Osho Spiritual Influence: एक ऐसा आदमी जो मायावी दुनिया के तमाम सत्यों को आपके सामने रखता है जिसको सुनकर आप समझ सकते हैं कि समस्या क्या है तथा उससे कैसे निपटा जाए। ओशो की वाणी व प्रवचन शैली मंत्रमुग्ध करने वाली है। मैंने शायद ही ऐसे लोग देखे व सुने हैं जिनकी आवाज सुनकर हम
स्वयं से परे किसी दूसरे लोक में पहुंच जाते हैं। इतना ही नहीं ओशो एक बात को कई आयामों और उदाहरणों के साथ सरल व सहज भाषा में प्रस्तुत करते हैं, वो भी किसी भी विषय पर पूरे विस्तार के साथ।
सबसे बड़ी बात यह है कि जब आप ओशो को सुनते हैं तब आप एक बार को भी उसमें कोई कमी नहीं निकाल सकते उन्हें सुनते वक्त अविश्वास की कोई स्थिति ही नहीं पैदा होती। ओशो पूरे मास
को अपील करते हैं। उनको सुनने वाले अगर पांच सौ लोग हैं, और वो सभी भिन्न-भिन्न विचार धारा वाले हैं, फिर भी वह एक तल पर सहमत हो जाते हैं, यह बड़ी अद्भुत बात है। जिसे आप मास अपील के साथ-साथ मास हिस्टीरिया या मास हिप्नोसिस भी कह सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई वक्ता उनके जैसा कभी हुआ होगा।
मैंने ओशो को खूब पढ़ा भी है और उनके कैसट्स को भी सुना है। उन्हें मैंने सबसे पहले अपने कॉलेज के दिनों में धर्म और अध्यात्म संबंधी विषय पर पढ़ा था, फिर ओशो ने जो विज्ञान पर बोला है उसे पढ़ा। फिर तो मैं आगे उन्हें पढ़ता गया।
ओशो ने जहां कहीं भी संबंधों पर जो बोला है वह मुझे बहुत प्रिय है। क्योंकि उससे मुझे व्यक्ति बोध का ज्ञान होता है और आगे का मार्ग प्रशस्त होता है। मुझे ओशो की एक बात बहुत प्रिय है जो उन्होंने कही है कि ‘यदि एक बार हमें आत्म बोध हो जाए तो हमारा बोध ही हमें बताता है कि हमें स्वयं को कैसे और कहां ले जाना है।’
ओशो ने सिखाया कि इससे पहले हम दूसरों को खुश करने की कोशिश करें उससे पहले हम खुद को खुश करने की कोशिश करें। दूसरों की जरूरत से पहले अपनी जरूरतों को पूरा करें क्योंकि यदि
हम खुद को खुश करते हैं तो अप्रत्यक्ष रूप से अपने आसपास के पूरे माहौल को खुश करते हैं।
सबसे अच्छी और यूनीक बात तो ये है कि ओशो ने बहुत रूपों में बहुत कुछ दिया परंतु किसी भी चीज को मानने के लिए बाध्य नहीं किया। ओशो के कम्यून या उनके दर्शन को लेकर लोगों ने उसे बहुत
संकुचित दायरे में देखने की कोशिश की है। मैं स्वयं तीन दिन तक उनके कम्यून में भी रहा हूं। वह जगह बहुत ही खूबसूरत, शांत व रूपांतरण करने वाली है। संक्षिप्त में कहूं तो मेरे लिए वो तीन दिन अपने आप को, अपनी कमियों को पहचानने के दिन थे। मैं क्या हूं, क्यों हूं? मेरे विचार कैसे और कहां से उठते हैं? तथा अपने विचारों की प्रक्रिया के साथ में कैसे जी सकता हूं? यह सब मैंने वहां जाकर सीखा और समझा। जब मैं कम्यून गया था उन दिनों मैं संबंधों से उपजी मानसिक पीड़ा से गुजर रहा था।
स्वयं को भटका हुआ महसूस कर रहा था, जिसके सामने कई दरवाजे थे पर कौन सा दरवाजा सही है, किसे खोला जाए समझना मुश्किल था। मैं सोचता हूं अगर वो तीन दिन मेरे जिंदगी में नहीं आते तो शायद आज मैं वो इंसान नहीं होता जो हूं। ओशो की किसी के साथ तुलना करना या उन्हें किसी परिभाषा या छवि में बांधने की कोशिश करना उनके साथ नाइंसाफी करना है। ओशो को हम आज के किसी भी मौजूदा गुरु से मिला ही नहीं सकते। भले ही आचार संहिता के तौर पर लोग ओशो को नकारात्मक कहने की कोशिश करें परंतु ओशो ने जिस रूप में अपने विचारों और उपस्थिति को सामने रखा है मुझे उस रूप की रेखाओं के आस-पास भी कोई व्यक्ति नहीं लगता।
यूँ तो कई गुरु हैं जिनके लाखों शिष्य भी हैं परंतु मेरी नजर में वह सब ओशो के सामने खोखले हैं।
ओशो का चिंतन आज के युग की मांग है। सरल शब्दों में आज के मनुष्य को मुक्ति के सूत्र ओशो ने दे
दिए हैं। ये रत्न कैसे दूर-दूर फैलें, कैसे सुदूर दिशाओं में यह ज्योति प्रज्जवलित हो उठे, उसका प्रयास
ही आज की जरूरत है।

— दिग्विजय सिंह
(पूर्व मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश)
