हिंदी हमारी मातृभाषा है और  मातृभाषा होने के बावजूद लोगों में हिंदी के प्रति रुझान काफी कम होता जा रहा है।  खासतौर पर युवाओं के बीच तो हिंदी भाषा की कोई कद्र ही नहीं रहा गई  है। युवाओं में अन्य भाषाओं का ऐसा रंग चढ़ा है कि आपस में बातचीत  करने के लिए भी वो हिंदी भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं। बड़ी ही विडंबना है कि लोग हिंदी में बात करना अपनी तौहीन समझते हैं। हिंदी में बात करना तो दूर वो तो हिंदी के कई सरल शब्दों का अर्थ तक नहीं समझते हैं। यह एक चिंता का विषय है। राष्ट्रभाषा के विकास के बिना देश का विकास होना असंभव है।जहां  एक ओर  हिंदी भाषा और हिंदी भाषा की रचनाएं धूल खाती नज़र आने लगी हैं, वहीं अंग्रेजी भाषा अपने चरम शिखर पर पहुंचती जा रही हैं।

सभी भाषााओं  से श्रेष्ठ है हिंदी

वैसे तो भारत विभिन्‍न्‍ताओं वाला देश है।  यहां हर राज्‍य की अपनी अलग सांस्‍कृतिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान है। यही नहीं सभी जगह की बोली भी अलग है। लेकिन हिंदी का सम्मान करना मतलब हमारी संस्कृति का सम्मान करना भी है क्योंकि मातृभाषा के रूप में अलंकृत हिंदी वास्तव में सभी भाषााओं  से श्रेष्ठ है। जहां मातृ भाषा का सम्मान हमारा नैतिक कर्त्तव्य होना चाहिए वहीं मातृ भाषा की तौहीन व्यक्ति विशेष की तौहीन होनी चाहिए।

मातृभाषा आज  भी उपेक्षित है

बहुत ही ज्यादा दुख की बात है कि हिंदी हमारी मातृभाषा होते हुए भी आज उपेक्षित है। कोई भी सरकारी दफ्तर हो या बैंक, हिंदी को बढ़ाने को लेकर बहुत बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं जबकि उन दफ्तरों की सच्चाई पर नज़र डालें तो वहां  भी सारा काम अंग्रेजी में ही किया जाता है।  

अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता
मातृभाषा का सबसे बड़ा अपमान तब होता है जब किसी भी साक्षात्कार में साक्षात्कारदाता को इसलिए नौकरी नहीं मिल पाती क्योंकि वो अंग्रेजी अच्छी तरह से नहीं बोल पाता है, भले ही वो हिंदी का ज्ञाता ही क्यों न हो। यहां तक कि बच्चों की बुनियाद ही अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता देने के साथ रखी जाती है। स्कूलों में हिंदी भाषा उतनी गहराई से नहीं पढ़ाई जाती है जितना कि दूसरी भाषााओं को  महत्त्व दिया जाता है। अब आप ही समझ सकते हैं उस देश का भविष्य जहां उनकी ही मातृभाषा को सम्मान न मिले और देश को आगे बढ़ाने वाली  युवा पीढ़ी मातृभाषा हिंदी की अहमियत ही न समझ सके।