Gili Gulgul
Gili Gulgul

Kids story in hindi: नील ने अभी-अभी अपना होमवर्क पूरा किया था। सोच रहा था, लो! आज का पूरा दिन तो होमवर्क करने में ही बीत गया। कहने को इतवार छुट्टी का दिन है, पर होमवर्क से फुर्सत मिले तब न!

फिर उसने सोचा, ‘भला यह भी कोई जिंदगी है कि सुबह से शाम तक किताबें ही पढ़ते रहो। किताबें, किताबें, सिर्फ किताबें। आखिर आदमी को बाहर निकलकर भी दुनिया देखनी चाहिए।’

कहकर उसने आँखें बंद कीं और चुपचाप आरामकुर्सी पर पीछे सिर टिकाकर बैठ गया।

तरह-तरह के विचार उसके मन में आ रहे थे। और वह सोच रहा था, “काश, वह कहीं घूमने निकल जाता। दूर, बहुत दूर….!”

“तो फिर आओ न! आओ नील मेरे साथ…!” अचानक हवा में एक पतली सी आवाज गूंजी। छोटी-छोटी घंटियों की टुनटुनाहट जैसी।

सुनते ही नील ने चौंककर आँखें खोल दीं। हैरानी से इधर-उधर देखने लगा, लेकिन कोई नजर नहीं आया।

‘तो फिर आवाज आई कहाँ से? कहाँ से!’ नील ने ध्यान से इधर-उधर देखते हुए सोचा।

इतने में उसे जमीन पर गोल-गोल गेंद जैसी कोई चीज दिखाई दी। एकदम सफेद। उस पर एक बड़ा सा मुँह भी बना हुआ था। वहीं से आवाज आ रही थी।

“मैं हूँ मैं…! मैं तुम्हें बुला रहा हूँ। मेरा नाम है गिली गुलगुल!” नील को सुनाई दिया।

सुनकर नील एक पल के लिए चकराया। गिली गुलगुल…? मगर वह उसके कमरे पर कैसे आ गया। और वह भी उस समय, जब उसे उसकी बहुत जरूरत थी। उसने एली मून की ‘वंडर्स ऑफ साइंस’ किताब में इस अजीब-से शख्स गिली गुलगुल के बारे में पढ़ा था, जो दूसरों से इतना अलग और अजीब था कि पढ़कर वह भौचक रह गया था। पर… पर वही गिली गुलगुल उसके पढ़ने के कमरे में…? सच?

यह तो किसी बड़े अचरज से कम नहीं था।

सोचते ही नील के भीतर धुकधुकी होने लगी।

“तुम? तुम हो गिली गुलगुल?” नील को जैसे विश्वास नहीं हो रहा था। लिहाजा उसने बड़े रोमांचित होकर पूछ लिया, “तो क्या तुम्हीं उन प्राणियों में से हो, जिनका हाथ-पैर, मुँह कुछ नहीं होता और जो हजारों सालों से धरती पर यों ही गोल-गोल गेंद की तरह लुढ़कते रहते हैं। और जिनके बारे में मशहूर विज्ञान लेखिका एली मून ने बड़े मजेदार ढंग से लिखा है?”

“हाँ-हाँ नील, मैं वही हूँ, एकदम वही! पर तुम इतना चकरा क्यों रहे हो? बगैर हाथ-पैर-मुँह के भी तो मेरा काम आसानी से चल जाता है। बहुत आसानी से। इसलिए कि मेरे पास विज्ञान की दी हुई असाधारण शक्तियाँ हैं। देख रहे हो न, मैं बोल रहा हूँ। क्या मेरी आवाज तुम्हें सुनाई नहीं पड़ती? पर यह मेरी नहीं, मेरे दिमाग में फिट बड़े ही बारीक कंप्यूटर की आवाज है। उसी की मदद से मुझे तुम्हारी बातें समझ में आती हैं और मैं तुम्हें देख भी पा रहा हूँ।” कहकर गिली गुलगुल हँसा। खूब जोर से।

नील ने नोट किया कि गिली गुलगुल की आवाज कुछ-कुछ नकसुरी है, लेकिन बड़ी ही सुरीली और संगीतमय। इसलिए जब वह बोलता है तो लगता है, जैसे कोई मीठा गीत गुनगुना रहा हो।

“और हाँ!” गिली गुलगुल ने कहा, “बिना पैरों के भी मैं इतनी तेजी से लुढ़कता हूँ कि मिनटों में धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच जाता हूँ। कहो तो रात-भर में ही तुम्हें पूरी दुनिया की सैर करा दूँ। चलोगे मेरे साथ?”

