पापा, आप आज साथ नहीं है लेकिन फिर भी आपके साथ अलग सा कनेक्शन महसूस होता है। कई बार अकेले में आपसे गुफ्तगू कर लेती हूँ, अपनी परेशानियां आपसे शेयर कर लेती हूं। इस लेटर को लिखते हुए भी आंखों में आंसू भरे हैं, इसलिए नहीं कि मैं परेशान हूं, बल्कि इसलिए कि आपको देख भी नहीं सकती। शुरू से हमारे बीच का रिश्ता कुछ अलग सा है। इसमें सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है। हां, यह जरूर है कि आपने कभी भी मुझसे सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा लेकिन मां से हमेशा मेरी परेशानियों को लेकर चिंतित रहें।

मेरे बचपन की कई स्मृतियां आज भी मेरे दिल में जिंदा हैं। मुझे याद है वे दिन जब आप सुबह-सुबह हमें पढ़ाई के लिए उठाते थे। लेकिन मैं तब भी कई दफा नहीं उठती थी, जब पढ़ना होता तो ही उठती वरना सोई रहती। मेरे अंदर कभी नहीं रहा कि मैं आपको दिखाऊं कि मैं पढ़ रही हूं। अब यही वजह थी या कुछ और नहीं जानती लेकिन यह जरूर है कि आपको मुझसे कई उम्मीदें थी। ऐसी उम्मीदें जो आपकी आंखों को उजास से भर देती। आप चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं, आईआईटी में दाखिला लूं। दूसरी ओर मैं यह जानती थी कि मैं इतनी पढ़ाई नहीं कर सकती। आखिरकार एक दिन आपको प्यार से कह ही दिया कि मैं इंजीनियरिंग नहीं कर सकती। फिर आपको उम्मीद हुई कि मैं आईएएस बन जाऊं। यहां भी मुझे खुद से उम्मीद नहीं थी।

उसी दौरान मेरे बारहवीं के परिणाम आ गए थे, बहुत अच्छे तो नहीं लेकिन ठीकठाक नंबर आ गए थे। मेरी इच्छा थी दिल्ली में पढ़ाई करने की। मां इसके खिलाफ थी पर आपने मेरा पूरा साथ दिया। मैं आंखों में ढेर सारे सपने बसाए राजधानी पहुंच ही गई। सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला भी मिला। मानो मेरे पर निकल गए, मैं पूरी दुनिया को अपने अंक में समेटना चाहती थी। लेकिन मुझे आप याद रहें और आपकी नसीहतें और आंखों में भरा उजास याद रहा। पढ़ाई पूरी की और मनचाही नौकरी भी मिली। शादी की बात घर पर होने लगी लेकिन मेरा मन अपनी उन्मुक्तता को महसूस करना चाह रहा था। मेरा सपना सच हो रहा था, आपकी आंखों में उजास चमक रहा था।

कहते हैं न कि जब सब अच्छा चल रहा हो तो इसे तूफान से पहले का संकेत मानना चाहिए। हुआ भी कुछ ऐसा ही। सपने के महल मानो धराशायी होने को आ गए। एक दिन घर से फोन आया। मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी। दो दिन बाद आप और मां दिल्ली पहुंच गए। अस्पतालों का चक्कर जो शुरू हुआ, रुकने का नाम नहीं ले रहा था। मां की आंखों के आंसू जहां थमने का नाम नहीं ले रहे थे, वहीं हम बहनों का बुरा हाल था। अच्छे सरकारी अस्पताल में दाखिले के लिए जीतोड़ कोशिश की। कोशिश मेरी रंग लाई। रिश्तेदार आते लेकिन एक-दो दिन में चले जाते। जो निर्णय लेना था, हमें ही लेना था। ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी मैंने। आपकी बीमारी देखी नहीं जाती लेकिन आपकी आंखों का उजास अपनी आंखों में भरने की कोशिश कर आपके सामने आती।

आप ठीक तो हो रहे थे लेकिन कुछ शर्तों पर। यह सब आपको गवारा नहीं था, चूंकि आप खुद एक डॉक्टर थे। खैर, इसी बीच आपकी नादानी, आपका बचपना देखा। इंसान को जब अहसास होने लगता है कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है तो वह टूटने लगता है। ऐसा ही कुछ आपके साथ हो रहा था। आप बिखर रहे थे, मैं बस सांसें थामे देख रही थी। जो बस में था, किया मैंने। मैंने ही क्या, पूरे परिवार ने भी हरसंभव कोशिश की। आपको इस तरह देखकर मानो सबको काठ मार गया हो। जिसे हमने हमेशा मजबूत और उम्मीद से भरा देखा, उसे इस हाल में देखना कतई मंजूर नहीं था। मैंने अपने मन से लाखों-करोड़ों सवाल किए, पूछा कि जिस व्यक्ति ने हमेशा बीमारों को ठीक किया उसे इस तरह की सजा देना कहां तक उचित है। मैंने पूछा उससे भी जिन्हें मैं बचपन से पूजती आई हूं। मैंने पूछा उन हवाओं और पेड़-पौधों से भी जिन्हें मैंने हमेशा महसूस किया है।

कुछ ऐसी ही उम्मीद- नाउम्मीद के बीच आप ठीक हो रहे थे। एक दिन आपका छोटा ऑपरेशन होना था। मेरा ऑफिस जाना जरूरी था। कुछ लोग थे, सो मैं चली गई। शाम को वापस अस्पताल पहुंची तो मां ने कहा कि आप मुझे पूछ रहे थे। कह रहे थे कि तुम उन्हें छोड़कर ऑफिस क्यों चली गई। मैंने आपसे बात करनी चाही पर आप मूड में नहीं थे। कुछ दिनों बाद अस्पताल से छुट्टी पाकर आप घर आए, जहां मैं रहती थी। कुछ महीने कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला। इस बीच मैं आपके करीब होती चली गई। आप भी अपने पुराने समय में वापस लौट रहे थे। आपका खो चुका आत्मविश्वास लौट रहा था।

आप ठीक हो गए लेकिन आपका कमजोर शरीर कई बार जवाब दे जाता और आप बीमार पड़ जाते। लेकिन आपके अंदर की इच्छाशक्ति कमाल की थी। आपमें जीने की ललक खूब है। उससे भी ज्यादा अपने बच्चों के लिए करने की ललक। दस साल बीते और आप अपने बीमार शरीर से लड़ते रहें, हम बच्चों पर सुरक्षा कवच दिए हुए। बाद- बाद में आपका फिर से बच्चों की तरह ये नहीं खाना, वह खाना, बहुत याद आता है। दूसरी बार अस्पताल का वह दृश्य बार- बार याद आता है, जब आप आईसीयू में लेटे हुए आंखें बंद करके न जाने किस दुनिया में गोते लगा रहे थे। तब से लेकर आज तक साढ़े छह साल बीत चुके हैं लेकिन आपकी याद आते ही आंखों से बेपरवाह आंसू निकलने लगते हैं। मैं आपका वह चेहरा याद रखना चाहती हूं, जिसने मेरे पहले काम की छोटी सी सफलता को देखकर आंखों में उजास भरा था। वही हिम्मत, वही कामयाबी, वही संतुष्टि, वही सबकी मदद करने की क्षमता और आंखों का उजास मैं अपने अंदर भी चाहती हूं। मैं चलना चाहती हूं उस रास्ते पर, जहां हिम्मत और विश्वास के गहरे उजाले हैं।

 

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