंदने वाले इजारबंद का फंदा डालकर।

उसकी मां थी, अधेड़ उम्र की नौकरानी से उम्र में छह-सात वर्ष बड़ी। उसकी तरह हट्टी-कट्टी नहीं थी। प्रतिदिन सुबह-शाम मोटर में सैर को जाती थी और बद-आदत मुर्गियों की तरह दूर-दराज बागों में झाड़ियों के पीछे अंडे देती थी। उनको वह खुद उठाकर लाती थी, न कि ड्राइवर। आमलेट बनाती थी, जिसके दाग कपड़ों पर पड़ जाते थे। सूख जाते तो उनको बाग में झाड़ियों के पीछे फेंक देती थी, जहां से चीलें उठा कर ले जाती थीं। एक दिन उसकी सहेली आई पाकिस्तान से, मोटर नं. 8612 पी. एल.। बड़ी गर्मी थी। डैडी पहाड़ पर थे। मम्मी सेर करने गई हुई थीं। पसीना छूट रहा था। उसने कमरे में दाखिल होते ही अपना ब्लाउज उतारा और पंखें के नीचे खड़ी हो गई। उसके दूध उबले हुए थे जो धीरे-धीरे ठंडे हो गए। आखिर दोनों दूध हिलमिल कर गुनगुने हो गए और खट्टी लस्सी बन गए। उसकी सहेली का बैंड बज गया लेकिन वर्दी वाले सिपाही फूंदने बजाने नहीं आए। उनकी जगह पीतल के बर्तन थे छोटे और बड़े, जिनसे आवाजें निकलती थीं-गरजदार और धीमी-धीमी और गरजदार।

एक सहेली जब फिर मिली तो उसने बताया कि वह बदल गई है। सचमुच बदल गई है। सचमुच बदल गई थी। उसके अब दो पेट थे, एक पुराना दूसरा नया। एक के ऊपर दूसरा चढ़ा हुआ था। उसके दूध फटे हुए थे। फिर उसके भाई का बैंड बजा। अधेड़ उम्र की हट्टी-कट्टी नौकरानी बहुत रोई। उसके भाई ने उसको बहुत दिलासा दी बेचारी को अपनी शादी याद आ गई थी।

रात भर उसके भाई और उसकी दुल्हन की लड़ाई होती रही। वह रोती रही, वह हंसता रहा। सुबह हुई तो अधेड़ उम्र की हट्टी-कट्टी नौकरानी उसके भाई को दिलासा देने के लिए अपने साथ ले गई।

दुल्हन को नहलाया गया। उसकी सलवार में उसका फुंदने वाला इजारबंद पड़ा था। पता नहीं वह दुल्हन के गले में क्यों नहीं बांधा गया।

उसकी आंखें बहुत मोटी थी। अगर गला जोर से घोंटा जाता तो वे जिबह किए हुए बकरे की आंखों की तरह बाहर निकल आतीं और उसको बहुत तेज बुखार चढ़ता, लेकिन पहला बुखार तो अभी तक उतरा नहीं। हो सकता है उतर गया हो और यह नया बुखार हो, जिसमें वह अभी तक बेहोश हो।

उसकी मां मोटर ड्राइवरी सीख रही है। बाप होटल में रहता है। कभी-कभी आता है और अपने लड़के से मिलकर चला जाता है। लड़का कभी-कभी अपनी पत्नी को घर बुला लेता है। अधेड़ उम्र की हट्टी-कट्टी नौकरानी को दो तीन दिन के बाद कोई याद सताती है और वह रोना शुरू कर देती है। वह उसे दिलासा देता है, वह उसे पुचकारती है और दुल्हन चली जाती है।

अब वह और दुल्हन भाभी दोनों सैर को जाती हैं। सहेली भी, पाकिस्तान मेल मोटर नं. 8612 पी. एल. सैर करते-करते अजंता जा निकलती है जहां तस्वीरें बनाने का काम सिखाया जाता है। तस्वीरें देखकर तीनों तस्वीरें बन जाती हैं।

रंग ही रंग। लाल, पीले, हरे, नीले, सबके सब चीखने वाले हैं। उनको रंगों का सर्जक चुप कराता है। उसके लंबे लंबे बाल हैं। सर्दियों और गर्मियों में ओवरकोट पहनता है। अच्छी शक्ल-सूरत का है। अंदर बाहर हमेशा खड़ाऊं इस्तेमाल करता

अपने रंगों को चुप कराने के बाद खुद चीखना शुरू कर देता है। उसको ये तीनों चुप कराती हैं और बाद में खुद चिल्लाने लगती हैं।

