Summary: पढ़ते हैं, फिर भूल जाते हैं? CBSE स्टूडेंट्स के लिए जर्मनी से आया 140 साल पुराना फॉर्मूला… जो स्कूल में कभी नहीं सिखाया गया!
आप कितने भी तेज़ क्यों न हों, बार-बार भूल जाना किसी कमज़ोर याददाश्त का संकेत नहीं है। 140 साल पहले जर्मनी में खोजा गया यह सीक्रेट बताता है कि दिमाग असल में कैसे याद रखता है और हम कहाँ चूक जाते हैं।
Brain Memory Secrets Revealed: CBSE स्टूडेंट्स अक्सर एक ही सवाल से जूझते हैं पढ़ा हुआ याद क्यों नहीं रहता? घंटों किताबें खोलकर बैठने के बाद भी जब एग्ज़ाम के समय दिमाग खाली-सा लगने लगता है, तो इसका दोष अक्सर स्टूडेंट अपनी मेहनत या याददाश्त पर डाल देते हैं। लेकिन एजुकेशनल साइकोलॉजी कुछ और ही कहती है। असल समस्या कम पढ़ाई नहीं, बल्कि गलत तरीके से पढ़ाई है। और यही वह जगह है जहां 140 साल पुरानी एक जर्मन रिसर्च आज भी CBSE जैसे सिलेबस-हेवी सिस्टम में बेहद काम की साबित होती है।
भूलना कमजोरी नहीं, दिमाग का नेचर है
आज से करीब 140 साल पहले जर्मनी के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक हर्मन एबिंगहाउस ने याददाश्त पर कुछ ऐसे प्रयोग किए, जिन्होंने पढ़ाई को देखने का नजरिया ही बदल दिया। 1880 से 1885 के बीच किए गए उनके शोध से यह बात सामने आई कि अगर किसी जानकारी को दोबारा नहीं दोहराया जाए, तो वह बहुत तेजी से दिमाग से निकलने लगती है। इसे ही उन्होंने फोर्गेटिंग कर्व (Forgetting Curve) नाम दिया। इस शोध का सबसे बड़ा मतलब यह था कि स्टूडेंट्स इसलिए नहीं भूलते क्योंकि वे कम पढ़ते हैं, बल्कि इसलिए भूलते हैं क्योंकि वे सही समय पर रिवीजन नहीं करते।
स्पेस्ड रिपीटेशन क्या है और यह कैसे काम करती है
स्पेस्ड रिपीटेशन (Spaced Repetition) एक ऐसी स्टडी तकनीक है, जिसमें किसी भी टॉपिक को एक ही बार रटने की बजाय, थोड़े-थोड़े अंतराल पर दोहराया जाता है। इसमें रोज़ घंटों पढ़ने की जरूरत नहीं होती। बल्कि वही चैप्टर एक दिन बाद, फिर कुछ दिन बाद और फिर एक हफ्ते बाद दोबारा देखा जाता है।

हर बार जब स्टूडेंट उस टॉपिक से दोबारा मिलता है, तो दिमाग उसे नई जानकारी नहीं, बल्कि पहले से जानी-पहचानी चीज़ मानता है। इसी प्रक्रिया से जानकारी धीरे-धीरे शॉर्ट टर्म मेमोरी से निकलकर लॉन्ग टर्म मेमोरी में चली जाती है।
CBSE स्टूडेंट्स के लिए तरीका इतना असरदार क्यों है
CBSE की पढ़ाई सिर्फ याद करने तक सीमित नहीं है। यहां सवालों को समझना, सही भाषा में जवाब लिखना और समय के दबाव में सोच पाना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में आखिरी वक्त पर रट्टा मारने की आदत अक्सर घबराहट बढ़ा देती है।
स्पेस्ड रिपीटेशन वजह से चैप्टर बार-बार दिमाग में दोहराए जाते हैं, जिससे कॉन्सेप्ट धीरे-धीरे मजबूत होता है। एग्जाम के समय वही चैप्टर नए नहीं लगते, बल्कि ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें पहले कई बार समझा जा चुका हो। यही आत्मविश्वास बढ़ाता है।
सोशल साइंस जैसे सब्जेक्ट में कैसे दिखता है इसका असर
मान लीजिए किसी स्टूडेंट ने इतिहास का “फ्रेंच रिवॉल्यूशन” चैप्टर पढ़ा। पढ़ते वक्त उसे सब कुछ समझ आ गया। अगर वह इस चैप्टर को एक हफ्ते तक नहीं देखेगा, तो ज्यादातर तारीखें और घटनाएं धुंधली हो जाएंगी। लेकिन अगर वही स्टूडेंट अगले दिन बिना नोट्स देखे याद करने की कोशिश करे, फिर दो-तीन दिन बाद खुद को सवाल पूछे और एक हफ्ते बाद सिर्फ कन्फ्यूजन वाले हिस्सों पर ध्यान दे, तो वही चैप्टर लंबे समय तक दिमाग में बैठ जाता है। यही स्पेस्ड रिपीटेशन असली ताकत है।
2-3-5-7 मेथड, जो पढ़ाई को बना देता है आसान
स्पेस्ड रिपीटेशन का एक पॉपुलर तरीका 2-3-5-7 मेथड भी है। इसमें किसी भी टॉपिक को धीरे-धीरे बढ़ते गैप के साथ दोहराया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इसी फॉर्मूले को एग्जाम से पहले उल्टा प्लान करके भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे बिना ज्यादा दबाव के पूरे सिलेबस का रिवीजन हो जाता है।
रट्टा मारने और समझदारी से पढ़ने में फर्क
लास्ट मिनट क्रैमिंग में जानकारी थोड़ी देर के लिए याद रहती है और फिर जल्दी गायब हो जाती है। वहीं स्पेस्ड रिपीटेशन में दिमाग को थोड़ा भूलने दिया जाता है और फिर सही समय पर याद दिलाया जाता है। यही वजह है कि हर बार रिवीजन के साथ मेमोरी और मजबूत होती जाती है।
आज के समय में यह जर्मन तकनीक क्यों जरूरी है
आज का CBSE सिलेबस भारी है, लेकिन समय उतना ही सीमित है। ऐसे में स्पेस्ड रिपीटेशन स्टूडेंट्स को यह सिखाती है कि पढ़ाई ज्यादा घंटों की नहीं, सही तरीके की होनी चाहिए। छोटे-छोटे लेकिन स्मार्ट रिवीजन से न सिर्फ याददाश्त बेहतर होती है, बल्कि पढ़ाई का डर भी कम हो जाता है। 140 साल पुरानी यह जर्मन तकनीक आज भी इसलिए काम करती है, क्योंकि इंसानी दिमाग आज भी उसी तरह काम करता है, जैसा तब करता था।
