इससे पहले मैंने कभी उनको देखा नहीं था क्योंकि मेरे दादा मिलिट्री में कर्नल थे और उनकी पोस्टिंग ऐसी जगह थी कि उन्हें घर आने की छुटट्टïी ही नहीं मिलती थी।
मेरी बर्थडे पार्टी चल रही थी। सबके कहने के बावजूद मैं केक काटने को तैयार नहीं था क्योंकि मैं अपने दादाजी के साथ केक काटना चाहता था। ट्रेन लेट होने के कारण उन्हें आने में देरी हो रही थी।
इतने में ही हृष्ट-पुष्ट, लंबा-चौड़ा, बड़ी-बड़ी मूंछो वाला एक स्मार्ट आदमी आया और पापा ने मुझसे कहा कि बेटा इनके पैर छुओ, यह तुम्हारे दादाजी हैं। उन्हें देखते ही मेरे मुंह से निकला कि यह दादाजी नहीं हो सकते, यह तो डाकू हैं। मेरे ऐसा कहते ही वहां खड़े सभी लोग हंसने लगे। दादाजी मुझे गोद में उठाकर बोले कि बेटा तुमने ठीक कहा है कि मैं डाकू हूं, क्योंकि मेरी जैसी बड़ी-बड़ी मूंछों वाला लंबा-तगड़ा आदमी को ब”ो लोग डाकू ही तो कहेंगे। आज भी इस घटना के याद करते हैं तो हंसी आ जाती है।

2- मुझे टुनटुन टेबल पढ़ना है
बात उन दिनों की है, जब मेरी उम्र चार और मेरे भाई की उम्र 8 वर्ष की थी। उसे पढ़ाने के लिए हमारे घर पर एक ट्यूटर आया करते थे। एक दिन जब वो ट््यूटर मेरे भाई को पढ़ा रहे थे, तभी दरवाजे के कोने से छुप कर मैं उन दोनों को झांक कर देख रही थी। मुझे देखते ही उन्होंने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और प्यार से कहा, ‘बेटा आइए, आज मैं आपको ए बी सी डी पढ़ना सिखाऊंगा।’ इतना सुनते ही मैंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘नहीं मास्टर जी, मैं ए बी सी डी नहीं पढ़ूंगा। मुझे आप से ‘टुनटुन टेबल’ पढ़ना है।’ मेरे इतना बोलते ही मास्टर जी ठहाका मार कर हंस पड़े। दरअसल मास्टर जी अक्सर मेरे भाई को वन और टू की टेबल पढ़ाया करते थे, जिसको मैंने ‘टुनटुन टेबल’ का नाम दे दिया था। आज भी जब मुझे इस घटना की याद आती है, तो मेरे होंठों पर मुस्कुराहट तैर जाती है।

जग भरकर चाय पीते होंगे
बात तब की है जब मैं छोटी बच्ची थी। जब घर के सभी सदस्यों के लिए मां चाय बनाती तो मेरी चाय पीने की इच्छा होने के बावजूद वो मुझे चाय पीने के लिए नहीं देती। बोलती थी कि, ‘बेटी, तुम दूध पीयो’ चाय पियोगी तो काली हो जाओगी।’ उनकी यह बात मेरे मन में घर कर गई। एक रोज मेरे पापा के ऑफिस के दोस्त घर पर मिलने आए। मां ने उनके लिए पकौड़े तले और चाय बनाई।
पापा के दोस्त कुछ ज्यादा ही सांवले थे, उन्हें देख मैं खुद को रोक नहीं पाई और बोल पड़ी कि अंकल, आप बचपन में जरूर पूरा जग भरकर चाय पीते होंगे तभी इतने काले हो। मेरी बात सुनकर वे सकपका गए। बाद में जब मेरी मम्मी ने उन्हें मेरी बात का कारण बताया तो वे नॉर्मल हुए और ठहाका लगाकर खूब हंसे। बचपन की यह मासूम याद आज भी गुदगुदा जाती है।
