Hindi Poem
Hindi Poem

Hindi Poem: मन में तैरता ढूँढता है वो
जैसे किसी कश्ती को
भूखंड की तलाश हो —
कभी लहरों पर सवार होकर आता,
कभी मौन में डूब जाता है।

ठहर जाना चाहता है मुझमें —
रेत से लिपटा हुआ,
थका, पर अभी भी जीवित।
मैं छूती हूँ उसे —
तो वह फिसल जाता है
जैसे कोई अधूरा वादा,
या कोई सपना जो पलकों से बाहर गिर गया हो।

मृगतृष्णा तो नहीं…?
कभी-कभी सोचती हूँ,
यह जो भीतर का शोर है —
क्या यह सच में किसी की पुकार है,
या मेरी ही प्रतिध्वनि…
जो लौट-लौट कर आती है,
मुझसे ही टकराती है।

गुमसुम बैठी सोचती हूँ —
कभी-कभी कुछ भावों को
समय पर छोड़ देना ही अच्छा होता है।
क्योंकि कुछ ठहराव,
हमारे नहीं होते —
वे बस राह में आए पड़ाव होते हैं।

और मैं…
फिर से अपने भीतर की
कश्ती को समेट लेती हूँ —
क्योंकि यात्रा अभी बाकी है।