एक गरीब किसान एक पेड़ से अपने घोड़े को बांधकर आराम कर रहा था। वहाँ एक अमीर आदमी अपना घोड़ा लेकर पहुँचा और उसे पेड़ से बांधने लगा। किसान ने कहा कि अपने घोड़े को यहाँ मत बांधो, घोड़ा बहुत उद्दंड है, वह उसे मार डालेगा। अमीर ने हठपूर्वक अपना घोड़ा उसी पेड़ से बांध दिया। कुछ देर बाद दोनों खाना खाने चले गए। जब वे लौटकर आए तो अमीर आदमी का घोड़ा मरा पड़ा था। वह बहुत बिगड़ा और किसान से उसकी कीमत माँगने लगा।
झगड़ा बढ़ा तो लोग इकट्टा हो गए और उन्हें काजी के पास जाने की सलाह दी। काजी के यहाँ अमीर आदमी ने शिकायत की कि किसान के घोड़े ने उसके घोड़े को मार डाला है। इसलिए उसे कीमत चुकानी होगी। काजी ने किसान से पूछा कि क्या यह सही कह रहा है। किसान चुप रहा। काजी ने चार-पांच बार अपना सवाल दोहराया लेकिन किसान के मुंह से बोल नहीं फूटा। काजी ने हार मानकर अमीर आदमी से कहा कि मैं क्या कर सकता हूँ। यह बेचारा तो गूंगा है। अमीर को गुस्सा आ गया। वह बोला गूंगा होने का नाटक कर रहा है। इसने मुझसे खुद बात की थी। काजी ने कहा कि इसने तुमसे क्या कहा था।
अमीर बोला कि इसने मुझसे कहा था कि अपना घोड़ा इस पेड़ से मत बांधो, वर्ना मेरा घोड़ा उसे मार डालेगा। काजी बोला कि अगर इसने तुम्हें घोड़ा बांधने से मना किया था, फिर भी तुमने अपना घोड़ा वहीं बांधा तो इसमें गलती इसकी नहीं तुम्हारी है। फिर काजी ने किसान से पूछा कि जब तुम बोल सकते हो तो तुमने बताया क्यों नहीं किसान हाथ जोड़कर बोला कि अगर मैंने यह बात आपकों बताई भी होती तो यह आदमी इससे मुकर जाता।
सारः कई बार खामोशी शब्दों से ज्यादा असरकारी होती है।
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