वरुण धवन कहते हैं, “मैं यहाँ इस फ़िल्म इंडस्ट्री में सिर्फ़ पैशन की वजह से काम करने आया हूं। मैं आज भी वही ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर’ वाले वरुण को अपने आप में ढूंढता हूं क्यूंकि उस समय मैं बेहद लगन से शूट करता था। मुझ में पैशन था। सेट पर मैं सबसे पहले पहुंचता था और घर सबसे देर से जाता था।” 
 
अब तक आपकी सभी फिल्में हिट रही है, तो क्या अभी हिट फिल्म देने का प्रेशर महसूस करते है ?
मैं कहानी सुनकर फिल्मों का चुनाव करता हूं। अब तक मैंने आठ फिल्में की हैं, हर फिल्म के साथ जिम्मेदारी बढ़ जाती है। एक फिल्म हिट होने के बाद दूसरी हिट फिल्म देने का प्रेशर बढ़ जाता है। साथ ही आप जिन लोगों के लिए काम करते हैं, उनके प्रति भी आपकी ज़िम्मेदारी होती है, प्रोडक्शन हाउस के लिए भी सोचते हैं कि उन्हें नुकसान ना हो। ऐक्टिंग का भी प्रेशर होता है। पहले लोग कहते थे कि इसे ऐक्टिंग नहीं आती, बस हल्की-फु्ल्की फिल्म कर सकता है। ‘दिलवाले’, ‘ढिशुम’ चली लेकिन ‘बदलापुर’ के बाद लोग मेरी ऐक्टिंग पर विश्वास करने लगे है।
 
अब इंडस्ट्री में महिला प्रधान फिल्में चल रही हैं। इस ट्रेंड के बारे में क्या सोचते हैं?
फिल्म एक बिजनेस है। जब निर्माता पैसे लगाता है, तो रिटर्न भी एक्सपेक्ट करता है । अब यहां फीमेल ओरीएंटेड फिल्म भी डेढ़ सौ करोड़ का बिजनेस कर रही है। पिछले साल तो सोनम, आलिया, अनुष्का सभी की फ़िल्मे आई जिनमें वे लीड रोल में थी। श्रद्धा की भी ‘हसीना’ आ रही है। कंगना तो कमाल का काम कर रही है “तनु वेड्ज़ मनु “और “क्वीन” की सफलता बताती है कि अब फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव आ गया है। सभी को बराबर का दर्जा मिल रहा है और सिर्फ फिल्मों में ही नहीं कॉर्पोरेट वर्ल्ड में भी महिलाएं आगे है।
 
आपकी फिल्म बद्रिनाथ की दुल्हनिया से लोगों को क्या संदेश मिलेगा?
बद्रि झाँसी का रहने वाला लड़का है जो ऐम सी पी ( मेल चेवोनिस्ट पींग ) है। हमारी सोसायटी में कहीं ना कहीं लड़कों में ये बात देखने को मिल जाती  है चाहे वे मुंबई ,बैंगलोर जैसे बड़े सिटी में रहते हो। सिर्फ़ लड़का आगे बढ़ेगा लड़की को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए। लड़का-लड़की की परवरिश अलग तरह से होगी, ये सोच ही ग़लत है और इसी से जुड़ा संदेश लोगों को इस फिल्म से मिलेगा। हमारा इतिहास भी बताता है कि हमारे यहां महिलाओं को कितनी इज्जत दी जाती है। हमारे भगवान भी देवी हैं, फिर भी जब महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है तो मुझे बहुत बुरा लगता है। दिल ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर गलती कहां हो रही है। वैसे तो सिनेमा मनोरंजन के लिए होता है, लेकिन उसके साथ कोई सीख दी जाए तो बहुत अच्छा है।
 



 
आपकी परवरिश किस तरह के माहौल में हुई ?
यूं तो मेरे घर में हम दो भाई और डैड के होने से मॉम अकेली फीमेल थी, लेकिन जब मैं बड़ा हो रहा था या यूं कहे कि मेरे लाइफ के उन सालों में जब मैं कुछ सीख सकता था उस वक्त मैं अपनी मम्मी और मौसियो के ज्यादा नज़दीक रहा। मेरी सभी मौसियां हैपिली मैरीड हैं, लेकिन सब इंडिपेंडेंट हैं, वर्किंग विमन है। मेरी मॉम ने भी शादी के तुरंत बाद नर्सरी स्कूल खोल लिया था। वे हमेशा काम करती रही। मैं हमेशा से अपनी मोम के ज्यादा रहा क्यूंकि डैड बिज़ी रहते थे और उनके साथ सेट पर जाने नहीं मिलता था। मैं स्कूल के बाद मॉम के ही साथ रहता था। यहां तक की मुझे ड्राइविंग भी मॉम ने सीखाई है। मैंने अपनी मॉम के रूप में बहुत ही स्ट्रॉंगर वुमन को देखा है। उन्होंने बुटीक चलाया, इंटिरीअर का भी काम शुरू किया। मैं बहुत प्राउड फील करता हूं कि अभी मेरे घर का इंटिरीअर भी मेरी मॉम ही कर रही हैं। डैड भी हमेशा से मॉम की तारीफ करते आए हैं।
 
