Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “हैलो।” किसी अपरिचित नम्बर से कॉल था। “हैलो, क्या कर रहे हो?”

“अअअ…कौन बोल रही हैं आप?” “पहचानो।”

“अरे हाँ! कहाँ हो तुम, क्या हाल चाल हैं तुम्हारे?” चहकने वाली आवाज़ जम ज़रूर गई थी; पर इतनी भी कुहासी नहीं हुई थी कि, अनजान हो जाए।

“ठीक हूँ। तुम ऑफिस में हो ना? मुझे मिलना था तुमसे।”

“हाँ, ऑफिस में ही हूँ।”

“ओके। मैं आती हूँ, पास में ही हूँ।” कम से कम उसने इतनी मेहरबानी की, कि यह नहीं पूछा कि मैं फ़्री हूँ या नहीं। यह हक़ ज़िंदा पाकर तपे हुए मन पर कुछ तो सुकून उतर ही आया।

पुराने झोंके ठीक से लहलहा भी नहीं पाए थे कि वह आ गई।

“हाय।”आते ही उसने कहा और विजिटर्स चेयर पर बैठ गई। मैंने उसकी ओर नज़रों को पूरी तरह बिछ जाने दिया, उसने नज़रें चुरा लीं। मैं उसकी तयशुदा शर्मिंदगी महसूस कर पा रहा था, जो उसने ख़ुद ही ओढ़ी थी।

“क्या हुआ आज अचानक रास्ता भूल गई, चाय लोगी या कोल्ड्रींक्स?” मैंने पानी की बॉटल उसकी तरफ़ सरकाते हुए पूछा। इतने दिनों बाद मिलने से यह ख़्याल भी हावी हुआ कि, वह मेरी किसी बात को दंश की तरह ना ले ले। आख़िरकार हमारे अलग होने का दौर, इतना सेहतमंद भी नहीं था।

“नहीं यार कुछ नहीं। तुमसे कुछ सलाह लेनी थी। इधर आई हुई थी, तो सोचा मिल भी लूँगी।” उसने बॉटल की कैप हटाते हुए कहा।

“हाँ…बोलो, क्या हुआ?” एक साल पहले ही तो उसकी शादी हुई थी, तब से उसने बात करना भी बंद कर दिया था। इतने दिनों बाद कुछ बदला था तो तक़ल्लुफ़; और यह भी समझ रहा था कि उसके आने के दोनों मकसदों में से कौन सा ज़्यादा ख़ालिस है।

“मैं बहुत परेशान हो गई हूँ यार। शादी से पहले इनका किसी से अटैचमेन्ट था, मुझे लगता है अब भी उसके कॉन्टेक्ट में हैं।” कहा तो उसने आसानी से, पर निगाहें चुराने से इतना तो समझ आया ही, कि बात आसान नहीं थी।

“हा…हा…हा…तो उससे क्या हुआ?” पता नहीं क्यूँ, पर छोटी सी बेदर्द हँसी मुझे आ ही गई।

“मेरी पूरी लाइफ़ डिस्टर्ब है; इन्हें मुझसे कोई लेना-देना नहीं। मैं अपना हंड्रेड परसेंट डिवोशन भी देती हूँ और लॉयल भी हूँ। तुम तक से तो बात करती नहीं।” कहते हुए आख़िर की बात पर ही एक छोटी नज़र वह मुझसे मिला सकी।

“तुम्हें परेशान करता है वो? या कुछ कहता है?”

“नहीं ऐसा तो नहीं। बस अपने काम से काम। कुछ लेना-देना नहीं मुझसे। अजनबियों जैसे हैं हम दोनों।”

“तो तुम अपनी लॉयलिटी और डिवोशन का बदला चाहती हो?” मेरी बदसूरत बातों पर भी उसने कभी हाय-तौबा नहीं मचाई; बल्कि संजीदगी से सोचा ही है।

“तो कैसे रहूँ मैं? देखो, मैंने यह भी सोचा कि, शादी से पहले तो मेरे भी रिलेशन रहे ही हैं ना; मुझे उससे कोई दिक्क़त नहीं। लेकिन अब क्यों?” उसकी रोनी शक्ल देखकर भी मुझे कोई तकलीफ़ हुई; ऐसा अहसास ख़ुद मुझ में ही नहीं पाया।

“हा…हा…हा…तो तुम बदला ही चाहती हो? तुम्हारा प्यार और डिवोशन बदल सकता है तो तुम सोचती हो उसका भी बदल जाना चाहिए?” मेरी इस हँसी के लिए अब सोचता हूँ तो मुझे यही लगता है कि वह घिनौना प्रतिशोध ही था। हाँलाकि मैं नहीं चाहता था, वह मुझसे किसी तरह का संपर्क रखे और अपनी लाइफ़ डिस्टर्ब करे। पर भावनाओं की छोटी उम्मीदें क़ब्र से निकल भागने को कभी-कभी छटपटा ही पड़ती हैं।

“क्या करूँ मैं?” उसके चेहरे पर बेचारगी ठहरी हुई थी, पर तासीर मुझे छूती नहीं थी।

“उसको फ़्रीडम दो। शादी कर लेने से प्यार होना ज़रूरी है; यह सोच तो नहीं थी तुम्हारी। उसकी मर्ज़ी है, उसका किसी से अटैचमेण्ट है…और उसकी इमोशनल नीड तुमसे पूरी नहीं होती, तो उसको हक़ है किसी और से रिलेशन रखने का। वह मुझे तो कहीं से गलत नहीं लग रहा, हाँ तुम गलत लग रही हो; जो सोचती हो शादी मोहब्बत का बाज़ार है।” यह कोई ऐसी बात नहीं थी, जो मैंने उसे पहली दफ़ा कही थी।

“तो मैं क्या करूँ, क्या मेरे साथ गलत नहीं हो रहा? कैसे जीऊँ मैं?” उसकी वही बेरंग बेचारगी, जो मेरे लिए अब बेमानी थी।

“तुमने ख़ुद चुना है अपना रास्ता। अपने किसी भी हालात के लिए तुम दूसरों को दोष नहीं दे सकती। किसी और की कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं कि, वह तुम्हारी उम्मीदों पर खरा उतरे। सब से उम्मीदें ख़त्म करो और ख़ुद की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश तो ठीक से कर लो।”

मैंने ज़्यादा ग़ौर से उसकी ओर देखा तो मुझे लगा उसका चेहरा सपाट और मटमैला लगने लगा, जिससे घृणा भी उपज सकती है। एक घिन उस पुरुष से, जिसने उसे ख़ुद की तरह चाहा और एक घिन उस पुरुष के लिए; जिसके लिए वह चाहती है कि, उसे वह पहले पुरुष की तरह चाहे।