bhullan chacha kee diwali
bhullan chacha kee diwali

Kids story in hindi: दीवाली नजदीक आ रही थी, मगर भुल्लन चाचा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। इसलिए कि कुछ रोज पहले ही मैंने और गौरी दीदी ने उन्हें शहर की दीवाली की जो हकीकत बताई थी, वह उन्हें बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी।

“अरे निक्का, भला यह दीवाली मनाने का कौन सा ढंग हुआ कि सब लोग अपने-अपने घरों में घुसे रहें। कोई बाहर ही न निकले! न-न, हम तो ऐसी दीवाली नहीं मनाएँगे। बिल्कुल नहीं!” कहते हुए भुल्लन चाचा की उदासी छिप नहीं रही थी।

कोई चार महीने पहले ही भुल्लन चाचा अपने गाँव हुल्लारीपुर से हमारे यहाँ आए थे। दिल्ली की सरोजिनीबाई कॉलोनी में। और यहाँ की दीवाली के बारे में सुन-सुनकर वे परेशान थे। मगर उनके गाँव में तो दीवाली की क्या बात थी। लोग महीनों पहले से इंतजार करते थे कि दीवाली आएगी तो क्या-क्या पकवान बनेंगे। देसी किस्म की मिठाइयों की बहार थी।

इनमें बहुत सारी मिठाइयाँ ऐसी थीं, जिनका पूरे साल इंतजार करना पड़ता था, क्योंकि दीवाली के अवसर पर ही वे कड़ाही से छुन छुन करती प्रकट होती थीं। और सजावट की चीजें भी घर की बनी हुई। लोग तरह-तरह के रंग-बिरंगे कंदील बनाते थे। उन्हें खूब ऊँचा टाँगने की प्रतियोगिता होती थी। जिसका कंदील बढ़िया बना होता और ऊँचा टँगा हुआ दूर से तारे की तरह झलमल-झलमल करता, उसे गाँव के सरपंच हरिहर काका अपने हाथ से पुरस्कार देते।

फिर दीवाली से पहले रामलीला भी तो क्या कमाल की होती थी। थी तो गाँव की रामलीला, मगर, ओह, क्या धूम थी! गाँव में बिजली का तो ठिकाना नहीं था, पर गैसे के हंडे जलाकर खूब रोशनी का इंतजाम हो जाता। ऐसी भावपूर्ण रामलीला होती थी कि कोई ढाई-तीन घंटे तक चलती, मगर देखने वाले थकते ही नहीं थे। बीच-बीच में स्त्रियों और बच्चों की प्रेमपूर्ण जय-जयकार सुनाई देती, ‘सियावर रामचंद्र जी की जै…!’

इससे रामलीला करने वालों का जोश और आनंद बढ़ जाता था। फिर कभी-कभी तो ऐसे करुण दृश्य भी आ जाते थे कि बहुत सी स्त्रियाँ तो रोने लग जातीं।

यह ठीक है कि अब गाँव में भी बहुत कुछ बदला है, पर दीवाली तो दीवाली है। त्योहारों की रानी। दीवाली पर वहाँ अब भी बहुत कुछ ऐसा है कि सच्ची-मुच्ची दिल को मोह ले। उनके हुल्लारीपुर गाँव में भी अब लोग बाजार से ला-लाकर बल्बों की लड़ियाँ लगाने लगे हैं, पर दीयों की तो बात ही कुछ और है। गाँव में दीये भला कौन नहीं जलाता और दीये न जलाओ तो भाई, काहे की दीवाली! फिर हर आदमी अपने घर को साफ करता है तो आसपास की सफाई का भी खयाल रखा जाता है। पूरा गाँव एकदम नया-नया और चमकीला सा लगता है।

बच्चों की तो वहाँ क्या ही मौज थी। इसलिए कि कुछ समय से बच्चा पार्टी को ही तो हुल्लारीपुर गाँव की रामलीला का जिम्मा मिल गया था। और बच्चे इस मौके पर जो कमाल दिखाते, उसे देखने के लिए तो आपको गाँव हुल्लारीपुर ही चलना पड़ेगा। गाँव के भदरी काका बच्चों के दोस्त ठ
हरे। उन्हें पूरी रामायण ऐसे याद थी कि उठते-बैठते हमेशा उनके मुँह से चौपाइयाँ झरतीं। बच्चों पर जब रामलीला का जिम्मा आया, तो सारे बच्चे मिलकर भदरी काका के पास गए। बोले, “भदरी काका, अब आप ही बेड़ा पार लगाएँगे!”

