Summary: प्यार का एक घूंट
माँ-बेटी के रिश्ते में दूरियाँ और खामोशियाँ अक्सर गलतफहमियों से जन्म लेती हैं। लेकिन एक हादसा और एक कप चाय इन दोनों के दिलों को फिर से करीब ले आया, जहाँ हर घूंट में प्यार और समझ की नई मिठास घुल गई।
Hindi Short Story: सुबह के सात बज रहे थे। रसोई से उठती चाय की तेज़ खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। सविता ने दो कप में चाय डाली एक अपनी, और दूसरा कप अपनी बेटी नंदिनी के लिए। पर जैसे ही उसने दूसरा कप ट्रे में रखा, मन ही मन कहा, अब तो उसे मेरे साथ चाय पीने की फुर्सत भी नहीं है। नंदिनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने की तैयारी में थी। दोनों माँ-बेटी के बीच अब बातों से ज़्यादा खामोशियाँ पसरी थीं। नंदिनी को लगता कि माँ हर बात में दखल देती हैं कपड़े कैसे पहने, दोस्तों से कब मिली, कहाँ जा रही है हर चीज़ पर सवाल वहीं सविता को लगता कि बेटी अब बिल्कुल बदल गई है – ना बात करती है, ना ही मेरी बातें सुनती है।
नंदिनी, ज़रा नाश्ता कर ले, फिर पैकिंग पूरी कर लेना, सविता ने आवाज़ लगाई। माँ, मुझे देर हो रही है, नाश्ता नहीं चाहिए, कमरे से तेज़ आवाज़ आई। सविता ने चुपचाप रसोई की खिड़की से बाहर देखा। आँखों में नमी थी, पर होंठों पर मजबूर मुस्कान। शाम को जब नंदिनी ऑफिस के कागज़ों में उलझी थी, तभी बाहर ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई। सविता ने दरवाज़े के पास खड़े होकर कहा, बारिश में भीग मत जाना, ज़ुकाम हो जाएगा। माँ, मैं बच्ची नहीं हूँ, नंदिनी ने चिढ़कर कहा। सविता कुछ बोल नहीं पाई। उसने बस धीमे से कहा, ठीक है, और कमरे से निकल गई। रात को बिजली चली गई। घर में अंधेरा और सन्नाटा फैल गया। तभी बाहर से किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई कॉलोनी के बाहर एक एक्सीडेंट हुआ है।
सविता तुरंत बाहर की तरफ दौड़ी। जब तक वो पहुँची, बारिश और अँधेरे में एक स्कूटी सड़क किनारे गिरी पड़ी थी, एक लड़की थी जिसका हेलमेट से ढका हुआ था। सविता का दिल जैसे रुक गया। उसने आगे बढ़कर हेलमेट उतारा वो नंदिनी थी। “नंदिनी” सविता की चीख गूंजी। पास के लोगों की मदद से उसे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने बताया, घबराने की बात नहीं है, बस सिर पर हल्की चोट है, खतरे से बाहर हैं। सविता ने राहत की सांस ली और उसके बगल में बैठ गई। बारिश अब भी खिड़की के बाहर गिर रही थी। उसने बेटी के सिर पर हाथ फेरा , ये वही स्पर्श था जो बचपन में नंदिनी की हर चोट का दर्द मिटा देता था।

कुछ देर बाद नंदिनी को होश आया। उसने देखा, माँ की आँखें लाल थीं, पर उनमें प्यार और चिंता की लकीर साफ़ नज़र आ रही थी। माँ कहकर उसकी आवाज़ कांप गई। सविता ने तुरंत कहा, कुछ मत बोल, बस आराम कर। नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले। माँ, मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं हमेशा आपको गलत समझती रही। आप तो बस मेरी फिक्र करती थीं।
सविता ने उसका हाथ थामा, “मुझे किसी माफ़ी की ज़रूरत नहीं, बस तू ठीक रहे, यही काफी है।अगली सुबह जब नंदिनी ने घर लौटकर माँ को गले लगाया, तो सविता मुस्कुराई। चल, चाय पीते हैं, तूने कल छोड़ी थी ना, और दोनों मुस्कुराने लगे। नंदिनी बोली, आज चाय मैं बनाऊँगी माँ, और हर सुबह आपके साथ ही पीऊँगी।
चाय के दो कपों से उठती भाप जैसे उनके बीच के सारे गिले-शिकवे अपने साथ उड़ा ले गई। अब हर सुबह उन दोनों के बीच सिर्फ चाय की नहीं, प्यार और समझ की भी खुशबू घुली रहती। सविता ने मन ही मन सोचा कभी-कभी रिश्ते बड़ी-बड़ी कोशिशों से नहीं बल्कि एक कप चाय से भी करीब आ जाते हैं।
