gopi kee phirojee topi
gopi kee phirojee topi

Kids story in hindi: आजकल शहर के आदर्श मॉडल स्कूल में किसी की चर्चा थी तो बस गोपी की। हर कोई गोपी की बात कर रहा था और रातोरात वह पूरे स्कूल का हीरो बन गया था। और सच्ची बात तो यह कि बात गोपी की उतनी नहीं थी, जितनी गोपी की फिरोजी टोपी की। जैसे गोपी की फिरोजी टोपी न हुई, कोई जादू-मंतर जैसी चीज हो गई, जिसने देखते ही देखते हवाओं में एक अजब सी सनसनी फैला दी, ‘टोपी… टोपी, गोपी की फिरोजी टोपी…गोपी की फिरोजी टोपी!’ सब एक-दूसरे से पूछ रहे थे, “भई, तुमने गोपी की चमत्कारी टोपी देखी? सचमुच कमाल की चीज है, एकदम कमाल!”

नील कह रहा था, “भई, मुझे तो शुरू से लगता था, यह लड़का कुछ अलग है। न औरों से ज्यादा मिलना-जुलना, न हँसी-मजाक। बस, हर वक्त कुछ न कुछ सोचता हुआ सा लगता था। एकदम चुप्पा। इसके बैग में कंप्यूटर की नॉलेज वाली बड़ी मोटी-मोटी किताबें होती थीं। मैं हैरान होकर कहता था, अरे भई गोपी, तू क्या करता है इनका? तो बोला कि फुर्सत के टाइम में पढ़ता हूँ। मैंने पूछा कि क्या समझ में आ जाती हैं? इस पर बोला कि हाँ, जरा भी मुश्किल नहीं हैं। तू पढ़कर देख। पर मैंने पढ़ी एक किताब तो सिर घूम गया। हारकर मैंने कहा, ना-ना गोपी, ले, तू ही पढ़ ऐसे-ऐसे भारी पोथे!”

नील बता रहा था, तो बाकी सब बच्चे बड़े अचरज से मुँह बाए सुन रहे थे। उनकी भी गोपी के बारे में करीब-करीब यही राय थी।

इतने में हिंदी की मैडम मिसेज वासवानी वहाँ से निकलीं। छात्रों को गोपू के बारे में बात करते देख, उनके मुँह से निकला, “वाकई है तो यह कमाल का लड़का और उससे भी ज्यादा कमाल की है इसकी फिरोजी टोपी!” फिर वे जोरों से हँस दीं और हँसते-हँसते आगे निकल गईं।

यों तो गोपी इस बार ग्यारहवीं के सालाना इम्तिहान देने आया था, तो हर रोज उसके सिर पर यह टोपी होती ही थी। इसे सबने देखा था, पर कुछ ज्यादा चर्चा नहीं हुई थी। मजाक में एक-दो दोस्तों ने थोड़ा छेड़ते हुए कहा था, “अरे गोपी, कहीं तुम गंजे तो नहीं हो गए, जिसे छिपाने के लिए रोज-रोज इसे पहनकर आ जाते हो?”

इस पर गोपी मुसकराकर रह गया था, कुछ बोला नहीं।

मगर गोपी की इस टोपी में कुछ न कुछ खासियत तो जरूर थी। यही वजह है कि उसके क्लास टीचर जोशी सर का भी ध्यान इस पर गया था। जब गोपी लगातार कई दिन तक इम्तिहान में इसे पहनकर आया, तो उन्होंने हँसते हुए कहा, “अरे वाह गोपी, तुम्हारी यह कैप तो एकदम जादू वाली लगती है। शायद इसी के बलबूते इस बार तो तुम झटपट पूरा पेपर हल कर देते हो, वरना पहले तो दूसरे-तीसरे सवाल के बाद ही तुम्हारा पेन अटक जाता था और तुम माथा खुजाते नजर आते थे। इस बार क्या किसी जादूगर से यह टोपी माँग लाए हो, जिसकी बदौलत तुम्हारा पेन रुकता ही नहीं है।”

जोशी सर की बात सुनकर पूरी क्लास खिलखिला उठी थी और गोपी भी कुछ शरमा गया था। पर तब तो सबने इसे मजाक ही समझा था। यह मजाक सच भी हो सकता है, इसकी तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। खुद जोशी सर भी नहीं, जो इतने चुस्त-चौकस हैं कि छात्र का चेहरा देखकर साफ बता सकते हैं कि इसके भीतर वाले माले में क्या चल रहा है? पर गोपी की फिरोजी टोपी की लीला वे भी नहीं भाँप पाए।