भदरी काका झट तैयार हो गए। बोले, “ठीक है, अपन करेंगे, करके दिखा देंगे। अरे, बच्चों ने तो बड़े-बड़े काम कर डाले इस देश में। रामलीला की तो बात ही क्या है!” फिर सुनाने लगे कि वे बचपन में लक्ष्मण बने थे तो कैसे सारी धनुहीं तोड़-तोड़ के उन्होंने फेंक डालीं और फिर अपने तेज-तर्रार संवादों से परशुराम जी को ऐसा छकाया कि देखकर सारी सभा हक्की-बक्की…!

भुल्लन चाचा को याद आया, पिछले बरस गाँव में बच्चों की रामलीला में वे रावण बने थे और उन्होंने क्या कमाल का रोल किया था। रावण जैसी बड़ी-बड़ी मूँछें और रोबदार आवाज क्या ऐसे ही आ जाती? पर भदरी काका ने मदद की। कपड़े की मूँछें बनाकर बड़ी सफाई से चिपकाई गई और आवाज के उतार-चढ़ाव का नाटकीय तरीका भी भदरी काका ने ही सिखाया। बस, फिर तो रावण के ऐसे गजब के संवाद बोले उन्होंने कि लोगों को लगा, सच्ची-मुच्ची का रावण सामने मौजूद है। रामलीला देखने वाले अपनी जगह से तिल भर हिलने को तैयार नहीं थे।

फिर जब उन्होंने मंच पर आते ही उद्घोष किया, “मैं लंकपति….! तीनों लोकों में सबसे वीर, महा पराक्रमी… महा बलशाली…!! तो भदरी काका कितने खुश हुए थे। आसपास के गाँवों से भी उस दिन मार तमाम लोग रामलीला देखने आए थे।

वाह, कैसी अजब धूम थी! कैसा आनंद ही आनंद…!!

*

भुल्लन चाचा अपने गाँव हुल्लारीपुर की यादों में खोए थे कि फिर अचानक उन्हें मेरी और गौरी दीदी की बात याद आ गई, “अरे, आजकल शहरों में तो बुरा हाल है चाचा! दीवाली के दिन तो घरों से निकलना ही मुश्किल हो जाता है। लोग शाम से ही घरों में बंद हो जाते हैं। एक तो पटाखों की भीषण धाँय-धुम्म का कनफोडू शोर। ऊपर से ऐसा प्रदूषण कि सच्ची-मुच्ची कमजोर दिल के लोग तो कलेजा ही थाम लें…!”

उनका मन कुछ दुखी सा हो गया था।

भुल्लन चाचा सोच रहे थे, अपने गाँव से सौ- सवा सौ मील दूर दिल्ली शहर में आए तो ऐसा क्या हो गया कि दुनिया ही बदल गई। अरे भई, दीवाली तो प्यार का त्योहार है। खुशी से मिलकर बैठने का त्योहार है। आस-पड़ोस वालों के साथ मिलकर बैठने का त्योहार है। ये थोड़ी कि ठाँ-हूँ करके अड़ोसी पड़ोसी क्या, पूरे मोहल्ले वालों को बहरा कर दो। जो बेचारे बीमार हैं, उनके तो दिल दहल उठें। यह तो ठीक नहीं।

आखिर उन्होंने आसपास के मेरे पक्के दोस्तों से बात करने की सोची। सत्ते, देबू, गोविंदा, तन्ना और परमिंदर। सब आए भी, पर सोच रहे थे, ये भुल्लन चाचा तो बिल्कुल बुद्ध हैं। अरे भई, दीवाली पर बच्चे-कच्चे पटाखे न छुड़ाएँ, ऐसा हो सकता है क्या? कौन बच्चा मान जाएगा इसके लिए?

हालाँकि परेशानी तो सबको थी। भुल्लन चाचा के पूछने पर मेरे दोस्त गोविंदा ने शुरुआत की। बोला, “चाचा, शहरों में दीवाली तो बस अब धूं-धूं, धाँ-धाँ, रह गई है। पटाखे, पटाखे और बस पटाखे। … मेरे मम्मी-पापा तो उस दिन घर से ही नहीं निकलते। शाम को ही दरवाजे, खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं और फिर रात को बाहर झाँकते तक नहीं! कहते हैं, अब तो उत्पात का समय हो गया।…पर क्या करें चाचा? ये तो ऐसे ही चल रहा है, ऐसे ही चलेगा। कोई भला इसमें क्या कर सकता है। बच्चे मान ही नहीं सकते, बगैर पटाखे के भी दीवाली हो सकती है?”

“और क्या?” गौरी बोली, “तरीका तो एक ही है चाचा कि जिन्हें पसंद नहीं है, वे घर से ही न निकलें। गोविंदा की तरह मेरे मम्मी- पापा भी दीवाली पर घर से बाहर नहीं निकलते। अब तो ज्यादातर बुजुर्गों का यही हाल है। इतने पटाखे फोड़े जाते हैं, इतना शोर होता है कि लगता है, आसमान तक फट जाएगा।”

“पर कुछ साल पहले जब मैं पहले आया था, तब तो ऐसा नहीं था। होगी कोई आठ बरस पहले की बात…!” भुल्लन चाचा याद करते हुए बोले, “पटाखे तो तब भी फोड़े जा रहे थे, पर ऐसा बुरा हाल नहीं था। निक्का और गौरी के साथ हम दीयों की सजावट देखने निकले थे।… क्यों, याद है न निक्का?”

“दीये तो अब कोई-कोई जलाता है, चाचा।” मैंने कहा, “बस, झालरें ले आते हैं, उन्हें घर के आगे टाँग लो। और फिर ढेर सारे पटाखे लेकर शुरू हो जाओ धाँ-धाँ, धूं-धूँ…!”

तन्ना बोला, “चाचा, पहले तो हम लोग भी दीए जलाते थे, मोमबत्तियाँ और कंदील भी। पर अब तो पटाखे और बस पटाखों का शोर है। इतने पटाखे कि लगता है, कान बहरे हो जाएँगे। इसलिए पापा कहते हैं कि पटाखे कतई मत छुड़ाओ या फिर कम से कम पटाखे छुड़ाओ। जो भी थोड़े-बहुत छुड़ाने हैं, छुड़ा लो, फिर अंदर चलकर बैठो, क्योंकि बहुत खतरनाक हैं ये चाइनीज पटाखे और लोग तो पूरी की पूरी लड़ी छुड़ाते हैं। लगता है, जैसे दीवारें हिल जाएँगी। तो चाचा, हमने शुरू में तो छुड़ाए थे पटाखे, पर अब नहीं छुड़ाते। अच्छा नहीं लगता।”

“पर लोग तो इतना पैसा खर्च करते हैं पटाखों पर और इतने शोर वाले पटाखे चलाते हैं कि ओफ… क्या कहने!” सत्ते बोला, “गुस्सा तो बहुत आता है। मन होता है कि जो इतने शोर वाले पटाखे छुड़ाए, उससे जाकर कहें कि पटाखे तुम छुड़ा रहे हो, तो इसका शोर भी अपने पास ही रखो। हमारे कान क्यों बहरे कर दे रहे हो?”

देबू ने बताया, “मेरी दादी जी को बड़ी तकलीफ होती है। वे बेचारी बीमार जो हैं। आप यकीन नहीं करोगे भुल्लन चाचा, दीवाली वाले दिन सच्ची-मुच्ची कानों में रुई ठूंसकर सोती हैं। कहती हैं, इससे कुछ तो चैन पड़ेगा।”

गौरी बोली, “पापा कहते हैं, पहले दीवाली की सजावट देखने जाते थे। पर अब तो बाहर निकलना ही मुश्किल हो जाता है। ऐसा लगता है, जैसे लड़ाई के मैदान में पहुँच गए हों?”

सुनकर भुल्लन चाचा का चेहरा कुछ लटक गया। बोले, “यह तो अच्छी बात नहीं है। बिल्कुल, अच्छी बात नहीं…!” फिर मेरी और गौरी की तरफ देखकर कहा, “तुम लोग कुछ नहीं करते? चाहो तो कुछ तो कर ही सकते हो।”

“नहीं, कुछ बच्चों से हमारी बात हुई। वे ऊपर-ऊपर से तो मान जाते हैं, पर ज्यादातर बच्चों को इसमें मजा आता है। ऐसे लोग इतने ज्यादा हैं कि कुछ भी कर लो, फर्क नहीं पड़ता।” मैंने और गौरी ने बताया।

भुल्लन चाचा कुछ सोचते हुए बोले, “अच्छा, आज जरा अपने मोहल्ले के बच्चों को बुलाओ तो। हम उनसे बात करेंगे।”

“अरे, वो लोग या तो किताबों में मुँह घुसाए बैठे होंगे या फिर टीवी में। कुछ बच्चे अभी से ढेर सारे पटाखों के लिए जुगाड़ बैठा रहे होंगे। किसी को हजार रुपए के पटाखे चाहिए, किसी को दो हजार के। सब मम्मी-पापा के आगे ठुठुना रहे होंगे…!” सत्ते ने बुरा सा मुँह बनाकर कहा।

“पटाखे…! हजार, दो हजार के…!!” भुल्लन चाचा को जैसे करंट लगा हो। बोले, “इनसे अगर किस्से-कहानियों की बढ़िया किताबें खरीदो, उन्हें मिल-बाँटकर पढ़ो तो कितना मजा आएगा। बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा आप लोगों को। बोलो, इस बार यही करें न। दीवाली पर कैसी रहेगी यह मिठाई…?”

