antadi
antadi

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

लिखने में व्यस्त थी लता। लेख पूरा करके महिला पत्रिका को भेजना है। पत्रिका वालों के माँगने की प्रतीक्षा किए बगैर नियत समय से पहले ही लता अपने लेख भेज देती थी। इस बार मेहमानों का आगमन, तीज-त्यौहार आदि के कारण थोड़ी देर हो गई। गृहिणी और लेखिका दोनों काम एक साथ संभालना एक ही समय दो घोड़ों पर सवार होकर, सामने पड़ती छोटी-छोटी चुनौतियों पर काबू पाने के जैसा है।

लता महिला पत्रिकाओं में कहानी या लेख लिखा करती है। वह अपने लेखों द्वारा महिलाओं में जागृति पैदा कर रही है। पहले उसकी प्रतिभा घड़े के अन्दर के दीपक की ज्योति जैसी थी। उसके पति राम ने कहा, “इतना अच्छा लिखती हो। क्यों न पत्रिकाओं के लिए लिख भेजती।” उनकी प्रेरणा से वह अपने लेख पत्रिकाओं को भेजने लगी और वे प्रकाशित भी होने लगे। लता की प्रकाशित रचनाओं की सराहना भी करते थे उसके पति।

कई बार शादियों में भाग लेने के दौरान कोई तारीफ करते कि “लता, “मैंने आपकी लिखी कहानी पढ़ी। बहुत अच्छी थी।” कुछ लोग “लेखिका है क्या” ऐसे आदर से पूछ लेते। कुछ लोगों की भौंहें आश्चर्य से ऊपर उठतीं। कभी-कभी “जी कृपया आप मेरी कहानी लिखें” जैसे प्यार भरा अनुरोध। पत्रिका वाले पूछते कि “आप हमारी पत्रिका के लिए लेख भेज सकती हैं क्या?” इन प्रेरणादायक शब्दों ने लता को आगे बढ़ाया। आज ऐसी स्थिति आ पहुँची कि लता के नाम के बिना कोई पत्रिका नहीं निकलती। इस प्रकार वह घड़े के अन्दर की ज्योति से पहाड़ी पर की ज्योती बन गयी।

कॉलिंग बेल बजी। “सरला! देख आओ बाहर कौन है? सब्जी वाली है तो बोल दो कि कुछ नहीं चाहिए।”

नौकरानी पूछकर आयी।

“आपसे मिलने के लिए ही कोई औरत आयी हैं। उसने अपना नाम कण्णम्मा कहा।”

नाम सुनकर लता की समझ में नहीं आया। पत्रिका में कुछ लिखवाने के लिए कोई आयी होगी, ऐसा सोचकर उसने सर उठाया।

“सोचा आपको देख ही नहीं सकती। मेरा सौभाग्य है कि मैंने देख लिया। कैसी हो माँ?”

लता सोफे पर बैठी थी। कण्णम्मा ने पास आकर नजर उतारी। फिर लता के पैरों के पास बैठ गयी। हाथ की थैली खोलकर खरीदे हुए नारंगी के फल बाहर निकाले। महकते चमेली के तंते को भी निकाला। एक भक्त ईश्वर को चढ़ावा समर्पित करने के जैसे विनीत भाव से लता के हाथ में समर्पित किया।

“ले लो बाल में रख लो माँ। नए-नए फूल गूंथ रही थी तो ले आई।”

“यह सब क्या है कण्णम्मा” साधिकार लता ने डाँटा।

फिर बोली, “खैर, बाद में बातें करेंगे। पहले बोलो क्या खाओगी?”

“कुछ नहीं होना बाबा! तुम्हें देखते ही मेरा मन और पेट भर गया।”

लता ने सरला से गरम कॉफी लाने को कहा। चलते पंखे की तेजी को बढ़ाया। लिखने के लिए जो कागज थे सभी बंद करके रख दिए। यह सोचकर चुप्पी साधकर बैठ गयी कि कण्णम्मा को थोड़ी राहत मिले।

यादें कई साल पीछे चली गईं।

अभी-अभी लता की शादी हुई थी। इतनी सुप्रसिद्ध लेखिका न होने पर भी इधर-उधर एक दो लेख लिखती पत्रिका दुनिया में सिर दिखा रही थी।

कण्णम्मा का पति राजप्पन नारियल के पेड़ पर चढ़कर नारियल तोड़ता था। नन्हें-नन्हें चार बच्चे। एक घर के पेड़ पर चढ़ता तो गली के सभी घरों में उसे बलाते. सही कली देते। कभी-कभी तो थोडी-सी कॉफी या बासी इडली मिलती। राजप्पन के तोड़े नारियल को इकट्ठा करके रखने के लिए कण्णम्मा उसके साथ ही आती। कण्णम्मा बड़ी हँसमुख थी। हाथ से छीन के काम करती।

अचानक एक दिन कण्णम्मा रोती-कलपती आयी। पूछने पर मालूम पड़ा कि पेड़ पर चढ़ा राजप्पन पेड़ पर से नीचे गिर गया। घायल हुआ तो अस्पताल में भर्ती करवा के इलाज किया गया परन्तु वह मर गया।

जो गया सो गया। अब उस परिवार की स्थिति! छोटे-छोटे बच्चे। पेंशन-वेंशन तो मिलेगा नहीं। राजप्पन जैसे लोगों के लिए जीवन में कौन-सी सुरक्षा है? लता ने सोचा कि उस परिवार की मदद कैसे करें? कॉफी, नाश्ता और पचास रूपए? ज्यादा से ज्यादा पाँच सौ रूपए? ये पैसे कण्णम्मा और बच्चों के लिए कितने दिनों तक काफी होगा?

“वह तो चला गया। तुम क्या करने वाली हो कण्णम्मा?”

“मैं क्या कर सकती हूँ जी? पढ़-लिखकर दफ्तर में काम करती हूँ क्या? मायके जाने की सोचूँ तो वहाँ की हालत इससे भी बदतर है। पाँच जनों का पेट कौन भर सकता है? बड़ा बेटा स्कूल में पढ़ रहा है। सोच रही हूँ कि उसकी पढाई बंद करके घर पर ही रोक लूँ। सबसे छोटे वाले के हाथ-पाँव काम नहीं करते। उसे अकेले छोड़कर बाहर नहीं जा सकती। बड़ा छोटे को देख लेता तो चार-पाँच घरों में बरतन माँजकर पेट भर सकती।”

“घर पर ही रह कर तुम और क्या काम कर सकती हो कण्णम्मा?”

“मैं और क्या जानूँ माँ? वे पेड़ पर चढते और हमारा गुजारा हो रहा था। घर पर रहने वाली मैं तो इडली ही बनाना जानती हूँ।”

“वही कर सकती हो न?”

“आप क्या बोलती हैं जी, मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता।”

“दो दिन बाद आकर मुझसे मिलो तो मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाएगी।”

लता की एक कहानी दो हजार रुपए से पुरस्कृत है। उन पैसों से मोती के एक जोडे बाली खरीदने की इच्छा थी उसे। अब उसे लगा कि यदि उन पैसों से कण्णम्मा की मदद करूँ तो एक परिवार का उद्धार होगा। उसने राम से भी अपना विचार बाँट लिया।

उन्होंने कहा, “अच्छा सुझाव है। बाली कहाँ जानेवाली है? कभी भी खरीद सकते हैं।”

दो दिन बाद कण्णम्मा आयी। लता उसे भी साथ लेकर बाजार गयी।

इडली और बड़ा बनाने के लिए स्टोव, इडली बनाने का पतीला, थाली, कड़ाही आदि उपकरण खरीदे।

“लो कण्णम्मा चार लोगों को खाना खिलाने का काम कभी नहीं रुकता। जो करती हो ईमानदारी से करो। जो पैसा मिले परा खर्च नहीं कर देना। अपने लिए कम से कम दस रुपए जमाकर अलग से रखना। किसी भी स्थिति में बच्चों की पढाई मत रोकना।”

कृतज्ञता में कण्णम्मा बात नहीं कर पायी। भर्राए गले से हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उसके दो ही दिन के बाद “लता नाश्ता घर” नाम का तख्ता कण्णम्मा के घर के बाहर लटकाया गया। कण्णम्मा ने लता के हाथों ही नाश्ता घर शुरू कराया।

कई साल बीत गए। अब लता को ऐसा लगा कि ये सब घटनाएँ कल ही घटी हो। इसी बीच लता के दो बच्चे हुए। राम का तबादला हुआ। अन्य जगहों पर रहकर फिर से वहीं आ पहँचे। लता ने कण्णम्मा की जो मदद की थी, उसे तभी के तभी भूल चुकी थी।

तुम भूल सकती हो राजकुमारी। क्या मैं भूल सकती हूँ? वह भूलने लायक मदद है क्या? परिवार का दीपक जला दिया तुमने। जीने का रास्ता ही नहीं दिखाई पड़ा तो मैं मर जाना चाहती थी। तुमने ही जीने का रास्ता दिखाया। तुम्हारे कहे अनुसार व्यापार किया। “मेरे हाथ का स्वाद, कंपनी वालों को अच्छा लगा और वे बोले कि पूरी कंपनी को भोजन सप्लाई करूँ। धीरे-धीरे अन्य कंपनी वाले भी माँगने लगे। अपने साथ कुछ सहायकों को भी मिला लिया है। वेन भी खरीद चुकी हूँ। घर आकर तुम्हें ढूंढा। आस-पड़ोस वालों ने कहा कि तबादला हो गया है। पूछ-ताछ करके देखा। पता न लगा पाई।”

“तुम्हारे बच्चे” लता ने उत्सुकता से पूछा।

“तुम्हारी कृपा से आराम से हैं। बड़ा पढाई के साथ व्यापार भी देख लेता है। बाकी दोनों भी पढ़ रहे हैं। छोटे का इलाज करवाया। अब हाथ-पाँव ठीक हो गए। अब वह भी पढ़ रहा है। बड़े बेटे ने ही पत्रिका में तुम्हारी तस्वीर दिखाई। पत्रिका कार्यालय वालों से फोन द्वारा पता लगा के यहाँ आयी हूँ।”

बोलते-बोलते उसने लता के पाँव पड़कर प्रणाम किया।

“अरेरे! यह क्या कण्णम्मा! मैंने जो किया, वह मामूली-सी मदद है। पाँव पड़कर मुझे देवी न बना देना।”

“हमारे लिए तुम देवी ही हो। तुम्हीं हमारी कुल देवता हो। ले लो देवी के लिए चढ़ावा लाई हूँ।”

कण्णम्मा के हाथ की हुंडी देखकर बिना समझे लता ने पूछा “यह क्या है?”

“व्यापार के शुरू किए दिन से थोड़ा-सा पैसा भगवान के नाम पर हुंडी में लगाती आयी। उसे तुम्हारे हाथों सौंपने के लिए ले आयी, ले लो माई।” विनम्रता से कण्णम्मा ने हुंडी लता के हाथों सौंपी।

मेरा छोटा-सा कार्य कितना बड़ा फल दिया है! लता ने अभिमान से सोचा। उसके मन में आया कि छोटी-सी दियासलाई से निकला प्रकाश कितनी बड़ी ज्योति बन गयी। अपने को सद्बुद्धि देने वाले ईश्वर को धन्यवाद समर्पित किया। उसे लगा कि यह सत्कर्म यहीं पर रुक न जाना है।

“कण्णम्मा क्या तुम्हें मालूम है कि अन्तादि नाम से कविता रची जाती है?

“मैं क्या जान माई अन्तादि-वन्तादि?”

“एक श्लोक के अंतिम शब्द को ही पहले शब्द बनाकर अगला श्लोक शुरू होगा। उसी को अन्तादि कहते हैं। हम भी वही करने वाली हैं। मैंने लिखना शुरू किया तो मुझे जो राशि पुरस्कार स्वरूप मिली, उसे मैंने तुम्हें दे दी। अब मैं एक सुप्रसिद्ध लेखिका बन गयी। मैंने जो दिया उसे पूँजी बना कर तुमने छोटा-सा व्यापार शुरू किया और अपने परिवार को भी अच्छे ढंग से आगे बढ़ाई हो। इस हुंडी में जमा पैसों से तुम जैसे बे-सहारों को जीने का रास्ता दिखाओ। सिलाई जानने वाले हैं तो सिलाई मशीन खरीद दो। तुम जैसी हो तो होटल रखने की सुविधा करा दो। यदि हम अपने आस-पास के लोगों को आराम से जीने के लिए यथा शक्ति सहायता करें तो काफी है। लेकिन उनके सामने एक शर्त यह रख देना कि बदले में वे भी एक या दो जनों का उद्धार करें। अच्छा कार्य जारी रहे, क्या बोलती हो कण्णम्मा?’

मैं क्या बोलने वाली हूँ माई! मेरा बेटा भी कह रहा था कि उसके साथ पढ़ने वाले लड़के के घरवाले बहुत मुश्किल से जी रहे हैं। उसने कहा है कि एक जेराक्स मशीन मिले तो पढाई के साथ-ही-साथ कमाऊँगा। पहले वह खरीदने की व्यवस्था करती हूँ। पड़ोस में एक लड़की है जिसे पति ने छोड़ दिया है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है। उसे ग्राइन्डर खरीद देती हूँ। ठीक है न माई।

बहुत ठीक, ऐसा ही करो। पूरे शहर को तुम खिलाती हो। अब तुम्हारे लिए मैं अपने हाथ से पूड़ी बना के देती हूँ।

“खाकर जाना” कहते हुए पूड़ी बनाने के लिए उठी लता का मन भर आया।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’