 
 
 
क्या फिल्म इंडस्ट्री में आपके फ्रेंड्स है ?
मुझे बाहर पार्टी में जाना या लेट नाइट क्लब में जाना अच्छा नहीं लगता। ऐसा नहीं है कि मेरे दोस्त नहीं हैं। मेरे स्कूल और कॉलेज के दोस्त हैं और हम सात-आठ लोगों का एक ग्रूप है और ज्यदातर हम लोग मेरे ही घर पर इकट्ठा हो कर मिलते है। पूरी रात बातें करते हैं, मस्ती करते हैं, डान्स भी करते है लेकिन आपको विश्वास नहीं होगा कि मैं अपने ग्रूप का सबसे शांत लड़का हूं। मुझे छोड़कर सब डान्स करते है। 
 
आपका सबसे बड़ा क्रिटिक और फ़ैन कौन है ?
मैं जितनी अपने फैन्स की इज्जत करता हूं उतनी ही अपने क्रिटिक्स की भी सुनता हूं। मेरे बचपन के तीन ख़ास दोस्त हैं कवेश, अंकित और अमन। यही तीनों मेरे सच्चे क्रिटिक भी हैं। वो जबरदस्ती मेरी तारीफ नहीं करते, बल्कि मेरी हिंदी और मेरे उच्चारण को हमेशा ठीक ही करते हैं। कभी-कभी तो मैं सीन करने से पहले भी उन लोगों से सलाह ले लेता हूं। 
 
 

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आलोचना को किस तरह से लेते है ?
आज के दौर में हम सब प्लास्टिक की ज़िंदगी जी रहे है। अपनी बेस्ट पिक्चर सोशल नेट्वर्क पर अपलोड करते हैं, यहाँ तक की उस फ़ोटो की भी फ़िल्टर कर देते हैं। इंसान अपनी उदासी को कभी नहीं दिखाता। ऐसे में अगर आप की कोई आलोचना करता है या बुराई करता है या आपकी वीकनेस पर ऊंगली करता है, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। इससे ये साबित होती है कि मैं इंसान हूं। मैंने बचपन से इस इंडस्ट्री को देखा है। मेरे मॉम-डैड भी इन बातों पर ध्यान नहीं देता। 
 
रियल लाइफ़ में आप किस तरह की दुल्हनिया चाहते है ?
सबसे पहली बात तो मुझे आश्चर्य हो रहा है कि सबके ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं जल्दी शादी करना चाहता हूं। ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं शादी करूंगा, लेकिन अभी नहीं। वैसे मैं चाहता हूं कि मेरी पार्ट्नर इंडिपेंडेंट हो। मुझे सिम्पल चीज़े पसंद है इसलिए मुझे सिम्पल लड़की ही चाहिए ।
 



 
आपकी फ़िल्म में दो पुराने गानो को रीक्रीएट किया गया है?
मुझे हमेशा से एक होली सॉन्ग करने का मन था। बचपन से कई फ़िल्मों में होली सॉंन्ग देखता आया हूं। अक्षय कुमार की फिल्म वक्त का गाना लेट्स प्ले होली मेरा फ़वरेट सॉन्ग था। बच्चन साहब का “रंग बरसे ” तो ऑल टाइम फ़वरेट है ही लेकिन उसे मैंने थियेटर में नहीं देखा। बद्रिनाथ में हम लोग ने राज कपूर साहब का गाना “चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे “फ़ोक सॉंग लिया है। यह गाना शानदार है। यहाँ तक की “तम्मा तम्मा “भी बहुत ख़ूबसूरत गाना है, आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि अभी जो नई जनरेशन है उसे इन गानो के बारे में मालूम ही नहीं था। युवा इन गानो को ख़ूब एंजॉय कर रहे हैं और कही ना कही हमारी संगीत का इतिहास लोगों तक पहुँच रहा है ।
 
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