“बहुत अच्छी … पर चाचा, हम उन्हें समझा नहीं सकते।” तन्ना ने दो टूक शब्दों में कहा।

“अरे, तुम कहना तो कि भुल्लन चाचा बुला रहे हैं।” भुल्लन चाचा ने जोर देकर कहा।

“कह तो देंगे।” देबू ने सपाट लहजे में कहा, “पर चाचा, कह नहीं सकते कि वे लोग आएँगे कि नहीं!”

“अच्छा, तो फिर बोलना कि आज भुल्लन चाचा बड़ी मजेदार कहानी सुनाएँगे।”

सुनते ही सब बच्चों के चेहरे पर बड़ी चौड़ी मुसकान खिल गई। हँसकर बोले, “हाँ चाचा, फिर तो सब जरूर आ जाएँगे।”

*

और वाकई शाम को हमारी छत पर पच्चीस-तीस बच्चों का हुजूम मौजूद था। सबके होंठों पर एक ही सवाल, “अरे निक्का, कहाँ हैं तुम्हारे भुल्लन चाचा…? और भई, कहानी…? तुम्हारे भुल्लन चाचा जरा ठीक से सुनाते हैं।”

“अरे, ऐसी कहानी सुनाएँगे कि तुम बरसों तक याद ही करते रहोगे।” मैंने हँसते हुए कहा, “बस, आते ही होंगे। कहकर गए हैं कि तुम लोग जरा देर बैठो, मैं अभी आया…!”

“कहीं कहानी की तलाश में तो नहीं चले गए…?” छुटकी ने तीर मारा तो सारे बच्चे हो हो, हो-हो करके हँसे।

फिर वे जरा गपशप में लगे ही थे कि अचानक लगा, हवा में कुछ हलचल है। कुछ विचित्र फर-फर फर- फर सी हो रही है। जैसे कोई चुपके से कानों में कह रहा हो कि होशियार, अभी कुछ होने वाला है! और तभी अचानक भुल्लन चाचा नमूदार हुए। मगर कुछ ऐसे अंदाज में कि जितने भी बच्चे-कच्चे वहाँ थे, सबके मुँह खुले के खुले रह गए, कि “अरे, बाप रे… बाप! यह क्या…?”

सामने भुल्लन चाचा नहीं, रावण खड़ा था। वाकई रावण। काले चोगे और बड़ी-बड़ी मूँछों वाला। चेहरे पर वही घमंड और भारी ठसक, जो बस रावण के चेहरे पर ही नजर आती है। साथ ही हवा में फड़कती भुजाएँ, जैसे अभी पूरी धरती को उठाकर आसमान में फेंक देंगी। अरे भई, यह तो सच्ची-मुच्ची का रावण है! बच्चे हैरान। पर वे आगे कुछ सोचें, इससे पहले ही रावण के गरजदार, लरजदार संवाद शुरू हो गए। उसने आते ही दोनों भुजाएँ तानकर बड़े अभिमान के साथ कहा, “इस पृथ्वीतल पर सब लोग अच्छी तरह सुन लें! मैं वही लंकापति हूँ, काल जिसके घर पानी भरता है। और देवता जिसके आगे थर-थर काँपते हैं। मैं वही रावण हूँ, वही…सबको रुलाने वाला रावण! हा-हा-हा-हा-हा…!!”

और फिर उसने एक के बाद एक ऐसे कमाल के डायलॉग सुना दिए कि सारे बच्चे ‘रावण जी, रावण जी!’ कहकर लट्टू हो गए।

अब तक राज खुल चुका था कि ये रावण जी कोई और नहीं, हम सबके प्यारे भुल्लन चाचा ही हैं। पर ‘रावण जी’ बोलने का कुछ अलग ही मजा था। एक छोटे बच्चे परमिंदर ने तो कह ही दिया, “रावण जी, हुण तुस्सी मैंन्नू जल्दी कोई कहाणी सुणाओ। छेती करो, छेती …!”

