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Truth about Celebrity : पिछले वर्ष जब 15 जून को यानि 15 जून 2020 को जब फिल्मी कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की खबर छपी तो सारा देश स्तब्ध रह गया था। क्या हुआ जिसके कारण फिल्मी दुनिया के इस स्टारडम की तरफ बढ़ते हुए सितारे ने फांसी लगाकर अपनी जिंदगी को खत्म कर दिया।

एक सुशांत ही क्यों पर्दे पर आलीशान जिंदगी जीने वाले, खूबसूरत नायिकाओं से रोमांस दर्शाने वाले, एक-एक घूंसे में दस-दस को पछाड़ने वाले सुपरमैन और लाखों को अपनी अदाओं से दीवाना बनाने वाली, एक-एक फिल्म के लिए करोड़ों की फीस लेने वाली बॉलीवुड की वीनसों की रियल लाइफ और रील लाइफ में इतना कुछ है जो चौकाने वाला है।

‘पीकू’, ‘छपाक’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘बाजीराव मस्तानी’, जैसी फिल्मों की नायिका दीपिका पादुकोण भी क्लीनिकल डिप्रेशन की शिकार हो चुकी हैं, जिसका खुलासा उन्होंने विश्व आर्थिक मंच पर सन 2020 में किया था। सन सत्तर के दशक में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने निर्देशक, ‘प्यासा’, ‘सीआईडी’ और ‘कागज के फूल’ के निर्माता और बेहतरीन अभिनेता गुरुदत्त 1964 में अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए। कारण, उन्होंने अल्कोहल और नींद की गोलियों का काफी मात्रा में सेवन कर अपनी जिंदगी को खत्म कर दिया था।

सफलता के पर्याय बने निर्देशक मनमोहन देसाई जिन्होंने ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘कुली’ और ‘मर्द’ जैसी फिल्में दीं, 1994 में गिर गांव स्थित अपने घर में मौत की नींद में चले गए। कोई समझ नहीं पाया कि 19 साल की दिव्या भारती, जिन्होंने ‘शोला और शबनम’ और ‘दीवाना’ फिल्म में करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना दिया था, उन्होंने पांचवी मंजिल से क्यों छलांग लगा दी या दक्षिण की सेक्स बम कही जाने वाली सिल्क स्मिता ने क्यों मौत को गले लगा लिया!

Divya Bharti
Divya Bharti

इसमें कुछ और नामों की चर्चा करें तो एमटीवी की मशहूर वी जे नफीसा जोसेफ, अमिताभ और आमिर के साथ काम कर चुकी जिया खान, इंडियन टीवी इंडस्ट्री की बालिका वधू प्रत्यूषा बनर्जी, टीवी एक्टर कुशल पंजाबी जैसे कितने ही नाम लिये जा सकते हैं। विश्वास ही नहीं होता कि इस ग्लैमर की दुनिया का एक चेहरा यह भी हो सकता है। ग्लैमर, शोहरत और चकाचौंध से भरी बॉलीवुड इंडस्ट्री के इन नामी-गिरामी नामों के डिप्रेशन में जाने या डिप्रेशन की अंतिम अवस्था आत्महत्या के पीछे बहुत सारे कारण हैं। आईये उन पर एक नजर डालने की कोशिश करते हैं-

प्यार में धोखा

‘मजबूर’, ‘दीवार’, ‘सुहाग’, ‘काला पत्थर’, ‘अमर अकबर एंथोनी’ जैसी दर्जनों फिल्मों की नायिका और टाइम मैगजीन के कवर पर आने वाली पहली बॉलीवुड स्टार परवीन ने, पहले डैनी डेंजोंगप्पा फिर कबीर बेदी और आखिर में महेश भट्ट में अपने प्यार को खोजने की कोशिश की, लेकिन तीनों ही बार उन्हें प्यार में धोखा मिला। परिणाम स्वरूप वह सिजोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी का शिकार हो गईं और अंत में 22 जनवरी 2005 को उसकी 3 दिन पुरानी लाश उनके फ्लैट में मिली। गुरुदत्त का वहीदा रहमान से असफल प्रेम और दिव्या भारती के टूटे हुए दिल ने ही उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर किया।

सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना

यही आखिरी पंक्ति थी, जो ‘क्राइम पेट्रोल’, ‘लाल इश्क’ और ‘मेरी दुर्गा’ जैसे सीरियल्स में अपनी पहचान स्थापित करने वाली 25 साल की प्रेक्षा मेहता ने अपने सुसाइड नोट में लिखी थी।

सच्चाई भी यही है। पूरे हिंदुस्तान से हर साल फिल्म इंडस्ट्री में हजारों लोग सफलता पाने के सपने लेकर बॉलीवुड पहुंचते हैं। ऐसा नहीं कि उनमें टैलेंट नहीं होता, लेकिन गला काट प्रतियोगिता और कलाकारों की बेतहाशा भीड़ के बीच उनमें से मुश्किल से एक-दो प्रतिशत को ही फिल्मों या सीरियल्स में जगह मिल पाती है। अपने नगर में यार-दोस्तों के बीच लोकप्रिय और बेहद टैलेंटेड माने जाने वाले इन कलाकारों का जब सच्चाई से सामना होता है, तो उनके सपने टूटना शुरू हो जाते हैं। दो चार सीरियल या छोटी-मोटी फिल्में उन्हें मिलती हैं और जब उन्हें उसमें नोटिस किया जाता है, तो उन्हें लगता है कि बस अगला चांस मिलते ही वह छा जाएंगे, लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो सपने पूरी तरह टूट जाते हैं और परिणाम प्रेक्षा मेहता जैसा ही होता है।

Preksha mehta
Preksha mehta

मैं यह प्रेशर और नहीं झेल सकती

‘दिल तो है हैप्पी जी, जैसे लोकप्रिय टीवी सीरियल की नायिका, सेजल शर्मा ने अपने सुसाइड नोट में यही लिखा था। यह प्रेशर तमाम तरह का हो सकता है। परिवार वालों की उम्मीदों का प्रेशर, साथी कलाकारों से बेहतर कर दिखाने का प्रेशर, अपने रोल से असंतुष्टि का प्रेशर, डायरेक्टर के तानों का प्रेशर, वगैरह-वगैरह। यह प्रेशर झेल पाना हर किसी के बूते की बात नहीं होती।

मेगास्टार अमिताभ को आकाशवाणी में उनकी आवाज के कारण और तत्कालीन निर्देशकों ने उनके लंबे कद के कारण रिजेक्ट कर दिया था। इस प्रेशर को वह झेल गए और फिर सात हिंदुस्तानी में उन्हें जगह मिल ही गई, लेकिन अमिताभ जैसा मानसिक बल कितने लोगों में होता है?

Amitabh Bachchan
Amitabh Bachchan

आर्थिक संकट

दूर से देखकर यह लगता है कि बॉलीवुड सितारे लाखों करोड़ों कमाते हैं, लेकिन कारपोरेट जगत की तरह ही, यह भी एक मिथ ही है। सच्चाई यह है कि कुछ सितारों को छोड़कर ज्यादातर सितारे आर्थिक तंगी से जूझते रहते हैं। ऊपर से उन्हें अपने को प्रेजेंटेबल दिखाने के लिए काफी कुछ करना पड़ता है।

इधर पिछले 2 वर्षों से कोरोना महामारी ने जब शूटिंग को रोक दिया तो इस संकट का बढ़ना स्वाभाविक ही था। 16 मई 2020 को इसी आर्थिक संकट के चलते टीवी कलाकार मनजीत सिंह फांसी पर लटक गए। 16 मई 2015 को ‘बीए पास’ फिल्म में काम कर चुकी शिखा जोशी ने भी काम न मिल पाने के कारण, आर्थिक तंगी से परेशान होकर चाकू से अपना ही गला काट लिया। यही कहानी ‘द एडवेंचर ऑफ हंटेड हाउस’ और ‘द लास्ट हॉरर’ फिल्म की नायिका सैयम खन्ना की भी है, जिन्होंने आर्थिक तंगी और काम न मिलने के कारण सन 2014 में फांसी लगा ली।

 

पारिवारिक पृष्ठभूमि

पारिवारिक पृष्ठभूमि जहां एक कलाकार का रास्ता आसान बनाती है, वहीं वह उसकी सफलता की राह का रोड़ा भी बन जाती है, क्योंकि परिवार की बनी बनाई इमेज, उससे भी उसी सफलता की उम्मीद करती है, जो उसे विरासत में मिली है। यह दबाव उसे मानसिक स्तर पर हमेशा ही चुनौती देता रहता है। अभिषेक बच्चन का उदाहरण सामने है। अगर वह एक साधारण परिवार से होते, तो ‘बंटी और बबली’, ‘बोल बच्चन’ और ‘धूम’ जैसी सफल फिल्मों की शानदार सफलता और शानदार व्यक्तित्व उन्हें कहीं का कहीं पहुंचा चुका होता, लेकिन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमिताभ और जया का कद ही उनकी सबसे बड़ी रुकावट साबित हो रही है और इस कारण वे माइल्ड डिप्रेशन का शिकार होते ही रहते हैं।

Kumar gaurav
Kumar gaurav

राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव पहली फिल्म ‘लव स्टोरी’ से जिस जगह पर महसूस किए गए अगली फिल्म में ही उनसे राजेंद्र कुमार के समान सफलता दोहराने की उम्मीद की गई, लेकिन वे उस उम्मीद पर खरे नहीं उतर सके और उनका सितारा तीन-चार फिल्मों के बाद ही डूब गया। इससे भी बुरा हाल देव आनंद के बेटे सुनील आनंद का हुआ, जिसमें वह अपने ही पिता के समक्ष एक्टिंग में जीरो माने गए और उनका करियर वहीं समाप्त हो गया। यह दोनों ही कलाकार अपनी इन फिल्मों के हश्र से डिप्रेशन के शिकार हो गए।

दर्शकों की उम्मीदें

अपने टैलेंट, संपर्क या फिल्मी दुनिया में पहले से स्थापित संबंधियों की वजह से बड़े बैनर की फिल्में अगर कलाकार को मिल जाती हैं तो वह बैनर उन्हें इस तरह प्रचारित करता है कि फिल्म के प्रदर्शन से पूर्व भी उनके प्रति दर्शकों की बहुत सारी उम्मीदें जाग पड़ती हैं और वे खुद भी अपने आपको उसी तरह लार्जर दैन लाइफ के फ्रेम में जड़ा हुआ महसूस करने लगते हैं, लेकिन फिल्म प्रदर्शन के बाद अगर उनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं होता, तो दर्शक उन्हें सिरे से नकार देते हैं और उस वक्त जो हाल उनके दिल का होता है वह उन्हें भयानक डिप्रेशन में ले जाता है।

अकेलापन 

लंबी चौड़ी फैन मेल, ट्विटर और फेसबुक के लाखों फॉलोअर्स, औपचारिक मित्र और ग्लैमर, लेकिन इनसे घिरे ये सारे बड़े सफल कलाकार अपने निजी जीवन में बेहद अकेले होते हैं और अगर उन्होंने किसी को अपनी निजी जिंदगी में दाखिल किया, तो वह कहीं उनका आर्थिक या शारीरिक शोषण ना कर ले, यह डर उन्हें औरों के करीब आने या औरों को उनके करीब आने नहीं देता। अक्सर करीबी रिश्तेदार यहां तक कि माता-पिता भी उन्हें कैश करने की फिराक में ही रहते हैं।

लव, सेक्स, धोखा और नशे का ऑक्टोपस उन्हें ऐसा जख्म देता है कि वह डिप्रेशन में घिर जाते हैं और आखिर में जान तक दे देते हैं।

इसका सबसे दयनीय उदाहरण राज किरण का है, जिन्होंने लगभग 30 फिल्मों में काम किया, जिसमें महेश भट्ट की ‘अर्थ’ भी शामिल है, लेकिन जब काम मिलना बंद हो गया तो सभी उनसे दूर हो गए और 2003 के बाद उन्हें पागलपन के दौरे पड़ने लगे। अंतिम सूचना के अनुसार वे अटलांटा के मानसिक चिकित्सालय में अपना इलाज करा रहे हैं।

यह है इस चकाचौंध भरी दुनिया का काला सच। सितारे जिन्हें हम वास्तव में सेलेब्रिटीज मानते हैं, जो लाखों के दिलों पर राज करते हैं, वास्तव में वे एक ऐसी डगर पर चलने वाले मुसाफिर हैं, जहां चुनौतियां हैं, निरंतर सफलता पाने का दबाव है, पारिवारिक उम्मीदें हैं, तमाम षड्यंत्र हैं और साथ ही नितांत अकेलापन है, सच्चे दोस्तों का लगभग अभाव है। हर कोई सिर्फ अपने लाभ के लिए उनसे जुड़ना चाहता है। इन सब पर जो विजय प्राप्त कर लेता है, वही लंबे समय तक एक सफल कलाकार की तरह जिंदगी जीता है।

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