gaban hindi novel
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Gaban novel by Munshi Premchand: दारोग़ा को भला कहां चैन? रमा के जाने के बाद एक घंटे तक उसका इंतज़ार करते रहे, फिर घोड़े पर सवार हुए और देवीदीन के घर जा पहुंचे । वहां मालूम हुआ कि रमा को यहां से गए आधा घंटे से ऊपर हो गया। फिर थाने लौटे। वहां रमा का अब तक पता न था। समझे देवीदीन ने धोखा दिया। कहीं उन्हें छिपा रखा होगा। सरपट साइकिल दौड़ाते हुए फिर देवीदीन के घर पहुंचे और धमकाना शुरू किया। देवीदीन ने कहा,विश्वास न हो, घर की खाना-तलाशी ले लीजिए और क्या कीजिएगा। कोई बहुत बड़ा घर भी तो नहीं है। एक कोठरी नीचे है, एक ऊपर।

ग़बन नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें ग़बन भाग-1

दारोग़ा ने साइकिल से उतरकर कहा, तुम बतलाते क्यों नहीं, ‘वह कहां गए?’

देवीदीन-‘मुझे कुछ मालूम हो तब तो बताऊं साहब! यहां आए, अपनी घरवाली से तकरार की और चले गए।’

दारोग़ा -‘वह कब इलाहाबाद जा रही हैं?’

देवीदीन-‘इलाहाबाद जाने की तो बाबूजी ने कोई बातचीत नहीं की। जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जाएगा, वह यहां से न जाएंगी।’

दारोग़ा -‘मुझे तुम्हारी बातों का यकीन नहीं आता।’

यह कहते हुए दारोग़ा नीचे की कोठरी में घुस गए और हर एक चीज़ को ग़ौर से देखा। फिर ऊपर चढ़ गए। वहां तीन औरतों को देखकर चौंके, ज़ोहरा को शरारत सूझी, तो उसने लंबा-सा घूंघट निकाल लिया और अपने हाथ साड़ी में छिपा लिए। दारोग़ाजी को शक हुआ। शायद हजरत यह भेस बदले तो नहीं बैठे हैं!

देवीदीन से पूछा, ‘यह तीसरी औरत कौन है? ’

देवीदीन ने कहा, ‘मैं नहीं जानता। कभी-कभी बहू से मिलने आ जाती है।’

दारोग़ा -‘मुझी से उड़ते हो बचा! साड़ी पहनाकर मुलज़िम को छिपाना चाहते हो! इनमें कौन जालपा देवी हैं। उनसे कह दो, नीचे चली जाएं। दूसरी औरत को यहीं रहने दो।’

जालपा हट गई, तो दारोग़ाजी ने ज़ोहरा के पास जाकर कहा, ‘क्यों हजरत, मुझसे यह चालें! क्या कहकर वहां से आए थे और यहां आकर मज़े में आ गए । सारा गुस्सा हवा हो गया। अब यह भेस उतारिए और मेरे साथ चलिए, देर हो रही है।’

यह कहकर उन्होंने ज़ोहरा का घूंघट उठा दिया। ज़ोहरा ने ठहाका मारा। दारोग़ाजी मानो फिसलकर विस्मय-सागर में पड़े । बोले- अरे, तुम हो ज़ोहरा! तुम यहां कहां ? ’

ज़ोहरा -‘अपनी ड़यूटी बजा रही हूं।’

‘और रमानाथ कहां गए ? तुम्हें तो मालूम ही होगा?’

‘वह तो मेरे यहां आने के पहले ही चले गए थे। फिर मैं यहीं बैठ गई और जालपा देवी से बात करने लगी।’

‘अच्छा, ज़रा मेरे साथ आओ। उनका पता लगाना है।’

ज़ोहरा ने बनावटी कौतूहल से कहा, ‘क्या अभी तक बंगले पर नहीं पहुंचे ?’

‘ना! न जाने कहां रह गए। ’

रास्ते में दारोग़ा ने पूछा, ‘जालपा कब तक यहां से जाएगी ?’