और अब तो पूरे गोगापुर में हलचल थी। यहाँ तक कि गोपी की टोपी का पूरा किस्सा सुनते ही गोगापुर के एडवांस्ड साइंस सेंटर के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रसन्नमुखम भी एकदम अवाक् रह गए थे। बोले, “विज्ञान में असंभव तो कुछ भी नहीं। पर मुझे स्वीकार करना चाहिए, कि गोपी की यह फिरोजी टोपी एक वैज्ञानिक सच्चाई होने के साथ-साथ किसी मिरेकल से कम नहीं है। शून्य का आविष्कार भारत का ऐसा महान आविष्कार है, जिसके बिना कंप्यूटर की खोज शायद संभव ही नहीं थी। और गोपी की जादुई टोपी कंप्यूटर विज्ञान में एक ऐसे अचरज की तरह तो है ही, जो बड़े-बड़ों को चकित करेगा। सच बताऊँ, तो मैं खुद अभी तक इस पर यकीन नहीं कर पाया हूँ। हालाँकि जानता हूँ कि गोपी जो कह रहा है, वह सच है, एकदम सच। अलबत्ता कल जब वह सभाकक्ष में हम सबके सामने अपनी चमत्कारी टोपी का डिमांस्ट्रेशन करेगा, तब पूरी बात पता चलेगी।”

यों गोपी की फिरोजी टोपी ने पूरे गोगापुर में हड़कंप मचा दिया था। न जाने कब से वह अपनी कल्पना को साकार करने में जुटा था। और उसकी यह अनोखी खोज कभी सामने न आती, अगर खुद गोपी ने स्कूल के स्टेज पर आकर यह अजब सी घोषणा न की होती, जिसने आदर्श मॉडल स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. घोषाल तक को चकरा दिया था।

*

हालाँकि यह किस्सा या घटनाक्रम तो बस थोड़ी देर का है। और जिस दिन यह घटा, संयोग से वह दिन था पहली अप्रैल का। वाकई उस दिन गोपी की फिरोजी टोपी ने अच्छे-अच्छों को बुद्ध यानी ‘अप्रैल फूल’ बना दिया था। यह अलग बात है कि उसका पता सबको बड़ी देर में लगा था। और जब पता चला, तो गोपी एकाएक हीरो बन चुका था, पूरे स्कूल का हीरो, पूरे गोगापुर शहर का हीरो। हर होंठ पर बस गोपी और गोपी की फिरोजी टोपी ही नाच रही थी।

उस दिन आदर्श मॉडल स्कूल का सालाना नतीजा घोषित होना था। लिहाजा सारे बच्चे उत्सुकता से भरे हुए थे। ग्यारहवीं के नतीजे पर सबका ध्यान था, क्योंकि सबको पता था कि ग्यारहवीं कक्षा में स्कूल के असाधारण बच्चे थे, जिनसे बड़ी उम्मीदें थीं और अगले साल बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा में जिन्हें स्कूल का नाम जगमगाना था। खासकर प्रशांत गगन, नीना भट्टाचार्य और देवेश आनंद तो बड़े ही प्रतिभाशाली बच्चे थे, जो पिछले साल हाईस्कूल में बोर्ड की मैरिट लिस्ट में थे। इनमें प्रशांत सबसे होशियार विद्यार्थी था। इसके बाद नीना और देवेश थे। कभी नीना के नंबर पाँच-दस ज्यादा आ जाते, तो कभी देवेश के। खासा तगड़ा कंपिटीशन था। क्लास में और भी कई इंटेलीजेंट बच्चे थे, पर इनमें गोपी की तो कभी गिनती नहीं होती थी। वह न तो पढ़ाई में कभी नाम कमा पाया था और न खेलों में। बस, अपने आप में मगन कुछ सोचता सा रहता। लिहाजा उसकी दोस्ती भी कम बच्चों से थी। हाँ, अकसर पास में बैठने वाले नील या रोहित से कभी-कभार दो बातें हो जाती थीं। यों ही उखड़ी-पुखड़ी। नाममात्र की। सब उसे कहते, खुद में गुम एक बच्चा…!

