Metro In Dino Movie Review
metro in dino movie review pankaj tripathi and konkona sen sharma love story

Overview: पंकज और कोंकणा की सादगी भरी मोहब्बत ने दर्शकों का दिल चुरा लिया

‘मेट्रो... इन दिनों’ एक भावनात्मक जर्नी है, जो अलग-अलग कहानियों के ज़रिए रिश्तों की नई परिभाषाएं गढ़ती है। हर लव स्टोरी में कुछ अलग है, मगर पंकज त्रिपाठी और कोंकणा सेन शर्मा की जोड़ी सबसे गहरे उतरती है और दर्शकों के दिलों को छू जाती है।

Metro In Dino Movie Review: अनुराग बसु की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘मेट्रो… इन दिनों’ आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म रिश्तों, मोहब्बत, अधूरी ख्वाहिशों और आधुनिक जीवन की उलझनों की एक कोलाज की तरह है। इसमें कई कहानियां हैं, हर एक अपने ढंग से दिल को छूती है, मगर सबसे गहरी छाप छोड़ती है पंकज त्रिपाठी और कोंकणा सेन शर्मा की सधी हुई पर असरदार लव स्टोरी। बाकी कहानियां भी शानदार हैं, मगर यह जोड़ी वाकई “मज़मा लूट” ले जाती है।

अनुराग बसु की मल्टी-स्टोरी मैजिक फिर से

अनुराग बसु ने पहले भी ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ जैसी फिल्म के ज़रिए मेट्रो शहरों की भावनात्मक परतों को पर्दे पर बेहतरीन ढंग से उकेरा था। ‘मेट्रो… इन दिनों’ उसी सोच की अगली कड़ी है, जहां हर कहानी शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बीच रिश्तों की तलाश करती है।

पंकज-कोंकणा की कहानी

पंकज त्रिपाठी और कोंकणा सेन शर्मा की कहानी फिल्म की सबसे परिपक्व और भावनात्मक परत को सामने लाती है। बिना ज़्यादा शब्दों के, सिर्फ नज़रों और हावभाव से ये दोनों जो जादू रचते हैं, वो लंबे वक्त तक दर्शकों के ज़हन में रहता है। एक अधूरी लेकिन संतुष्ट मोहब्बत की यह कहानी सबसे अलग है।

बाकी कहानियां – हल्की-फुल्की, लेकिन दिलचस्प

फिल्म में बाकी किरदारों की कहानियां मॉडर्न रिलेशनशिप्स की झलक देती हैं — कहीं डेटिंग ऐप्स की उलझनें हैं, तो कहीं फैमिली प्रेशर, कहीं वर्क लाइफ और पर्सनल लाइफ के बीच की खाई। हर कहानी का टोन अलग है, और यह फिल्म को विविधता देती है।

सबने अपनी भूमिका बेहतरीन ढंग से निभाई

सरिता जोशी, फातिमा सना शेख, अली फज़ल, आदित्य रॉय कपूर, सान्या मल्होत्रा – सभी ने अपने-अपने किरदारों में जान डाली है। मगर पंकज त्रिपाठी हर फ्रेम में जान डाल देते हैं और कोंकणा उन्हें शानदार बैलेंस देती हैं।

म्यूजिक और सिनेमैटोग्राफी

फिल्म का म्यूज़िक लो-की है, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर हर सीन को भरपूर सपोर्ट करता है। सिनेमैटोग्राफी भी कहानी के मूड के मुताबिक ढली हुई है – न ज़्यादा चमकदार, न ज़्यादा फीकी।

इमोशनल टोन – कहीं हल्का मुस्कान, कहीं गहरी टीस

फिल्म भावनाओं की अलग-अलग परतें खोलती है। कहीं आप मुस्कुराते हैं, कहीं गला रुंधता है। लेकिन फिल्म ओवरड्रामैटिक नहीं होती, यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।

किसके लिए है ये फिल्म

अगर आपको रियल और रिलेटेबल कहानियां पसंद हैं, अगर आप रिश्तों की गहराई को महसूस करना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। यह एक तेज़ भागती दुनिया में ठहराव जैसा अनुभव देती है।

मेरा नाम वंदना है, पिछले छह वर्षों से हिंदी कंटेंट राइटिंग में सक्रिय हूं। डिजिटल मीडिया में महिला स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन, बच्चों की परवरिश और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का अनुभव है। वर्तमान में गृहलक्ष्मी टीम का हिस्सा हूं और नियमित...