ज़ोहरा-‘मैंने खूब पट्टी पढ़ाई है। उसके जाने की अब ज़रूरत नहीं है। शायद रास्ते पर आ जाए। रमानाथ ने बुरी तरह डांटा है। उनकी धमकियों से डर गई है। ’

दारोग़ा -‘तुम्हें यकीन है कि अब यह कोई शरारत न करेगी? ’

ज़ोहरा -‘हां, मेरा तो यही ख़याल है। ’

दारोग़ा -‘तो फिर यह कहां गया? ’

ज़ोहरा -‘कह नहीं सकती।’

दारोग़ा -‘मुझे इसकी रिपोर्ट करनी होगी। इंस्पेक्टर साहब और डिप्टी साहब को इत्तला देना जरूरी है। ज्य़ादा पी तो नहीं गया था? ’

ज़ोहरा -‘पिए हुए तो थे। ’

दारोग़ा -‘तो कहीं फिर-गिरा पड़ा होगा। इसने बहुत दिक किया! तो मैं ज़रा उधर जाता हूं। तुम्हें पहुंचा दूं, तुम्हारे घर तक।’

ज़ोहरा -‘बड़ी इनायत होगी।’

दारोग़ा ने ज़ोहरा को मोटर साइकिल पर बिठा लिया और उसको ज़रा देर में घर के दरवाजे पर उतार दिया, मगर इतनी देर में मन चंचल हो गया। बोले, ‘अब तो जाने का जी नहीं चाहता, ज़ोहरा! चलो, आज कुछ गप-शप हो । बहुत दिन हुए, तुम्हारी करम की निग़ाह नहीं हुई।’

ज़ोहरा ने जीने के ऊपर एक कदम रखकर कहा, ‘जाकर पहले इंस्पेक्टर साहब से इत्तला तो कीजिए। यह गप-शप का मौक़ा नहीं है।’

दारोग़ा ने मोटर साइकिल से उतरकर कहा, ‘नहीं, अब न जाऊंगा, ज़ोहरा!सुबह देखी जाएगी। मैं भी आता हूं।’

ज़ोहरा -‘आप मानते नहीं हैं। शायद डिप्टी साहिब आते हों। आज उन्होंने कहला भेजा था।’

दारोग़ा-‘मुझे चकमा दे रही हो ज़ोहरा, देखो, इतनी बेवफ़ाई अच्छी नहीं।’

ज़ोहरा ने ऊपर चढ़कर द्वार बंद कर लिया और ऊपर जाकर खिड़की से सिर निकालकर बोली, ‘आदाब अर्ज़।’

दारोग़ा घर जाकर लेट रहे। ग्यारह बज रहे थे। नींद खुली, तो आठ बज गए थे। उठकर बैठे ही थे कि टेलीफोन पर पुकार हुई। जाकर सुनने लगे। डिप्टी साहब बोल रहे थे – इस रमानाथ ने बड़ा गोलमाल कर दिया है। उसे किसी दूसरी जगह ठहराया जाएगा। उसका सब सामान कमिश्नर साहब के पास भेज देना होगा। ‘रात को वह बंगले पर था या नहीं ?’

दारोग़ा ने कहा, ‘जी नहीं, रात मुझसे बहाना करके अपनी बीवी के पास चला गया था।’

टेलीफोन- ‘तुमने उसको क्यों जाने दिया? हमको ऐसा डर लगता है, कि उसने जज से सब हाल कह दिया है। मुक़द्दमा का जांच फिर से होगा। आपसे बड़ा भारी ब्लंडर हुआ है। सारा मेहनत पानी में फिर गया। उसको ज़बरदस्ती रोक लेना चाहिए था।’

दारोग़ा -‘तो क्या वह जज साहब के पास गया था? ’

डिप्टी, ‘हां साहब, वहीं गया था, और जज भी कायदा को तोड़ दिया। वह फिर से मुक़द्दमा का पेशी करेगा। रमा अपना बयान बदलेगा। अब इसमें कोई डाउट नहीं है और यह सब आपका बंगलिंग है। हम सब उस बाढ़ में बह जाएगा। ज़ोहरा भी दगा दिया।’

दारोग़ा उसी वक्त़ रमानाथ का सब सामान लेकर पुलिस-कमिश्नर के बंगले की तरफ़ चले। रमा पर ऐसा गुस्सा आ रहा था कि पावें तो समूचा ही निगल जाएं । कमबख्त को कितना समझाया, कैसी-कैसी खातिर की, पर दग़ा कर ही गया। इसमें ज़ोहरा की भी सांठ-गांठ है। बीवी को डांट-फटकार करने का महज़ बहाना था। ज़ोहरा बेगम की तो आज ही ख़बर लेता हूं। कहां जाती है। देवीदीन से भी समझूंगा।

एक हफ्ते तक पुलिस-कर्मचारियों में जो हलचल रही उसका ज़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं। रात की रात और दिन के दिन इसी फिक़्र में चक्कर खाते रहते थे। अब मुक़द्दमे से कहीं ज्य़ादा अपनी फिक़्र थी। सबसे ज्य़ादा घबराहट दारोग़ा को थी। बचने की कोई उम्मीद नहीं नज़र आती थी। इंस्पेक्टर और डिप्टी,दोनों ने सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल दी और खुद बिलकुल अलग हो गए।