पर इस बार प्रिंसिपल डॉ. अमिय घोषाल ने नतीजे सुनाना शुरू किया, तो ग्यारहवीं क्लास का नंबर आते ही मानो अजब सा उलट-फेर हो गया। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि गोपी ने ग्यारहवीं क्लास में टॉप किया है। लगा कि वे कोई और लिस्ट तो नहीं पढ़ रहे। या फिर बोलते समय उनसे कोई भारी गड़बड़ तो नहीं हो गई। वरना गोपी कैसे फर्स्ट आ सकता है? वही गोपी, जिसे पिछले कुछ समय से सारे बच्चे बस फिरोजी टोपी वाला गोपी कहकर छेड़ते और मंद-मंद मुसकराते थे।

इसके अलावा तो कोई और खासियत थी ही नहीं उसकी। छठी कक्षा से लेकर अभी तक उसके नंबर 50-55 परसेंट से आगे कभी बढ़े ही नहीं और फर्स्ट डिवीजन तो कभी सपने में भी नहीं आई। पर आज ग्यारहवीं में एकाएक वह चोटी पर पहुँच गया था। साथ ही उसने एक कीर्तिमान भी बनाया था। इस बार सालाना इम्तिहान में उसे 97 प्रतिशत अंक मिले थे और यह खुद में एक रिकॉर्ड था। किसी भी क्लास में, किसी भी बच्चे के इतने अंक नहीं आए थे। वह लड़का जो नीचे से पहला-दूसरा था, आज नंबर लाने में वह हीरो नंबर वन बन चुका था।

उधर प्रशांत गाल पर हाथ रखकर धीरे से नीना और देवेश को बता रहा था कि अभी कुछ समय पहले की ही तो बात है, साइंस की मैडम मिसेज इला वर्धन ने गोपी से मजाक में पूछा था, “क्यों गोपी, क्या तुम इस साल पास हो जाओगे?”

इस पर गोपी ने मुसकराते हुए कहा था, “हाँ मैडम, जितने हमेशा आते हैं, उतने नंबर तो आ ही जाएँगे।”

लेकिन फिर आज यह जादू कैसे हो गया? न प्रशांत की समझ में आ रहा था, न नीना और देवेश की। हालत यह थी कि जब गोपी का नाम पुकारा गया, तो ज्यादा तालियाँ तक नहीं बजीं। प्रिंसिपल डॉ. घोषाल को याद दिलाना पड़ा, तब बच्चों ने जोरदार तालियाँ बजाईं। पर तालियाँ बजाते हुए लोग जितने खुश थे, उससे ज्यादा हक्के-बक्के थे कि भला गोपी फर्स्ट कैसे? … कैसे हुआ यह अजूबा! हमेशा फर्स्ट आने वाला प्रशांत आज पीछे खिसक गया था। इतने सालों में पहली बार वह सेकंड आया था और नीना थर्ड । देवेश आनंद चौथे नंबर पर खिसक गया था।

अगर बीच में गोपी की फिरोजी टोपी आकर न टपक गई होती तो शायद यह गड़बड़ न होती। पर यह चमत्कार हुआ कैसे? सबके मन में सवाल पर सवाल उठ रहे थे। इसीलिए प्रिंसिपल घोषाल सर गोपी को इनाम दे रहे थे, तो सब बच्चों के चेहरे पर हैरानी भरी उधेड़बुन थी। यहाँ तक कि प्रिंसिपल साहब ने देखा, खुद गोपी ज्यादा खुश नहीं है। उन्होंने अचरज से पूछा, “क्यों, तुम्हें खुशी नहीं हुई गोपी?”

इस पर गोपी बोला, “नहीं-नहीं, खुश हूँ मैं सर। … अच्छा लग रहा है।”

“सिर्फ अच्छा…? तुमने तो कइयों को पछाड़ दिया भाई। काफी उलट-फेर कर दिया।” घोषाल सर हँसे।

“जी।” गोपी ने सिर झुकाकर कहा। बस जी, कुछ और नहीं और फिर वह चुपचाप कुछ सोचता हुआ सा स्टेज से नीचे उतर आया। लगा कि रहस्य और गहरा हो गया है

बहुत से बच्चे अब खुस-फुस करते हुए कहने लगे थे, “लगता है, इस बार गोपी ने चुपके-चुपके मेहनत कर ली होगी। वैसे भी तो यह चुप्पा है हमेशा से। कभी ज्यादा बोलता नहीं। तो क्या पता कि …!”

“हाँ-हाँ, हो सकता है। सब कुछ हो सकता है।” सबकी एक राय।

उधर गोपी के क्लास टीचर जोशी सर हँस-हँसकर साथ वाले अध्यापकों को बता रहे थे, “अजी, मैंने तो मजाक में इससे एक दिन कहा भी था कि लगता है गोपी, तुम्हारी इस फिरोजी टोपी में जादू है। तुम इस बार कोई जादू दिखाने वाले हो। और वाकई वह हो भी गया। देख लो, इसने अब भी वही फिरोजी टोपी पहनी हुई है। क्यों, है न?”

