First Blind Woman to Climb ME: छोंजिन अंगमो का नाम आज देशभर में प्रेरणा का प्रतीक बन चुका है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की हांगरंग घाटी से आने वाली इस 29 वर्षीय युवती ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना करना भी आम लोगों के लिए कठिन होता है। दृष्टिहीन होते हुए भी उन्होंने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर लिया और भारत की पहली नेत्रहीन पर्वतारोही बन गईं जिन्होंने यह ऐतिहासिक कारनामा किया है।
8 साल की उम्र में खो दी थी रोशनी
अंगमो की जिंदगी आसान नहीं थी। आठ साल की उम्र में एक बीमारी के कारण उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी। लेकिन यह अंधकार उनके सपनों को रोक नहीं सका। उन्होंने अपने भीतर की रोशनी को ही मार्गदर्शक बना लिया। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने पर्वतारोहण में रुचि लेनी शुरू की और 2016 में एक पेशेवर माउंटेनियरिंग कोर्स पूरा किया। इसके बाद उन्होंने लद्दाख और सियाचिन जैसे कठिन इलाकों की चोटियों पर चढ़ाई कर अनुभव भी हासिल किया।
हिमालय की बेटी
माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है और जब यह एक नेत्रहीन महिला कर दिखाए, तो वह अद्भुत बन जाती है। अंगमो ने यह चढ़ाई पर्वतारोही डांडू शेरपा, ओम गुरुंग और अभियान प्रमुख लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) रोमिल बर्थवाल के साथ की। जब उन्होंने चोटी पर पहुँच कर तिरंगा फहराया, तो उसका वीडियो देखकर उनके गांव चांगो में गर्व और खुशी की लहर दौड़ गई। वहां के लोग आज उन्हें ‘हिमालय की बेटी’ कहकर पुकारते हैं।
अंगमो अब उस दुर्लभ समूह का हिस्सा बन चुकी हैं जिसमें दुनिया भर के कुछ ही दृष्टिहीन पर्वतारोही शामिल हैं जैसे अमेरिका के एरिक वेहेनमेयर, ऑस्ट्रिया के एंडी होल्ज़र, चीन के झांग होंग और अमेरिका के लॉनी बेडवेल। लेकिन इन सभी में अंगमो ही एकमात्र महिला हैं, और भारत की पहली नेत्रहीन व्यक्ति जिन्होंने एवरेस्ट पर तिरंगा लहराया।
आंतरिक शक्ति को जगाने का ज़रिया
छोंजिन अंगमो की यह उपलब्धि सिर्फ एक मंज़िल नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। अब उनका सपना है कि वह दुनिया के हर महाद्वीप की सबसे ऊँची चोटी पर भारत का झंडा फहराएं। वह मानती हैं कि शारीरिक चुनौतियाँ कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति को जगाने का ज़रिया होती हैं।
छोंजिन की कहानी आज भारत की लाखों बेटियों और युवाओं को यह संदेश देती है कि अगर दिल में जुनून और दिमाग में लक्ष्य हो, तो कोई भी बाधा इतनी बड़ी नहीं होती जिसे पार न किया जा सके। उनका जीवन वास्तव में एक जीवंत उदाहरण है कि सच्ची इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास से इंसान पहाड़ों को भी झुका सकता है।