इस पर आवाजें लगनी शुरू हो गईं, “हाँ-हाँ, कहानी, कहानी, कहानी …! रावण जी कोई नई कहानी। … बढ़िया सी!!”

फिर तो रावण जी ने सच्ची-मुच्ची कहानी सुनाई, पर भुल्लन चाचा बनकर। बोले, “अच्छा सुनो, सचमुच की कहानी। और वह यह कि हमारे गाँव में कैसे शुरू हुई रामलीला…?” फिर थोड़ा गला खखारकर बोले-

बड़े दिन पहले की बात है, हमारे गाँव में ऐसी रामलीला होती थी कि दूर-दूर तक उसका नाम था। यहाँ तक कि शहर से भी लोग उसे देखने आया करते थे। और गाँव में रामलीला के कर्ता-धर्ता थे जमींदार राघवेंद्रबहादुर सिंह। राघवेंद्रबहादुर सिंह को खुद भी अभिनय में रुचि थी। कभी-कभी खुद भी दशरथ का पार्ट करते थे। रामलीला में कितना भी खर्च हो, उन्होंने कभी परवाह नहीं की। उनके बाद उनके बेटे गजेंद्रबहादुर सिंह ने यह परंपरा जारी रखी। पर जमींदार साहब की तीसरी पीढ़ी के लोग गाँव से शहर चले गए, और फिर पोते-पोतियाँ विदेश गए तो वहीं के हो गए। गाँव में बरसों से चला आ रहा रामलीला का सिलसिला भी खत्म हो गया। लोग रामलीला देखने के लिए तरस गए।

अब तो गाँव के लोग परेशान। कुछ लोग पड़ोस के कुबेरपुर गाँव में रामलीला देखने जाते, पर उसमें वैसा आनंद कहाँ। फिर एक परेशानी यह भी थी कि वहाँ से रात में घर आओ। स्त्रियाँ, बच्चे सब परेशान। इस पर बच्चों ने शोर मचाया, “रामलीला होनी चाहिए, अपने गाँव में रामलीला!” बुजुर्गों ने कहा, “ठीक है, तो मना कौन करता है? करो तुम लोग।”

सब एक ही बात कह रहे थे, “बाहर से रामलीला मंडली बुलाने पर तो बड़ा खर्च आता है। जमींदार राघवेंद्रबहादुर सिंह के परिवार वाले तो अब रहे नहीं। तो फिर कौन करेगा इतना खर्च?”

इस पर बच्चे मिलकर अपने प्यारे भदरी काका के पास गए, जो बच्चों को बहुत प्यार करते थे। भदरी काका सबको ले गए जमींदार रहमत साहब के पास। गाँव के जमींदार थे रहमत साहब। बोले, “राम-सीता क्या हमारे नहीं हैं भदरी काका? वे तो सबके हैं।… तुम अच्छी से अच्छी रामलीला मंडली बुला लो काशी से। जो भी खर्च आएगा, मैं दूँगा।”

पर तब तक हम बच्चों का रामलीला खेलने का मन बन चुका था। सो बाहर से मंडली बुलाने के बजाय खुद बच्चों ने रामलीला खेलने का निर्णय किया। शुरू में तो किसी को भरोसा ही नहीं था कि बच्चे भी कुछ कर सकते हैं। पर सारे बच्चे डट गए। खूब रिहर्सल पर रिहर्सल। भदरी काका ने खूब तैयारी करा दी।

बस, फिर तो ऐसी रामलीला हुई हुल्लारीपुर गाँव में कि हर कोई हैरान। तब से अब तो हर साल बच्चा पार्टी ही हमारे गाँव में रामलीला करती है।… और गाँव के बड़े-बुजुर्ग लोग देख-देखकर ऐसे मुग्ध होते हैं कि बीच-बीच में जब सब मिलकर बोलते हैं, ‘सियावर रामचंद्र की जय…!’ तो बस समझो कि आसमान तक गूँज उठता है।…

“तो भई, ये थी कहानी हमारे गाँव में रामलीला शुरू होने की, जिसमें सारा कमाल दिखाया बच्चों ने! और गाँव के सारे लोगों ने पीठ थपथपाई हमारी…कहो बच्चो, कैसी रही?” अपनी दिलचस्प कहानी खत्म करके, रावण की फुल ड्रेस रिहर्सल वाले पोज में भुल्लन चाचा मुसकराए।

“अरे वाह, यह तो बढ़िया आइडिया है। फिर तो हम भी कुछ कर सकते हैं।” सत्ते बोला। इस पर सारे बच्चों ने समर्थन किया, “हाँ-हाँ-हाँ, जरूर। हम लोग करेंगे मुहल्ले में बढ़िया सी रामलीला! क्यों भुल्लन चाचा, आप हमारी मदद करेंगे ना?”

“मगर अब समय ही कितना है! दीवाली को सिर्फ तीन रोज बचे हैं। आज से चौथे दिन दीवाली। तो अब करें तो क्या करें…? इतनी जल्दी में क्या हो सकता है?” भुल्लन चाचा असमंजस में।

“अरे भुल्लन चाचा, आप करोगे तो हो सकता है। जरूर हो सकता है।” सारे बच्चे मिलकर चिल्लाए।

“तो ठीक है, हम लोग मिलकर कल और परसों तैयारी करेंगे। दीवाली से एक दिन पहले शाम के समय होगी हमारी रामलीला। उसमें राम के वन से लौटने के बाद का दृश्य हम लोग दिखाएँगे। और उसके बाद भरत मिलाप होगा। एक ओर से राम आएँगे, दूसरी ओर से भरत। फिर दोनों भाई जब गले मिलेंगे तो कैसा सुंदर, भावनापूर्ण दृश्य होगा। देखकर सब मुग्ध हो जाएँगे।… 1… क्यों बच्चो, क्या कहते हो?”

“वाह… वाह, सुंदर! बड़ा सुंदर…! बस भुल्लन चाचा, आप तैयारी शुरू कर दो अभी से।” सत्ते, मीतू, निक्का, तन्ना, गोविंदा सब मिलकर बोले।

“तो ठीक है। बताओ फिर तुममें से कौन राम बनेगा, कौन सीता? लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान भी बढ़िया होने चाहिए। फिर राज परिवार के और लोग भी होंगे। जल्दी से लिखा दो अपने नाम। … पर याद रखना, सबको रिहर्सल में आना होगा और डायलॉग याद करने होंगे।” कहकर भुल्लन चाचा ने वाकई डायरी खोल ली।

*

इस पर रामलीला के लिए नाम लिखवाने वाले बच्चों की होड़ लग गई। भुल्लन चाचा ने सबके नाम लिखे। फिर कहा, “ठीक है, कल सब लोग तैयारी करके आना। कल ही सब कुछ तय कर लेंगे। तुम्हारी आवाज का टेस्ट होगा और रिहर्सल भी शुरू हो जाएगी। दीवाली से एक रोज पहले होगी हमारी रामलीला। उसी दिन सारे बच्चे मिलकर लोगों से अपील करेंगे कि कोई पटाखे न जलाए। वे पैसे अगर लोग बच्चों को दें तो हम उससे अच्छी-अच्छी कहानियों और कविताओं की सुंदर किताबें खरीदकर लाएँगे। फिर कभी-कभी कॉलोनी के बच्चों की कहानी वाली क्लास होगी। उसमें सारे बच्चे कुछ न कुछ सुनाएँगे।”

भुल्लन चाचा की बातों का बच्चों पर जादू सा हो गया था। बच्चे उसी समय से तैयारियों में लग गए। अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग टीमें बन गईं।

अगले दिन पूरे शहर में परचे बाँटे गए। उनमें रामलीला के विवरण के साथ ही बड़े मजेदार ढंग से आमंत्रण था, “सब लोग सुनो, सुनो, सुनो…! आपकी इस सरोजिनीबाई कॉलोनी में बच्चों की बड़ी अनोखी रामलीला होने जा रही है, जिसका निर्देशन भुल्लन चाचा करने वाले हैं। यह ऐसी रामलीला होगी कि एक बार देखकर आप कभी भूल नहीं पाएँगे। … और हाँ, रामलीला का आनंद लेना है तो समय से आकर स्थान ग्रहण करना न भूलें। इसलिए कि बड़ी दूर-दूर से इसे लोग देखने आएँगे। फिर न कहिएगा कि हमें बताया नहीं!”