कहते-कहते जोशी सर ने छतफाड़ अट्टहास किया तो आसपास बैठे सभी टीचर हँसने लगे। हमेशा गंभीर रहने वाली मैडम इला वर्धन भी। बात थी ही ऐसी मजेदार।

इतने में प्रिंसिपल घोषाल सर ने आगे के नतीजों का ऐलान शुरू कर दिया। हर क्लास में फर्स्ट, सेकंड और थर्ड आने वाले बच्चों को उन्होंने स्टेज पर बुलाकर अपने हाथों से इनाम दिए।

जब सभी बच्चों को रिपोर्ट कार्ड मिल गए, तो प्रिंसिपल सर ने बड़े भावपूर्ण लहजे में कहा, “मेरे प्यारे विद्यार्थियो, आज का दिन सचमुच खुशी का दिन है। जैसे आपके लिए, वैसे ही हमारे लिए। आप लोगों की खुशी एक नई सीढ़ी चढ़ने की है और हमारी खुशी आपको एक के बाद एक नई-नई सीढ़ियाँ चढ़ते हुए देखने की। मुझे तो लगता है, पढ़ाते समय हम अध्यापकों को इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि आपमें से हर बच्चा अनमोल है और दूसरों से अलग है।”

फिर अचानक उन्हें गोपी का ध्यान आया। बोले, “अभी-अभी आपने गोपी को देखा। वह कहाँ से उठकर कहाँ पहुँचा, यह भी आपने देखा होगा। इससे पहले कभी यह बच्चा इस कदर लाइम लाइट में नहीं आया। पर कब, कौन, क्या कमाल दिखा दे, कहा नहीं जा सकता। बल्कि मुझे तो पता चला है कि गोपी के जितने भी टीचर हैं, वे सब उसकी यह सफलता देखकर हैरान हैं। कोई चाहकर भी उसके लिखे सवालों में कोई भूल-गलती नहीं ढूँढ़ पाया।

क्लास टीचर मि. जोशी ने तो गोपी से मजाक में कहा था कि शायद वह किसी जादूगर से टोपी ले आया है, जिसकी वजह से उसका पेन सरपट दौड़ रहा है। लगता है, उनकी बात सही थी। संयोग से गोपी ने अब भी अपनी वही पसंदीदा फिरोजी टोपी लगाई हुई है और सच कहूँ तो गोपी पर यह फबती भी है। मुझे याद आया, हमारे नगर के एडवांस्ड साइंस सेंटर के अध्यक्ष मशहूर वैज्ञानिक प्रोफेसर प्रसन्नमुखम भी कुछ-कुछ इसी तरह की टोपी लगाते हैं। हो सकता है, इस बच्चे ने उनसे ही प्रेरणा ली हो और उन्हीं की तरह आगे कुछ बनकर दिखाए।”

उसके बाद सभी को प्यार और शुभकामनाएँ देते हुए प्रिंसिपल साहब ने सभी को बूंदी के लड्डू बाँटे जाने की घोषणा की। उन्होंने हँसते हुए कहा, “हमारे यहाँ यह खुशी मनाने का देसी ढंग है और मुझे पसंद है। फिर गोगापुर तो पुराना सांस्कृतिक शहर है, जहाँ के बूंदी के लड्डुओं का वाकई कोई जवाब नहीं। लिहाजा हम लोग साथ-साथ इन्हें खाएँ, तो सबकी खुशियाँ साझी हो जाएँगी।”

*

तालियाँ…! बड़ी देर तक तालियाँ बजती रहीं। प्रिंसिपल घोषाल सर की बातों ने सबके दिल को छू लिया था। सबको लग रहा था कि आज का कार्यक्रम खत्म और अब लड्डू बाँटे जाने की तैयारियाँ होनी हैं। प्रिंसिपल सर उतरने के लिए मंच के एक साइड में बनी सीढ़ियों की ओर बढ़ रहे थे। इतने में सभी ने देखा कि गोपी तेजी से मंच की ओर जा रहा है।

अरे, यह क्या…? सब हैरान और हक्के-बक्के थे। गोपी अब मंच पर क्यों जा रहा है। और उसका चेहरा इतना काला क्यों पड़ा हुआ है? सभी का मन कह रहा था, कोई बात है, सचमुच कोई छिपी हुई बात, जो अब सामने आना चाहती है।

खुद प्रिंसिपल घोषाल हैरान। गोपी मंच पर आकर एक भी शब्द कहे बगैर कुछ झिझका हुआ सा चुपचाप खड़ा हो गया, तो वे प्यार से बोले, “हाँ बोलो गोपी, क्या बात…? तुम कुछ कहना चाहते हो?”

“हाँ, सर।” कहकर गोपी ने धीरे से गरदन हिलाई। वह गंभीर था, बहुत अधिक गंभीर ।

देखकर प्रिंसिपल घोषाल कुछ अचकचा से गए। “बोलो-बोलो, क्या कहना है गोपी?” उन्होंने फिर से गोपी का हौसला बढ़ाते हुए कहा।

“सर इजाजत दें, तो मैं माइक पर कुछ… कनफेस….!”