इस मुक़द्दमे की फिर पेशी होगी, इसकी सारे शहर में चर्चा होने लगी। अंगरेज़ी न्याय के इतिहास में यह घटना सर्वथा अभूतपूर्व थी। कभी ऐसा नहीं हुआ। वकीलों में इस पर कानूनी बहसें होतीं। जज साहब ऐसा कर भी सकते हैं? मगर जज दृढ़ था। पुलिसवालों ने बड़े-बड़े ज़ोर लगाए, पुलिस कमिश्नर ने यहां तक कहा कि इससे सारा पुलिस-विभाग बदनाम हो जाएगा, लेकिन जज ने किसी की न सुनी। झूठे सबूतों पर पंद्रह आदमियों की ज़िंदगी बरबाद करने की जिम्मेदारी सिर पर लेना उसकी आत्मा के लिए असह्य था। उसने हाईकोर्ट को सूचना दी और गवर्नमेंट को भी।

इधर पुलिस वाले रात-दिन रमा की तलाश में दौड़-धूप करते रहते थे, लेकिन रमा न जाने कहां जा छिपा था कि उसका कुछ पता ही न चलता था।

हफ्तों सरकारी कर्मचारियों में लिखा-पढ़ी होती रही। मनों काग़ज़ स्याह कर दिए गए। उधर समाचार-पत्रों में इस मामले पर नित्य आलोचना होती रहती थी। एक पत्रकार ने जालपा से मुलाकात की और उसका बयान छाप दिया। दूसरे ने ज़ोहरा का बयान छाप दिया। इन दोनों बयानों ने पुलिस की बखिया उधेड़ दी। ज़ोहरा ने तो लिखा था कि मुझे पचास रुपये रोज़ इसलिए दिए जाते थे कि रमानाथ को बहलाती रहूं और उसे कुछ सोचने या विचार करने का अवसर न मिले। पुलिस ने इन बयानों को पढ़ा, तो दांत पीस लिए। ज़ोहरा और जालपा दोनों कहीं और जा छिपीं, नहीं तो पुलिस ने ज़रूर उनकी शरारत का मज़ा चखाया होता।

आख़िर दो महीने के बाद फैसला हुआ। इस मुक़द्दमे पर विचार करने के लिए एक सिविलियन नियुक्त किया गया। शहर के बाहर एक बंगले में विचार हुआ, जिसमें ज्य़ादा भीड़-भाड़ न हो फिर भी रोज़ दस-बारह हज़ार आदमी जमा हो जाते थे। पुलिस ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया कि मुलज़िमों में कोई मुख़बिर बन जाए, पर उसका उद्योग न सफल हुआ। दारोग़ाजी चाहते तो नई शहादतें बना सकते थे, पर अपने अफ़सरों की स्वार्थपरता पर वह इतने खिन्न हुए कि दूर से तमाशा देखने के सिवा और कुछ न किया। जब सारा यश अफसरों को मिलता और सारा अपयश मातहतों को, तो दारोग़ाजी को क्या गरज़ पड़ी थी कि नई शहादतों की फिक़्र में सिर खपाते। इस मुआमले में अफ़सरों ने सारा दोष दारोग़ा ही के सिर मढ़ा उन्हीं की बेपरवाही से रमानाथ हाथ से निकला। अगर ज्य़ादा सख्त़ी से निगरानी की जाती, तो जालपा कैसे उसे ख़त लिख सकती, और वह कैसे रात को उससे मिल सकता था।

ऐसी दशा में मुक़द्दमा उठा लेने के सिवा और क्या किया जा सकता था। तबेले की बला बंदर के सिर गई। दारोगा तनज्ज़ुल हो गए और नायब दारोगा का तराई में तबादला कर दिया गया।

जिस दिन मुलज़िमों को छोड़ा गया, आधा शहर उनका स्वागत करने को जमा था। पुलिस ने दस बजे रात को उन्हें छोड़ा, पर दर्शक जमा हो ही गए। लोग जालपा को भी खींच ले गए। पीछे-पीछे देवीदीन भी पहुंचा। जालपा पर फूलों की वर्षा हो रही थी और ‘जालपादेवी की जय!’ से आकाश गूंज रहा था।

मगर रमानाथ की परीक्षा अभी समाप्त न हुई थी। उस पर दरोग़-बयानी का अभियोग चलाने का निश्चय हो गया।