Summary: जुबिन गर्ग से लोग दिल से जुड़े थे तभी ये भीड़ जमा हुई
ज़ुबिन गर्ग निडर, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे। उनका संगीत और जीवन लाखों लोगों को छू गया। उनके गाने, उनके शब्द और उनके कर्म हमेशा याद रखे जाएंगे।
Zubeen Garg Last Journey: गुवाहाटी ने 21 सितंबर को अभूतपूर्व दुख का दृश्य देखा, जब लाखों प्रशंसक सड़कों पर उमड़ पड़े ताकि असम के महान गायक और सांस्कृतिक प्रतीक जुबिन गर्ग को अंतिम विदाई दे सकें। भीड़ का पैमाना इतना विशाल था कि पूरा शहर शोक की लहर में डूबा नजर आया। असम के हर कोने और तमाम प्रदेश से लोग सिर्फ अपने प्रिय सितारे की अंतिम झलक पाने के लिए पहुंचे थे। इस क्षण का असर इतना गहरा था कि लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने इसे इतिहास के सबसे बड़े सार्वजनिक अंतिम संस्कारों में आधिकारिक रूप से दर्ज किया। जुबिन गर्ग की अंतिम यात्रा को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सार्वजनिक भीड़ के रूप में लिस्ट किया गया। इस लिस्ट में वे माइकल जैक्सन, पोप फ्रांसिस और क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय जैसी महान हस्तियों की विदाई से जुड़ी विशाल सभाओं के साथ खड़े नजर आए।
इसलिए महान हैं जुबिन

जुबिन गर्ग वह गायक हैं जिन्होंने लाखों लोगों के दिल जीते। स्कूबा डाइविंग के वक्त हुई दुर्घटना में 19 सितंबर को सिंगापुर में वे नहीं रहे। 52 साल की उम्र में उन्होंने ये दुनिया छोड़ी। हिन्दी भाषी इलाके उन्हें उनके हिट गाने ‘या अली’ से जानते हैं। इस गाने ने उन्हें पूरे भारत में मशहूर बना दिया लेकिन यह सिर्फ उनकी खासियत का एक छोटा हिस्साभर था। जुबिन ने 40 से अधिक भाषाओं और बोलियों में 38,000 से अधिक गाने गाए। उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग की और निर्देशन भी किया। अनगिनत स्टेज शो किए जिससे हर उम्र के लोगों पर उनका प्रभाव पड़ा।
लोगों के दिलों की भाषा बोली
जुबिन को उनकी ईमानदारी और निडर व्यक्तित्व के लिए जाना गया। वे खुलकर बोलते थे, अक्सर उन शब्दों में जिन्हें लोग आसानी से समझ पाते हैं। उन्होंने हर कपट और पाखंड को चुनौती दी, गरीबों की मदद की, सामाजिक मुद्दों पर आवाज बुलंद की और नेचर व जानवरों से गहरा प्रेम किया। इन खूबियों ने उन्हें सिर्फ असम में ही नहीं, बल्कि उससे लगे बड़े हिस्से में एक आइकॉन बना दिया।
स्टेज पर जुबिन ऊर्जा से भरे तो होते ही थी, कभी-कभी अप्रत्याशित भी होते थे। पुराने लोग भूपेन हजारिका जैसे महान कलाकारों के शांत और मधुर गानों के शौकीन थे। उनका दिल जीतने में जुबिन ने भरपूर कोशिश की। उनके संगीत ने असमिया संस्कृति को नई दिशा दी। उनके गाने भावनाओं, प्यार, उम्मीद, दुख और खुशी से भरे रहे। इन्हीं गानों से उन्होंने आलोचकों को भी जीत लिया।
दिल से गाते थे और डरते नहीं थे जुबिन
जुबिन ने धमकियों का भी सामना किया। उन्होंने बिहू समारोहों में हिंदी गाने गाए जिससे उल्फा के लोग उनसे नाराज हुए। उन्होंने कुछ धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाए और राजनीति से जुड़े लोगों का मजाक भी उड़ाया। वे खुद पर भी मजाक कर लिया करते थे, खासतौप पर अपने नाच पर। उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया, यह दिखाते हुए कि उनका प्रभाव केवल संगीत तक सीमित नहीं है। राजनीतिक अफवाहों के बावजूद, उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं गैर-राजनीतिक हूं। मैं गायक हूं, मैं हर उस इंसान के लिए गाऊंगा जो मुझे भुगतान करेगा।” जुबिन अपनी दिवंगत मां और छोटी बहन जोंकी बोरथाकुर (जो सड़क हादसे में नहीं रहीं) के बारे में अक्सर बात करते थे। उन्हें जानवरों से गहरा लगाव था। वे अक्सर उन्हें बचाते और नाम देते। उनकी यह निडरता और दयालुता ही लोगों को प्रभावित करती थी, जिससे वे जुड़ते चले जाते थे।

जुबिन मेहता से इंस्पायर्ड थे
जुबिन गर्ग का असली नाम जीवन बोरथाकुर था। उन्होंने अपना नाम जुबिन मेहता से प्रेरित होकर रखा। उन्होंने अपने ब्राह्मण उपनाम को छोड़ दिया। वे कहते थे कि उनका यकीन मानवता के धर्म में है। उन्होंने तीन साल की उम्र में गाना शुरू किया और असमिया लोक, शास्त्रीय, पश्चिमी और बॉलीवुड संगीत में महारत हासिल की। बॉलीवुड ने उन्हें प्रसिद्धि और पैसा दिया, लेकिन वे असम लौट आए, यह महसूस करते हुए कि उन्हें अपने लोगों के लिए संगीत बनाना है और उन्हें प्रेरित करना है।
मुझे कुछ नहीं होगा, बहुत सपने पूरे करना हैं…
जुबिन की लाइफस्टाइल थोड़ी गड़बड़ थी जिस कारण उनकी तबीयत अक्सर खराब रहती थी। लेकिन वे पॉजिटिव ही रहे। अक्सर प्रशंसकों से कहते थे, “मुझे कुछ नहीं होगा। मेरे पास अभी भी बहुत सारे सपने हैं जिन्हें पूरा करना है।” और वाकई उन्हें गाने बनाने थे, फिल्में बनानी थीं, Eucalyptus नामक आत्मकथा लिखना थी और लोगों की मदद करना थी। उनकी अचानक मौत इन सपनों को अधूरा छोड़ गई, लेकिन उनका संगीत और आत्मा हमेशा जीवित रहेगा।