इधर भुल्लन चाचा जुटे थे। एक ओर मेकअप की तैयारी, दूसरी ओर डायलॉग बोलने की। बच्चे भी कम नहीं थे। बढ़िया तैयारी और रिहर्सल ने बच्चों का जोश और बढ़ा दिया था। उधर घर-घर परचे बाँटकर प्रचार भी चल रहा था। एक रिक्शे पर भी बच्चे पूरे शहर में घूमकर सबको इस अनोखी रामलीला के बारे में बता रहे थे।

और सचमुच कमाल ही हो गया। रामलीला देखने इतने लोग आ गए कि मैदान में तिल धरने की जगह न थी। रामलीला की शुरुआत अयोध्या में पुष्पक विमान के उतरने से हुई। आसपास विशाल जनसमूह राम और सीताजी की जय-जयकार कर रहा था। इसके बाद राम-भरत मिलाप की बड़ी अद्भुत झाँकी थी। फिर सब लोग आपस में मिले। अयोध्या के लोग कितने खुश थे, पर फिर भी आँखों से आँसू छलक पड़ते थे। हनुमानजी अयोध्या के वैभव को बड़े चकित भाव से देख रहे थे। उनकी यह अदा निराली थी। गोविंदा ने हनुमान का अभिनय करते हुए जान डाल दी थी …।

मैंने और सत्ते ने भी अपना कमाल दिखाया। हम दोनों के राम-भरत मिलाप के संवाद तो ऐसे भावपूर्ण थे कि वह दृश्य देखकर लोग गद्गद हो उठे। सब ओर राम और भरतजी का जय-जयकार हो रहा था।

रामलीला के बाद एक साथ पच्चीस-तीस बच्चे मंच पर आ गए। सब हुनमानजी की सेना वाला लाल वस्त्र धारण किए हुए। भुल्लन चाचा ने, जो मंच पर सबसे आगे खड़े थे, सब लोगों से विनती की कि वे प्रदूषण मुक्त दीवाली मनाएँ। उन्होंने कहा, “सरोजिनीबाई कॉलोनी के बच्चों ने निर्णय किया है कि उनमें से कोई पटाखे नहीं जलाएगा!… लीजिए, अब आप बच्चों से ही सुनिए, वे क्या कहते हैं।” और उसी समय सारे बच्चों ने मिलकर यह गीत सुनाना शुरू कर दिया –

हम बच्चों की यह सरकार

करती है बस, यही पुकार-

दीये जलाओ डगर-डगर

दीवाली हो जगर-मगर।

नहीं पटाखे मगर जलाना,

नहीं प्रदूषण और बढ़ाना।

विनती करती बारंबार,

हम बच्चों की यह सरकार,

नन्हे बच्चों की सरकार…!

फिर भुल्लन चाचा ने कहा, “आप लोगों से अनुरोध है कि जो पैसे पटाखों में बर्बाद करते हैं, वे हमें दीजिए। हम उन पैसों से बच्चों के लिए कहानी और कविताओं की सुंदर-सुंदर किताबें खरीदेंगे, जिन्हें पढ़कर बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन होगा और वे नई-नई बातें सीखेंगे भी। बच्चे अच्छी बातें सीखेंगे, तभी अच्छे बनेंगे। इसके लिए हम लोगों ने एक साप्ताहिक क्लास शुरू करने का भी निश्चय किया है, जिससे कि बच्चों की हर तरह की प्रतिभा का विकास हो।”

लोगों ने खुशी-खुशी भुल्लन चाचा का यह अनुरोध मान लिया। देखते ही देखते बहुत रुपए इकट्ठे हो गए। भुल्लन चाचा ही तो खजानची थे। एक-एक पाई वे अपनी डायरी में दर्ज करते जा रहे थे। पूरे बारह सौ साठ रुपए का चंदा मिला।

इसके बाद बच्चों का जलूस निकालने की तैयारी शुरू हो गई। भुल्लन चाचा ने बच्चों से कहा, “आप लोग जल्दी से रामलीला वाली ड्रेस उतारकर, अपने घर वाले कपड़े पहन लो। जुलूस में शामिल होना है।”

पर बच्चे तो कुछ और ही सोचे बैठे थे। निक्का बोला, “भुल्लन चाचा, बच्चे चाहते हैं कि सब रामलीला वाली ड्रेस में ही रहें। बाकी सारे बच्चों को हनुमान जी की सेना वाला लाल वस्त्र दे दिया है। सब ऐसे ही चलें तो लोगों पर और ज्यादा असर पड़ेगा।”

भुल्लन चाचा हँसे। बोले, “ठीक है। तुम खुश तो भुल्लन चाचा खुश।” सुनकर सब बच्चे खुशी के मारे नाचने लगे।

सचमुच बड़ा अद्भुत जलूस निकला बच्चों का। जो भी देखता, थोड़ी देर के लिए ठिठक जाता। जुलूस में आगे-आगे दो बच्चे थे, जिनके हाथों में एक बड़ा सा पोस्टर था। उस पर वही छोटी सी कविता लिखी हुई थी, जिसे अभी-अभी बच्चों ने मंच पर गाया था-

हम बच्चों की यह सरकार

करती है बस, यही पुकार-

दीये जलाओ डगर-डगर

दीवाली हो जगर-मगर।

नहीं पटाखे मगर जलाना,

नहीं प्रदूषण और बढ़ाना…!

बच्चों का जलूस बड़े जोश के साथ आगे बढ़ता जा रहा था। रास्ते में जो बच्चे मिलते. वे भी उसमें खुशी-खुशी शामिल होते जाते। सरोजिनीबाई कॉलोनी के लोग जगह-जगह इकट्ठे होकर इस अद्भुत जुलूस को देख रहे थे। उन्होंने जीवन में पहली बार ऐसा अनोखा जुलूस देखा था। कई बुजुर्ग लोग तो जुलूस रोककर बच्चों को आशीर्वाद भी देते, “बिल्कुल ठीक कर रहे हो बेटा, तुम बिल्कुल ठीक!”

कोई डेढ़-दो घंटे में पूरी कॉलोनी की परिक्रमा हो गई। रास्ते में जो लोग मिलते, वे उत्साहपूर्वक कहते, “हमने भी निश्चय कर लिया है, अब पटाखे नहीं, बिल्कुल नहीं! हम भी प्रदूषण मुक्त दीवाली मनाएँगे।”

अगले दिन दीवाली थी, पर बच्चे व्यस्त थे। इसलिए कि भुल्लन चाचा ने उन्हें नया आइडिया दे दिया था। सुबह से ही सारे बच्चे कंदील बनाने में जुट गए। भुल्लन चाचा ने कहा था, “इस बार सब लोग अपने हाथों से कंदील बनाकर घर में टाँगो। जिसका कंदील सबसे सुंदर होगा, उसे बढ़िया टॉफी का पैकेट इनाम में मिलेगा।”

सब बच्चे जुट गए। एक से एक सुंदर डिजाइन वाले कंदील बनाए बच्चों ने। रात में दीवाली की पूजा और दीये जलाने के बाद कॉलोनी के सारे बच्चे हमारे घर इकट्ठे हुए। भुल्लन चाचा के साथ-साथ सब घूमने निकले। सबके कंदील देखे गए। आखिर में सारे बच्चों ने वोट देकर चुना, सत्ते का जहाज की शक्ल में बना कंदील प्रथम आया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सत्ते को टॉफी का पैकेट मिला।

पूरी कॉलोनी का चक्कर लगाने के बाद भुल्लन चाचा लौट रहे थे, तो उनके साथ-साथ हँसती-किलकती पूरी बच्चा पार्टी थी। सब खुश थे। न कहीं पटाखों का शोर, न प्रदूषण। रास्ते में जो लोग देखते, वे भुल्लन चाचा की पीठ पर प्यार से धौल जमाकर कहते, “अरे भुल्लन, तुमने तो बड़ा कमाल किया। कितने बरसों बाद चैन से दीवाली मनाई सबने …!”

महिलाओं की टोली की प्रमुख थीं शीला चाची। बड़ी ही हँसमुख और खुशमिजाज। वे भुल्लन चाचा की बलैयाँ लेकर बोलीं, “अरे भुल्लन, तुम कोई जादूगर तो नहीं हो न! देखो तो, सारे बच्चे किस तरह तुम पर लट्टू हैं।”

जब भुल्लन चाचा मेरे और गौरी के साथ लौटकर आए, तो घर पर भी उनका जोरदार स्वागत हुआ। पापा भी बड़े प्रभावित थे। बोले, “सच्ची भुल्लन, तू तो बड़े कमाल का निकला…!”

मम्मी जोर से हँसते हुए बोलीं, “लगता तो जरा बुद्धू सा है मेरा देवर, पर होशियार इतना कि बड़े-बड़ों के कान काट ले! क्यों, मैंने ठीक कहा न, भुल्लन?”

सुनकर भुल्लन चाचा कुछ ऐसे शरमाए कि बस कुछ न पूछो।

इस पर पापा, मम्मी समेत हम सबकी ऐसी हँसी फूट निकली कि बस, रुकने का नाम ही नहीं। यहाँ तक कि भुल्लन चाचा भी शरमाना छोड़कर उस हँसी में शामिल हुए तो उनकी जोर की हो-हो, हो-हो सबसे अलग सुनाई दे रही थी।

ये कहानी ‘इक्कीसवीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं 21vi Sadi ki Shreshtha Baal Kahaniyan (21वी सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियां)