जागो ग्राहक- क्या 'हेल्दी', 'फ्रेश' और 'नेचुरल' महज मार्केटिंग चाल हैं? पैकेजिंग की सच्चाई जानें: Food Packaging Reality
Food Packaging Reality

Food Packaging Reality: क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि कोई प्रोडक्ट केवल इसलिए खरीदा है क्योंकि उसके नाम में हेल्दी, नेचुरल लगता है? आपने प्रोडक्ट के नाम में लिखा हुआ देखा ‘ताजा’, ‘हेल्दी’ या ‘टेस्टी’ और सोच लिया कि जब प्रोडक्ट का नाम ही ये है, तो वाकई यह सच बात होगी। किसी बिस्किट में ओट्स कंटेंट प्रोडक्ट के नाम के साथ जुड़ा देखा तो झट से खरीद लिया कि हेल्दी इंग्रेडिएंट हैं। लेकिन आपने पैकेट के पीछे दी पूरी इंग्रेडिएंट्स लिस्ट नहीं देखी जहां यह मेंशन होगा कि ओट्स केवल 1.5% ओट्स है और 61% मैदा है। अब आप ही सोचिए कि ये हेल्दी कैसे हो गया।

कई कंपनियां अपने उत्पादों को अधिक आकर्षक बनाने के लिए क्रिएटिव नामों का उपयोग करती हैं।लेकिन यदि आप पैकेजिंग पर यह लाइन देखते हैं, “This is only a brand name or trade mark and does not represent its true nature (यह केवल एक ब्रांड नाम या ट्रेडमार्क है और इसका असली स्वभाव नहीं दर्शाता।)”, तो आपके सचेत होने की ज़रूरत है।

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पैकेट पर दी जाने वाली चेतावनी, जैसे ‘यह केवल एक ब्रांड नाम है और इसका असली स्वभाव नहीं दर्शाता’, कंपनियों को कानूनी सुरक्षा देती है। इसका मतलब है कि वे जो दावा कर रहे हैं, उसकी जिम्मेदारी लेने से बच रहे हैं। खाद्य उत्पाद की प्रकृति के बारे में उपभोक्ताओं को गुमराह करने से रोकने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा इस डिस्क्लेमर की आवश्यकता है।

हेल्दी फूड का भ्रम

  • हेल्दी ओट्स बिस्किट जैसी चीज़ें अक्सर हेल्दी मानी जाती हैं। परंतु सच यह है कि उनमें अधिकांश हिस्सा रिफाइंड फ्लोर और चीनी का होता है।कई बार “जीरो ट्रांस फैट” का दावा किया जाता है, जबकि उनमें हाइड्रोजनेटेड ऑयल होता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

फ्रेश प्रोडक्ट्स का दावा

  • ‘फ्रेश जूस’ कहकर बेचे जाने वाले पैकेटेड जूस में प्रिजर्वेटिव और आर्टिफिशियल फ्लेवर होता है। यह वास्तव में लंबे समय तक स्टोर किया हुआ होता है। ‘ताजा दूध’ जैसे शब्दों का उपयोग उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाने के लिए किया जाता है कि दूध सीधे खेतों से आया है, जबकि यह पाश्चुराइजेशन और पैकेजिंग से गुजर चुका होता है।

नेचुरल का खेल

  • ‘नेचुरल फ्रूट फ्लेवर’ का मतलब यह नहीं कि उसमें असली फल हैं। इसमें केमिकल फ्लेवर होते हैं जो फल का स्वाद देते हैं।

भावनात्मक जुड़ाव

  • ‘हेल्दी’ या ‘नेचुरल’ जैसे शब्द सुनने भर से उपभोक्ता को लगता है कि यह उनके और उनके परिवार के लिए सही विकल्प होगा।
  • ब्राइट और हरे रंग की पैकेजिंग, फल-सब्जियों की तस्वीरें या फिटनेस थीम पर आधारित डिजाइन उपभोक्ता को यह मानने पर मजबूर करते हैं कि प्रोडक्ट अच्छा और स्वास्थ्यवर्धक है।

समय की कमी

  • अधिकांश लोग उत्पाद खरीदते समय इंग्रेडिएंट्स और न्यूट्रिशनल वैल्यू नहीं पढ़ते।

ब्रांड पर भरोसा

  • बड़ी और प्रसिद्ध कंपनियों पर उपभोक्ता आंख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं।

इंग्रेडिएंट्स पर ध्यान दें

  • पैकेट के नाम पर भरोसा न करें। सामग्री की पूरी लिस्ट पढ़ें। शुगर, फैट और कैलोरी की मात्रा जांचें।

न्यूट्रिशनल वैल्यू को समझें

  • ‘हाई फाइबर’ का मतलब यह नहीं कि यह पूरी तरह फाइबर से बना है। अगर प्रोडक्ट में ओट्स है, तो देखें कि उसकी प्रतिशत मात्रा कितनी है।

प्राकृतिक विकल्प चुनें

  • बाजार से मिलने वाले प्रोडक्ट्स की जगह घरेलू विकल्प चुनें। अगर आपको ओट्स कुकीज़ चाहिए, तो घर पर बनाएं ताकि सामग्री पर आपका नियंत्रण हो।

इन दावों पर सवाल करें

  • क्या प्रोडक्ट वाकई हेल्दी है?, क्या इंग्रेडिएंट्स और न्यूट्रिशनल वैल्यू आपके स्वास्थ्य के लक्ष्यों के अनुरूप हैं? इस तरह के सवाल ज़ेहन में आने दें।

हेल्दी, फ्रेश, और नैचुरल जैसे शब्द कंपनियों की मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। असली सच्चाई उत्पाद की सामग्री और न्यूट्रिशनल जानकारी में छुपी होती है। इसलिए अगली बार जब आप किसी उत्पाद को खरीदने जाएं, तो इसके पैकेजिंग और ब्रांड नाम से प्रभावित होने के बजाय, पैकेट के पीछे की सच्चाई को जांचना न भूलें।

सोनल शर्मा एक अनुभवी कंटेंट राइटर और पत्रकार हैं, जिन्हें डिजिटल मीडिया, प्रिंट और पीआर में 20 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने दैनिक भास्कर, पत्रिका, नईदुनिया-जागरण, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हितवाद जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया...