एक फकीर के पास कोई गया था और उस फकीर से पूछने लगा कि मैं पूछने आया हूँ कि मृत्यु क्या है?उस फकीर ने कहा- “भाग जाओ यहाँ से। अगर जीवन के सम्बन्ध में पूछना हो, तो मुझसे पूछो और मृत्यु के सम्बन्ध में पूछना हो, तो किसी मरे हुए आदमी को खोजो।

मैं कभी मरा ही नहीं और अब जिस दिन से भीतर गया हूँ, मैं हैरान हूँ कि लोग मृत्यु में कैसे गुजर जाते हैं? उन्हें पता ही नहीं कि भीतर जो है, वह मरता ही नहीं।”

एक कुछ है, जो सब मृत्यु को जीतकर पार निकल जाता है। लेकिन भीतर जायँगे, तो ही उसका पता चलेगा। आप तो कह रहे हैं पागल! भीतर गये तो पागलपन असम्भव है, भीतर गये तो मृत्यु असम्भव है। क्योंकि भीतर जो है, वह शाश्वत है, चिरंतन है, सदा है। लेकिन हम वहाँ कभी गये नहीं। हम अपने ही बाहर भटके हैं, जन्मों-जन्मों में, बहुत बार, वहीं घूमते रहे हैं।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)