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प्रकृति का स्वभाव – श्री श्री रविशंकर

यदि तुम भिन्न-भिन्न कार्य और उनके दोषों को गहराई में देखो तो तुम पाओगे कि वे कार्य किन्हीं परिस्थितियों और नियमों के अंतर्गत घट रहे हैं, इसलिए उनके दोष या अपूर्णताओं को अपने भीतर हृदय में मत उतरने दो और क्रोधित मत हो।

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