Saiyaara box office collection
Saiyaara box office collection

Summary: सैयारा ईमानदार फिल्म है लेकिन काफी कमजोर

सैयारा में मोहित सूरी की मेहनत कम नजर आती है। कई सीन कमजोर हो गए जिससे फिल्म बिगड़ गई...

Saiyaara Movie Review: कई को तो शायद अब पता लगेगा कि ‘सैयारा’ को मोहित सूरी ने बनाया है।​​​​​​​ ज्यादा शोर-शराबा नहीं… चुप-चाप आ गई यह फिल्म। मोहित ने इस बार अहान पांडे और अनीत पडडा को हीरो-हीरोइन चुना तो नए चेहरों की वजह से हल्ला कम ही हुआ। बस मजेदार यह है कि प्रमोशन्स के दौरान मोहित सूरी को इस बात पर हंसी आई कि उनकी फिल्म की तुलना रॉकस्टार और आशिकी 2 से हो रही है, लेकिन अब देखने वाले मुस्कुरा रहे हैं। उन्हें इस फिल्म की आत्मा तो ऐसी ही दुखियारी फिल्मों से निकली नजर आ रही है। मोहित हर कहानी में वही पुरानी बेचैन मोहब्बत तलाशते रहते हैं। अधूरी मोहब्बत की तलाश में डूबे किरदार, गुनगुनाता हुआ दर्द और कहानियों में बहता इमोशन… मोहित सूरी जरा नहीं बदले हैं।

हीरो कृष (अहान पांडे) गुस्सैल तो है ही सिगरेट के धुएं में घिरा रहने वाला अपने ही दर्द में उलझा रहने वाला इंसान है। एंट्री सीन से ही उसका मिजाज सामने आता है। हीरोइन वाणी (अनीत पडडा) उलट है। वो उजाले की किरण-सी है, जो अपनी मासूम-सी मुस्कान के साथ एंट्री लेती है। इन सब पर भारी है मोहित सूरी का कमाल का म्यूजिक सेंस। यहां जैसी ही गाने बजते हैं, आप कहानी में डूबने लगते हैं। किरदार से मिलने लगते हैं।

वाणी और कृष की जोड़ी ऐसी है जैसे आग और पानी, लेकिन दोनों में एक समानता है… दर्द। दोनों के पास एक अतीत है जिसने उन्हें अंदर से तोड़ कर रख दिया है और यही दर्द उनकी जिंदगी की ताकत बन जाता है। वाणी ने अपने लिए कुछ नियम बना लिए हैं जैसे न देर रात की शिफ्ट, न सिगरेट का धुआं, न गालियां। जब दोनों साथ आते हैं तो सीन के लिए बढ़िया माहौल बनता है। दिल तब दुखता है कि जब कुछ सीन कमजोर निकल जाते हैं। मोहित सूरी ने जैसे इनके कुछ सीन तो बस जैसे-तैसे पूरे किए हैं। वो बात ही नहीं है। दो-तीन सीन में ही मोहित नजर आते हैं और उनकी मेहनत।

फिल्म का पहला घंटा भारी है। गौर करेंगे कि इस हिस्से में कोई किरदार हंसा ही नहीं! हर जगह दर्द, मायूसी और अजीब-सी खामोशी छाई रहती है। फिल्म तेज तब होती है जब आपको वाणी की खामोशी की वजह समझ में आने लगती है। अनीत पडडा को श्रेय मिलना चाहिए कि वो यह बात अच्छे से समझा पाई हैं। हर इमोशनल डायरेक्टर की तरह मोहित सूरी भी अपनी महिला किरदारों के साथ मजबूती से खड़े रहते हैं। और इसका फायदा अनीत को मिला।

इंटरवल के बाद अहान पांडे के किरदार का नंबर आता है। वो फिल्म में शामिल होने लगता है। दिक्कत यह है कि मोहित की फिल्म में किसी को सिंगर बनना है तो किसी को स्टार… तो हर फिल्म एक-दूसरे से मिली हुई लगती है। नयापन खत्म रहता है। इस हिस्से में गुस्सैल और बेकाबू किरदार थोड़ा नरम पड़ता है। लव स्टोरी थोड़ी सच्ची भी लगने लगती है लेकिन यह कुछ बातें चुभती भी हैं। कृष का सड़क से सुपरस्टार बनने का सफर पलक झपकते हो जाता है। अब आप फिर से नकलीपन में फंस जाते हैं। रही सही कसर वाणी के पुराने प्यार की कहानी के अचानक से बीच में आने से पूरी हो जाती है।

सैयारा को जो बात संभाले रखती है, वो है इन नए चेहरों की ईमानदारी और निर्देशक की सोच पर पूरा यकीन। इनकी मासूमियत और मेहनत कहानी को उतना नहीं गिरने नहीं देती जितना ये डिजर्व करती थी। सबसे ज्यादा असर फिल्म के खूबसूरत टाइटल ट्रैक का भी है, जो आपके दिल में बस जाता है। दूसरे गाने तो कमजोर हैं लेकिन टाइटल गीत इस फिल्म की याद दिलाता रहेगा।

हां, इस फिल्म में आपको हंसी कम ही आएगी, लेकिन जब भी आएगी खुल कर हंसेंगे… ये तय है।इतना जान लीजिए कि सैयारा कोई परफेक्ट लव स्टोरी नहीं है। इसमें चमक-दमक कम है, रफ्तार धीमी है, केवल इरादा साफ है। आप तक यह बात पहुंचाने का कि क्या मोहब्बत कभी परफेक्ट होती है? अब इसका जवाब जानने कि जल्दी है तो थिएटर में जाएं नहीं तो ओटीटी पर आने का इंतजार कर लें।

ढाई दशक से पत्रकारिता में हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया और जागरण में कई वर्षों तक काम किया। हर हफ्ते 'पहले दिन पहले शो' का अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद इनके नाम होता। 2001 से अभी तक यह क्रम जारी है और विभिन्न प्लेटफॉर्म के लिए फिल्म समीक्षा...