“तुम कनफेस करना चाहते हो? मगर क्या? तुमने कुछ गड़बड़ की है क्या गोपी?” प्रिंसिपल साहब का चेहरा जैसे बुझ-सा गया।

“यस सर…।”

“व्हाट …? क्या कहना चाहते हो तुम, बोलो?” प्रिंसिपल घोषाल जैसे गहरी उत्तेजना और ऊहापोह में हों।

“सर, मुझे सिर्फ दो मिनट में अपनी बात कहने की इजाजत दीजिए। मैं सब कुछ बता दूँगा।” गोपी ने झिझकते हुए कहा।

उसकी बात स्टेज के सामने अगली पंक्तियों में बैठे बच्चों के कानों में भी जरूर गई होगी। इसीलिए उनमें कुछ कानाफूसी सी शुरू हो गई। अभी-अभी उठकर खड़े हुए बच्चों के पाँव धीरे-धीरे जहाँ थे, वहीं थम गए और निगाहें स्टेज पर।

इस बीच अपने जज्बात पर काबू पाकर प्रिंसिपल घोषाल ने छात्रों से कहा, “मेरे प्रिय विद्यार्थियो, आप लोग अभी जाएँ नहीं। गोपी आपसे कुछ कहना चाहता है। शायद वह कुछ कनफेस करना चाहता है। आप लोग ध्यान से सुनें उसकी बात। देखें, कहीं उसके इस असाधारण रिजल्ट का कोई रहस्य तो इससे नहीं खुलने वाला? कहीं गोपी ने कोई गड़बड़ तो नहीं की? अगर इसने नकल से इतने नंबर हासिल किए हैं, तो यह मेरे लिए बड़े दुख और हैरानी की बात होगी। इसलिए कि हमारा स्टाफ नकल के मामले में बड़ा सख्त है और हमारे स्कूल की बरसों से यह गौरवशाली परंपरा चली आती है कि यहाँ आज तक कभी नकल नहीं हुई। खैर, पता नहीं, कौन सी हकीकत गोपी बताने वाला है? आपके साथ-साथ मुझे भी उत्सुकता है। गोपी आपसे कुछ कहेगा। आप उसकी बात ध्यान से सुनें।”

और प्रिंसिपल घोषाल की बात पूरी होते ही गोपी ने डरते-डरते माइक पर बोलना शुरू किया। शायद पहली बार वह इस तरह माइक पर बोल रहा था। सबकी निगाहें उसके चेहरे पर जमी थीं, और उसने थोड़ा काँपते स्वर में अपनी बात कहनी शुरू की-

“आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, अध्यापकगण और प्यारे दोस्तो,

मैं कैसे अपनी बात कहूँ, मुझे समझ में नहीं आ रहा। इसलिए कि मैं बड़ा झेंपू हूँ और मुझे बोलना नहीं आता। पर मैं आप सबके सामने कुछ कनफेस करना चाहता हूँ।”

कहकर गोपी एक पल के लिए रुका। उस समय पूरे हॉल में जैसे सन्नाटा खिंच आया हो। सबकी निगाहें गोपी पर टिकी थीं और सब जल्दी से जल्दी जान लेना चाहते थे कि गोपी के भीतर ऐसी क्या उथल-पुथल चल रही है, जो उसे स्टेज पर खींच लाई।

*

गोपी ने फिर धीरे से सुर पकड़ते हुए कहा –

“आप सब लोग जानते हैं कि हमारे स्कूल की ग्यारहवीं की क्लास बड़ी होशियार है। प्रिंसिपल सर अकसर बात-बात में इसे वेरी प्रेसटीजस क्लास कहते हैं। एक से एक ब्रिलिएंट बच्चे हैं उसमें, प्रशांत, नीना, देवेश और भी बहुत सारे हैं। लेकिन मैं तो इनके आगे किसी गिनती में ही नहीं था और न आज हूँ। यह मैं साफ शब्दों में स्वीकार करता हूँ।

तो… कायदे से तो जो इनाम मुझे मिला, उस पर मेरा नहीं, प्रशांत का ही हक था। मैंने बेवजह उसका हक मारा, मुझे इस बात का दुख है और मैं आप सबसे और प्रिंसिपल साहब से इसके लिए माफी माँगता हूँ। हाँ, इतना बता दूँ कि मैंने नकल नहीं की। यह बात सही है, एकदम सही। पर सवाल खुद मैंने भी हल नहीं किए, यह बात भी उतनी ही सही है। आपको ताज्जुब होगा, ये सवाल मैंने नहीं, मेरी इस फिरोजी टोपी ने हल किए हैं, जिसे आप भी देख रहे होंगे। मैंने तो बस, इन्हें अपने पेन से लिखा भर है और वाकई मुझे उनके जवाब नहीं मालूम। मेरी चमत्कारी टोपी मुझे सवालों के जवाब बताती गई और मैं तो बस लिखता गया… लिखता गया और फर्स्ट आ गया।”

इतना कहकर गोपी एक पल को साँस लेने के लिए रुका। पूरे हॉल में इस कदर सन्नाटा था कि लोगों की साँसों की आवाज तक सुनाई देती थी। हर किसी की आँखों में गहरी उत्सुकता। उलझे-उलझे सवाल। गोपी ने फिर आगे कहा-

“मगर…आप लोग जानना चाहेंगे, टोपी मुझे कैसे बताती गई? क्या मेरी टोपी बोलती है? और बोलती है तो उसकी आवाज बाकी लोगों को क्यों नहीं सुनाई पड़ी? आप में से कुछ को लगेगा, मैं कोई गप या किस्सा-कहानी सुना रहा हूँ? पर मेरी पूरी बात सुनेंगे, तो आपको सब कुछ पता चल जाएगा और यह भी कि यह कोई मामूली टोपी नहीं है। वाकई यह जादू वाली टोपी है, पर इसके पीछे जादू -मंतर वाला जादू नहीं, बल्कि विज्ञान का जादू है। इसलिए कि आपको भले ही टोपी नजर आ रही हो, पर असल में टोपी की शक्ल में यह एक कंप्यूटर है। पूरा कंप्यूटर, जिसमें सॉफ्टवेयर, मैमोरी, हार्ड डिस्क, इंटरनेट सब कुछ है। यहाँ तक कि की-बोर्ड और माउस भी, यह अलग बात है कि वह आपको नजर न आए। इसलिए कि इस की-बोर्ड पर उस तरह उँगलियाँ नहीं चलानी पड़तीं। सिर्फ मन में सोचो, तो सारे काम होते जाते हैं। इसी तरह माउस की भी जरूरत नहीं है। सवाल हल करते-करते बीच-बीच में मैं टोपी पर उँगलियाँ घुमाता जाता था। बस, यही मेरा माउस है, जिससे कंप्यूटर मेरा निर्देश मानता था। …

मैं असल में काफी समय से चक्कर में था। सोच रहा था, कि हमेशा प्रशांत ही क्यों फर्स्ट आता है? क्या मैं नहीं आ सकता? पर मैं तो सचमुच पढ़ाई में उतना होशियार नहीं था। तब मुझे लगा, एक बार फर्स्ट आकर दिखाना है, चाहे जो हो जाए। और बस, मैंने कप्यूटर से जुड़ी किताबें पढ़नी शुरू कीं, इंटरनेट की मदद ली और आखिर यह कंप्यूटराइज्ड टोपी बना ली। मैं मन ही मन जिस चैप्टर का नाम लेता, वही खुल जाता और उसकी मैमोरी मेरी दिमागी मैमोरी से जुड़ जाती। बस, फिर सवालों के जवाब लिखना मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं था। हाँ, इसके लिए इस फिरोजी टोपी को कभी-कभी मुझे उँगलियों से छूना भर पड़ता था। और यह काम मैं पेपर देते हुए इस कदर चुपके-चुपके कर लेता था कि किसी का इस पर ध्यान ही नहीं गया।…

गोपी फिर एक पल के लिए रुका। साफ लग रहा था, उसके भीतर कोई गहरा अंधड़ चल रहा है। उससे किसी तरह उबरकर, धीमे, बहुत धीमे स्वर में बोला-

“यों मैंने सोचा था कि सबको हैरान कर दूँगा, और मैं वाकई सफल भी हो गया। पर…अभी-अभी मैंने प्रिंसिपल सर का भाषण सुना। वह इतना दिल को छू लेने वाला था, इस कदर भावनापूर्ण कि मैं अवाक् रह गया। उनके मुँह से अपनी इतनी प्रशंसा सुनकर मुझे भीतर ही भीतर रोना आ रहा था। मुझे लगा, गोपी तेरा इस इनाम पर कोई हक नहीं। यह तेरा नहीं, प्रशांत का है, जिसे तेरी वजह से सेकंड पोजीशन मिली। बस, उसी समय मैंने फैसला किया कि मैं यह इनाम लौटा दूँगा। …

मित्रो, मैं आप सब से माफी माँगता हूँ और प्रिंसिपल साहब से भी कि उन्होंने मुझे जो इनाम दिया और जो बातें मेरे लिए कहीं, मैं इसके योग्य नहीं हूँ। प्रिंसिपल सर से विनती है कि कृपया मुझे अपने पैर छूने की इजाजत दें, और यह आशीर्वाद दें कि आगे चलकर मैं अपनी जिंदगी में कभी सच में इनाम के लायक बनूँ।”

कहते-कहते गोपी ने आगे बढ़कर प्रिंसिपल सर के पैर छू लिए। फिर इनाम में मिला वह खूबसूरत नीला पैकेट, जिसे उसने अभी खोला भी नहीं था, प्रिंसिपल सर को लौटाते हुए कहा, “सर, इस पर मेरा नहीं, प्रशांत का अधिकार है। मैं सचमुच इसके लायक नहीं…!”

प्रिंसिपल साहब एकाएक चौंके। जैसे किसी दूसरी दुनिया से लौटे हों। प्यार से गोपी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तुम क्या हो गोपी, यह शायद खुद तुम्हें पता नहीं। पर मैं जान गया हूँ।…”

फिर उन्होंने माइक पर आकर कहा, “प्रिय छात्रो, मैंने अभी-अभी आपसे जो कहा था, गोपी ने उसे सच साबित कर दिया। मैंने आप सबसे कहा था कि यहाँ बैठे बच्चों में हर बच्चा लाजवाब है। और गोपी वाकई ऐसा ही लाजवाब बच्चा है। गोपी के कनफेशन के बाद अब ग्यारहवीं की रैंक दोबारा निकालनी पड़ेगी। प्रशांत फर्स्ट, नीना सेकंड और देवेश अब थर्ड माना जाए। पर हाँ, गोपी को भी इनाम मिलेगा। पूरे स्कूल के एक्स्ट्रा-ओर्डिनरी यानी असाधारण बच्चे के रूप में उसे ग्यारह सौ रुपए का इनाम मैं अपनी ओर से दे रहा हूँ।…”

सुनते ही पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। प्रिंसिपल सर ने भावना में डूबे स्वर में कह-

“मुझे आश्चर्य है, गोपी के क्लास टीचर मि. जोशी ने जो कहा था, गोपी ने कितने नायाब ढंग से उसे सच साबित किया। मजे की बात यह है कि उसने विज्ञान को भी किसी परीकथा की तरह मनमोहक बना दिया, जिस पर विश्वास करने का मन नहीं होता, पर विश्वास करना पड़ता है। गोपी की फिरोजी टोपी ने जो कमाल दिखाया, वह सचमुच लाजवाब है। यह एक छोटे बच्चे की बड़ी खोज है। हम इसे जानना और समझना चाहेंगे कि इतनी छोटी-सी उम्र में उसने ऐसा कंप्यूटर कैसे बना लिया? जल्दी ही मैं गोगापुर के एडवांस्ड रिसर्च सेंटर के प्रोफेसर प्रसन्नमुखम से मिलूँगा और इस बारे में बताऊँगा। उम्मीद है, वे गोपी की इस खोज के बारे में हमें कहीं ज्यादा वैज्ञानिक ढंग से बता पाएँ। … यह हम सबके लिए आनंद की बात होगी। बहुत ही आनंद की बात…!”

*

अगले दिन गोगापुर के एडवांस्ड रिसर्च सेंटर के सभागार में विशाल भीड़ थी। मानो पूरा गोगापुर वहाँ उमड़ पड़ा हो। और जब गोपी ने अपने बनाए हुए टोपी- कंप्यूटर की सारी विशेषताएँ एक-एक कर डिमांस्ट्रेशन के सहारे समझानी शुरू कीं, तो वहाँ इतनी शांति थी कि लोगों की साँसों की आवाज तक सुनाई देती। गोपी वैसे शर्मीला था, पर अपनी इस चमत्कारी टोपी के बारे में बता रहा था, तो लगता था कि इक्कीसवीं सदी का एक नन्हा वैज्ञानिक बड़ी समझदारी से अपनी नई रिसर्च के बारे में बता रहा है। इसकी कल्पना के साथ-साथ इसमें प्रयुक्त हुई टेक्नोलॉजी और कल-पुर्जों के बारे में भी उसने बताया। और यह भी कि उसके घर के पास पक्षिराजन अंकल रहते हैं, जिन्होंने बंगलुरु से कंप्यूटर साइंस में एम.टेक. की डिग्री हासिल की है। गोपी को न सिर्फ उनसे किताबें मिलीं, बल्कि उनसे रोजाना डिस्कशन से भी बड़ा फायदा हुआ।

आखिर में अपनी बात पूरी करते हुए गोपी ने कहा, “इस टोपी को पहनकर जो भी चाहे, महाज्ञानी हो सकता है। पर यह भी सही है कि इससे उन्हीं सवालों के जवाब मिलेंगे, जो इस टोपी- कंप्यूटर की मैमोरी में फीड किए गए हों।”

गोपी की बात खत्म होते ही प्रोफेसर प्रसन्नमुखम और उनके संस्थान के अन्य वैज्ञानिकों ने गोपी की पीठ थपथपाते हुए कहा, “आश्चर्य है कि हमारे शहर के इस नन्हे जीनियस का यह आविष्कार एकदम परफेक्ट है!”

फिर प्रोफेसर प्रसन्नमुखम ने घोषणा की, “हमारे यहाँ रिसर्च ज्वॉइन करने वालों के लिए एम.एस-सी. की डिग्री लाजिमी है। पर इस नन्हे वैज्ञानिक के लिए ऐसी कोई शर्त या बात नहीं है। मैं इसे ऑफर करता हूँ कि चाहे तो कल से ही जूनियर रिसर्च फेलो के रूप में ज्वाइन करके हमारे संस्थान का गौरव बढ़ाए।”

इस पर तालियों की बौछार के बीच गोपी ने ‘हाँ’ कहा, तो लगा कि गोगापुर में हर तरफ खुशियों की ताजा बयार चल पड़ी है।

सभाभवन में उपस्थित लोगों में इस कदर उत्साह भर गया था कि अखबार के रिपोर्टर हों या टीवी के एंकर हर कोई उस टोपी को एक बार तो जरूर छूकर देखना चाहता था, जिसमें पारंपरिक माउस और स्क्रीन नहीं है और सारे माइक्रो पुर्जे ऐसे कि वे टोपी के कपड़े में छिप जाते हैं… और कोई भी जिसे पहनकर विद्वान हो सकता है।

चलते-चलते प्रोफेसर प्रसन्नमुखम ने कहा, “हम चाहेंगे कि गोपी की फिरोजी टोपी का जल्दी से जल्दी पेटेंट करा लिया जाए, क्योंकि आज तक इतनी कम उम्र में किसी ने ऐसा असाधारण आविष्कार नहीं किया। यह ऐसी ज्ञानी टोपी है, जिसे पहनने के बाद कोई भी अज्ञानी नहीं रह जाएगा। हम चाहेंगे कि गोपी नई-नई खोजें करके अपनी इस टोपी में आगे और भी सुधार करे, ताकि यह हर भाषा में अनुवाद कर सके। तब दुनिया की कोई भी भाषा जानने वाला आदमी इस टोपी का फायदा उठा सकता है।”

और सभा का अंत हुआ गोपी की मम्मी के संबोधन के साथ। उन्होंने कहा, “मैं तो इससे अकसर कहती थी कि बेटा, तू इस बार पढ़ नहीं रहा। पता नहीं, क्या कलपुर्जे जोड़ता रहता है। इससे तू पास थोड़े ही होगा? इस पर इसका जवाब होता था, चिंता न करो माँ, मैं फेल नहीं हो सकता। मुझे पता नहीं था कि यह चुपके-चुपके किस कारनामे में लगा है। सब इसे बड़ी खोज मान रहे हैं, तो मुझे भी अच्छा लग रहा है।”

अगले दिन शहर में जितने भी अखबार थे, सबके पहले पन्ने पर गोपी की फिरोजी टोपी के बड़े-बड़े क्लोज-अप मौजूद थे। गोपी अपनी खूबसूरत फिरोजी टोपी पहनकर मुसकरा रहा था।

टीवी में गोपी के इस अनोखे आविष्कार की चर्चा थी। देश-विदेश के वैज्ञानिकों ने उसकी तारीफ करते हुए कहा था, कि इस तरह की संभावनाओं पर हम लोग विचार तो कर रहे थे, पर कोई बच्चा इस सपने को हकीकत में बदल देगा, हमें इसका अंदाजा न था। बहुत से मशहूर वैज्ञानिकों ने फिरोजी टोपी वाले गोपी से उसकी इस निराली खोज के बारे में बात करने की इच्छा प्रकट की थी।

और गोपी…? वह आजकल सपना देख रहा है, कि मैं इस टोपी को घर-घर पहुँचा दूँ, ताकि सारी दुनिया से निरक्षरता का अँधेरा खत्म हो जाए और ज्ञान की नवदूत बनकर यह टोपी हर चेहरे पर मुसकुर रही हो। लगता है, उसका यह सपना केवल सपना नहीं रहेगा।

ये कहानी ‘इक्कीसवीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं 21vi Sadi ki Shreshtha Baal Kahaniyan (21वी सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियां)