पंचम दा के नाम से मशहूर आर. डी बर्मन को ज्यादातर लोग उनके गानों में झलकते पाश्चात्य, एक्सपेरिमेंटल संगीत और सुपरहिट डांस नम्बर्स के लिए जानते हैं, लेकिन गौर से सुनने पर आप पाएंगे कि उनके पास ऐसे कई दूसरे गीत हैं जिनमें शास्त्रीय संगीत और पिता एस डी बर्मन से सीखे बंगाली संगीत की भी झलक मिलती थी। 

आर. डी बर्मन के बनाए गीतों में अगर कैबरे था, तो रोमांस भी था। उनके गीत में फास्ट संगीत था, तो हंसी का तड़का भी था और तड़पते का दिल का दर्द भी था। 

हम यहां उनके ऐसे ही 5 गीतों की चर्चा कर रहे हैं जो सुनने वालों के हर भावना को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

1. ओ मेरे सोना रे, सोना रे (तीसरी मंज़िल )

इस फिल्म को करने के पहले पंचमदा ने लंदन से रॉक म्यूज़िक का प्रशिक्षण लिया था। इस फिल्म के पहले तक हिन्दी फिल्मों के गानों में मधुरता तो बहुत थी, लेकिन संगीतकार व गायक सभी एक तरह का काम कर रहे थे। पंचम दा नए प्रयोग किया करते थे और फिल्म ‘तीसरी मंज़िल’ के गाने उस वक्त चलने वालों गानों के बहुत अलग थे। सुनिए ये गाना-

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2. मेरे सामने वाली खिड़की में (पड़ोसन)

जितनी मधुरता से पंचम दा के धुन दिल को छू लेते थे, उतनी ही आसानी से वे अपने संगीत से लोगों को गुदगुदा भी देते हैं। फिल्म पड़ोसन का गाना ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’ या ‘इक चतुर नार’ सुनकर लोग आज भी हंस देते हैं। सुनिए ये गाना-

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3. रैना बीती जाए (अमर प्रेम)
साल 1971 में आई फिल्म ‘अमर प्रेम’ का ये गीत अपनी पारंपरिक शास्त्रीय संगीत की वजह से हमेशा संगीत प्रेमियों की लिस्ट में शामिल रहता है और जब आप ये गाना सुनेंगे तो आपको ये यकीन करना मुश्किल होगा कि इस गीत को बनाने वाले भी पंचम दा हैं।

 

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4. पिया तू अब तो आजा (कारवां) 
पंचम दा का एक्सपेरिमेंटल संगीत, आशा भोसले की आवाज़ और हेलेन के डांस मूव्स ने इस गाने को रातों-रात कैबरे का किंग बना दिया था। साल 1971 में आई फिल्म ‘कारवां’ के गीत में पंचम दा ने अपनी आवाज़ भी दी थी। सुनिए ये गाना-

 

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5. एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा(1942 अ लव स्टोरी)

 साल 1994 में आई फिल्म ‘1942 अ लव स्टोरी’ पंचम दा की आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म के गानों में इतनी मिठास थी कि इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का अवॉर्ड भी मिला था, लेकिन तब तक वो इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे।

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बता दें कि पंचम दा का नाम 18 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के लिए नॉमिनेट किया गया था, जिसमें उन्हें तीन बार ही यह पुरस्कार मिला। पहली बार यह पुरस्कार उन्हें 1983 में आई फिल्म ‘सनम तेरी कसम’ के लिए मिला था। उसके बाद साल 1984 की फिल्म ‘मासूम’ और फिर ‘1942 अ लव स्टोरी’ के लिए उन्हें ये अवॉर्ड मिला था।

 

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