तीनों अजंता में अमूर्त आर्ट के सैकड़ों नमूने बनाती रहीं। एक की हर तस्वीर में औरत के दो पेट होते हैं, विभिन्न रंगों के। दूसरी की तस्वीरों में औरत अधेड़ उम्र की होती है, हट्टी-कट्टी। तीसरी की तस्वीरों में फुंदने, इजारबंद का गुच्छा।

अमूर्त तस्वीर बनती रहीं मगर तीनों से स्तन सूखते रहे। बड़ी गर्मी थी इतनी कि तीनों पसीने में सराबोर थीं। खस लगे कमरे के अंदर दाखिल होते ही उन्होंने अपने ब्लाउज उतारे और पंखे के नीचे खड़ी हो गईं। पंखा चलता रहा। स्तनों में ठंडक पैदा हुई न गर्मी।

उसकी मम्मी दूसरे कमरे में थीं ड्राइवर उसके बदन से मोबिल आयल पोंछ रहा था।

डैडी होटल में थे, जहां उनकी लेडी स्टेनोग्राफर उनके माथे पर यूडिकोलोन मल रही थी।

एक दिन उसका भी बैंड बज गया। उजड़ा बाग फिर बार रौनक हो गया। गमलों और दरवाजों की सजावट अजंता स्टूडियो के मालिक ने की थी। बड़ी-बड़ी गहरी लिपस्टिकें उसके बिखरे हुए रंग देख कर उड़ गई। एक जो अधिक कालिमामय थी, इतनी उड़ी कि वहीं गिर कर उसकी शागिर्द हो गई।

उसकी दुल्हन वाली पोशाक का डिजाईन भी उसने तैयार किया था। उसने उसकी हजारों दिशाएं पैदा कर दी थीं। ठीक सामने देखा तो वह विभिन्न रंगों के इजारबंदों का बंडल मालूम होती थी। जरा उधर हट जाओ तो फूलों की टोकरी थी। एक तरफ हो जाओ तो खिड़की पर पड़ा हुआ फुलकारी का पर्दा।

पीछे चले जाओ तो कुचले हुए तरबूजों का ढेर। जरा कोण बदल कर देखा तो टमाटो-सॉस से भरा हुआ मर्तबान, ऊपर से देखो तो यगाना आर्ट। नीचे से देखो तो मीराजी की दुरूह शायरी।

कला पारखी निगाहें अश-अश कर उठीं। दूल्हा इतना प्रभावित हुआ था कि शादी के दूसरे दिन ही उसने निश्चय कर लिया कि वह भी अमूर्त आर्टिस्ट बन जाएगा। चुनांचे अपनी पत्नी के साथ वह अजंता गया, जहां उन्हें मालूम हुआ कि उसकी शादी हो रही हे ओर वह चंद रोज से अपनी होने वाली दुल्हन के ही यहां रहता है।

उसकी भावी दुल्हन वही गहरे रंग की लिपस्टिक थी जो दूसरी लिपस्टिकों के मुकाबले में अधिक कालिमायुक्त थी। शुरू-शुरू में कुछ महीने तक उसके पति को उससे और अमूर्त आर्ट से दिलचस्पी रही, लेकिन जब अजंता स्टूडियो बंद हो गया और उसके मालिक की कहीं से भी सूचना न मिली तो उसने नमक का कारोबार शुरू कर दिया जो बहुत लाभप्रद था।

उस कारोबार के दौरान उसकी मुलाकात एक लड़की से हुई जिसके स्तन सूखे हुए नहीं थे। ये उसको पसंद आ गए। बैंड नहीं बजा, लेकिन शादी हो गई। पहली अपने ब्रुश उठाकर ले गई और अलग रहने लगी।

यह वैमनस्य पहले तो दोनों के लिए कटुता का कारण बना, लेकिन बाद में एक अजीबो-गरीब मिठास में बदल गया। उसकी सहेली ने जो दूसरा पति बदल लेने के बाद सारे यूरोप का चक्कर लगा आई थी और अब दिल की रोगी थी, उस मिठास को क्यूबिक आर्ट में पेंट किया। साफ-स्वच्छ चीनी के असंख्य क्यूब थे जो थूहर के पौधों के बीच इस ढंग से ऊपर-नीचे रखे थे कि उनसे दो शक्लें बन गई थीं। उन पर शहद की मक्खियां बैठी रस चूस रही थी।

उसकी दूसरी सहेली ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली। जब उसको यह दर्दनाक खबर मिली तो वह बेहोश हो गई। पता नहीं बेहोशी नई थी या वही पुरानी, जो बड़े तेज बुखार के बाद प्रकट हुई थी।

उसकी मम्मी ने घर का सारा हिसाब-किताब अधेड़ उम्र की हट्टी-कट्टी नौकरानी को सौंप दिया था। अब उसको ड्राइविंग आ गई थी, मगर वह बहुत बीमार हो गई थीं, फिर भी उसको ड्राइवर के बिना मां के पिल्ले का बहुत ख्याल था। वह उसको अपना मोबिल आयल पिलाती थी। उसकी भाभी और उसके भाई की जिंदगी बहुत अधेड़ ओर हट्टी-कट्टी हो गई थी। दोनों बड़े प्यार से मिलते थे कि अचानक एक रात जबकि नौकरानी और उसका भाई घर का हिसाब कर रहे थे, उसकी भाभी प्रकट हुई। वह कुंवारी थी, उसके हाथ में कलम था न ब्रुश, लेकिन उसने दोनों का हिसाब साफ कर दिया।

सुबह कमरे में से जमे हुए लहू के दो बड़े-बड़े फुंदने निकले, जो उसकी भाभी के गले में लगा दिए गए।

अब वह किंचित् होश में आई। पति से वैमनस्य के कारण उसकी जिंदगी कटु होकर बाद में अजीबो-गरीब मिठास में बदल गई थी। उसने उसको थोड़ा सा तल्ख बनाने की कोशिश की और शराब पीना शुरू कर दिया मगर नाकाम रही। इसलिए कि उसकी मात्रा कम थी। उसने मात्रा बढ़ा दी, यहां तक कि वह उसमें डुबकियां लेने लगी। लोग समझते थे कि अब गर्क हुई और अब गर्क हुई, मगर वह सतह पर उभर आती थी, मुंह से शराब पोंछती हुई और कहकहे लगाती हुई।

सुबह को जब उठती तो उसे महसूस होता कि रात भर उसके शरीर का कण-कण दहाड़ें मार कर रोता रहा। उसके बाद वे सब बच्चे, जो पैदा हो सकते थे, उन कब्रों में जो उनके लिए बन सकती थीं, उस दूध के लिए जो उनका हो सकता था, बिलख-बिलख कर रो रहे हैं, मगर उनके लिए दूध कहां था। वह तो जंगली पिल्ले पी चुके थे।

वह और ज्यादा पीती कि अथाह समुद्र में डूब जाए, मगर उसकी इच्छा पूरी नहीं होती थी। बुद्धिमान थी, पढ़ी-लिखी थी। यौन विषयों पर बिना किसी बनावट के बेतकल्लुफ बातचीत करती थी। मर्दों के साथ शारीरिक संबंध करने में कोई हानि नहीं समझती थीं। मगर फिर भी कभी-कभी रात की तन्हाई में उसका जी चाहता था कि अपनी किसी बद-आदत-मुर्गी की तरह झाड़ियों के पीछे जाए और एक अंडा दे आए। बिल्कुल खोखली हो गई, केवल हड्डियों का ढांचा बाकी रह गया तो उससे लोग दूर रहने लगे। वह समझ गई, चुनांचे उनके पीछे नहीं भागी और अकेली घर में रहने लगी। सिगरेट पर सिगरेट फूंकती, शराब पीती और जाने क्या सोचती रहती। रात को बहुत कम पीती थी। कोठी के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी।

सामने क्वार्टर में ड्राइवर का बिना मां का बच्चा मोबिल आयल के लिए रोता रहता था। मगर उसकी मां के पास खत्म हो गया था। ड्राइवर ने एक्सीडेंट कर दिया था। मोटर गैरेज में और उसकी मां अस्पताल में पड़े थे, जहां उसकी एक टांग काटी जा चुकी थी। दूसरी काटी जाने वाली थी।वह कभी-कभी क्वार्टर के अंदर झांक कर देखती तो उसको महसूस होता कि उसके स्तनों की तलछट में हल्की-सी लर्जिश पैदा होती है। मगर उस कुरूचिकर चीज से तो उसके बच्चे के होंठ भी तर न होते। उसके भाई ने कुछ समय से बाहर रहना शुरू कर दिया था। आखिर एक दिन उसका खत स्विट्जरलैंड से आया कि वह वहां अपना इलाज करा रहा है। नर्स बहुत अच्छी है। अस्पताल से निकलते ही वह उससे शादी करने वाला है।

अधेड़ उम्र की हट्टी-कट्टी नौकरानी ने थोड़ा जेवर, कुछ नकदी और बहुत से कपड़े जो उसकी मम्मी के थे, चुराए और कुछ रोज के बाद गायब हो गई।

उसके बाद उसकी मां आपरेशन नाकाम होने के कारण अस्पताल में मर गई।

उसका बाप जनाजे में शामिल हुआ। उसके बाद उसने उसकी सूरत नहीं देखी।

अब वह बिल्कुल अकेली थी। जितने नौकर थे उसने अलग कर दिए, ड्राइवर समेत। उसके बच्चे के लिए एक धाय रख दी। कोई बोझ सिवाय उसके ख्यालों के बाकी न रहा था। वह चाहती थी कि धीरे-धीरे उनसे भी छुटकारा मिल जाए।

कभी कभार अगर कोई उससे मिलने आता तो वह अंदर से चिल्ला उठती थी, ‘चले जाओ…..जो कोई भी तुम हो, चले जाओ…मैं किसी से मिलना नहीं चाहती।’

सेफ में उसको अपनी मां के असंख्य कीमती जेवर मिले थे। उसके अपने भी थे जिनसे उसको कोई लगाव न था। अब वह रातों को घंटों आइने के सामने नंगी बैठ कर तमाम जेवर अपने बदन पर सजाती और शराब पीकर अश्लील गाने गाती थी। आसपास कोई कोठी नहीं थी, इसलिए उसे पूरी आजादी थी।

अपने बदन को तो वह कई तरीकों से नंगा कर चुकी थी। अब वह चाहती थी कि अपनी रूह को भी नंगा कर दे मगर इसमें वह जबर्दस्त शर्म महसूस करती थीं उस शर्म को दबाने का सिर्फ एक ही तरीका उसकी समझ में आता था कि पिये और खूब पिये और उस हालत में अपने नंगे बदन से मदद ले।

तस्वीरें बना-बना कर वह थक चुकी थी। एक लंबे समय से पेंटिंग का सामान संदूकजी में बंद पड़ा था, लेकिन एक दिन उसने सब रंग निकाले और बड़े-बड़े प्यालों में घोले। तमाम ब्रुश धो-धाकर एक तरफ रखे और आइने के सामने नंगी खड़ी हो गई और अपने शरीर पर नई रेखाएं बनानी शुरू कर दी। उसकी यह कोशिश अपने अस्तित्व को संपूर्ण रूप में नग्न करने की थी।

वह अपना सामने वाला हिस्सा ही पेंट कर सकती थी। दिन भर वह उसमें व्यस्त रही। बिना खाए-पिए आइने के सम्मुख खड़ी अपने बदन पर विभिन्न रंग लगाती और टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं बनाती रही। उसको ब्रुश में विश्वास था।

आधी रात के लगभग उसने दूर हट कर ध्यानपूर्वक निरीक्षण करके संतोष की सांस ली। उसके बाद उसने तमाम आभूषण एक एक करके अपने रंगों से लिथड़े हुए जिस्म पर सजाए और आइने में एक बार फिर गौर से देखा कि एकदम आहट हुई।

उसने पलट कर देखा, एक आदमी छुरा हाथ में लिए, मुंह पर ढाठा बांधे खड़ा था, जैसे हमला करना चाहता है।

मगर जब वह मुड़ी तो हमलावर के हलक से चीख ऊंची हुई। छुरा उसके हाथ से गिर पड़ा अफरा-तफरी के आलम में कभी इधर का रुख लिया, कभी उधर का, आखिर जो रास्ता मिला, उसमें से भाग निकला।

वह उसके पीछे भागी, चीखती, पुकारती, ‘ठहरो…ठहरो…मैं तुमसे कुछ कहूंगी …ठहरो।’ मगर चोर ने उसकी एक न सुनी और दीवार फांद कर गायब हो गया। मायूस होकर वह वापस आई। दरवाजे की दहलीज के पास चोर का खंजर पड़ा था। उसे उठा लिया और अंदर चली गई। अचानक उसकी नजरें आइने से दो-चार हुईं।

जहां उसका दिल था, वहां उसने म्याननुमा चमड़े के रंग का खोल-सा बनाया हुआ था। उसने उस पर खंजर रखकर देखा। खोल बहुत छोटा था। उसने खंजर फेंक दिया और बोतल में से शराब के चार-पांच चट पीकर इधर-उधर टहलने लगी। वह कई बोतलों खाली कर चुकी थी। खाया कुछ भी नहीं था। देर तक टहलने के बाद वह फिर आइने के सामने आई। उसके गले में इजारबंदनुमा गुलबंद था, जिसके बड़े बड़े फुंदने थे। यह उसने ब्रुश से बनाया था। सहसा उसको ऐसा महसूस हुआ कि यह गुलूबंद तंग होने लगा है। धीरे-धीरे वह उसके गले में अंदर धंसता जा रहा है। वह खामोश खड़ी आइने में आंखें गाड़े रही, जो उसी रफ्तार से बाहर निकल रही थीं।

थोड़ी देर के बाद उसके चेहरे की तमाम रगें फूलने लगीं। फिर एकदम उसने चीख मारी और औंधे मुंह फर्श पर गिर पड़ी।