“अरे वाह! चलो फिर तो!” नील भी तरंग में आ गया।

इस पर गिली गुलगुल ने कहा, “सुनो नील, मेरे ऊपर एक ढक्कन है। तुम उसे हटाओगे, तो मैं खूब बड़ा हो जाऊँगा। फिर उस सूराख से तुम अंदर आ जाना। बस, उसके बाद मेरी यात्रा शुरू हो जाएगी।”

नील को याद आया, एली मून ने भी तो ठीक यही बात लिखी थी। ओह, एली मून को साइंस की इन अजब-अनोखी चीजों के बारे में इतनी बातें कैसे पता चल जाती हैं? नील ने हैरानी से सोचा।

वह ढक्कन हटाकर झट गिली गुलगुल के पेट में चला गया और फिर गिली गुलगुल एकाएक दौड़ पड़ा। इतनी तेज, इतनी तेज कि पहले तो नील डरा, लेकिन फिर उसे मजा आने लगा।

और वाकई गिली गुलगुल ने नील को सारी दुनिया की सैर करा दी। उसने नील को अफ्रीका और अमरीका दिखाया, तो जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस भी। चीन और जापान भी। और भी न जाने कहाँ-कहाँ वह नील को घुमाता रहा। जब भी कोई देखने लायक चीज होती, गिली गुलगुल फौरन रुक जाता और नील से कहता, “आओ नील, बाहर आकर दुनिया देखो।”

और नील बड़े मजे से आसपास की चीजें देखता। नई नई इमारतें, नई-नई घाटियाँ। कहीं बर्फ से लदे पहाड़, कहीं फूलों की घाटियाँ। कहीं समंदर और झीलें। दुनिया के एक से एक बड़े आश्चर्य! देखने के बाद नील झट गिली गुलगुल के पेट में जा बैठता और आगे की यात्रा पर निकल पड़ता।

गिली गुलगुल ने नील को ऐसे विचित्र देश दिखाए, जिनमें खूब ऊँचे-लंबे लोग थे, तो ऐसे देश भी, जिनमें सभी छोटे कद के नाटे लोग थे। ऐसे देश दिखाए, जिनमें सभी गोरे लोग थे, तो ऐसे देश भी दिखाए, जिनमें लोग एकदम काले थे।

सबसे अनोखा था उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों का नजारा, जहाँ बारहों महीने बर्फ ही बर्फ नजर आती थी। मानो हड्डियों को पिघलाती बर्फ का समंदर हो। और उससे भी मुश्किल था, ऐसे देशों की ओर आना, जहाँ गरमी के मारे हर कोई हलकान था।

“मगर दुनिया का असली आनंद तो इसी में है। देखो न नील, दुनिया कितनी रंग-बिरंगी है और कितनी खूबसूरत भी। अगर सभी लोग एक जैसे होते, तो क्या यह संसार इतना सुंदर और आकर्षक लगता?” गिली गुलगुल कह रहा था। “और फिर इससे भी बड़ी बात यह है कि विज्ञान ने दूरियों को पाट दिया है। अब पूरी दुनिया बस एक बड़े से गाँव जैसी हो गई है, जिसमें हर कोई हर किसी के बारे में जानता है। मोबाइल और इंटरनेट ने कितना कमाल कर दिया है हमारी दुनिया में। और फिर फेसबुक है, ट्विटर… और भी न जाने कौन-कौन सी चीजें, जो सारी दुनिया के लोगों का आपस में मेल-मिलाप और दोस्ती करा रही हैं। लोग अब एक-दूसरे के बारे में काफी कुछ जानने लगे हैं। क्यों, मैं ठीक कह रहा हूँ न?”

वाकई…वाकई। नील उत्तेजना से भरकर बोला, तुम ठीक कह रहे हो गिली गुलगुल। आज मुझे तुम्हारे साथ घूमते हुए पहली बार लगा कि दुनिया कितनी रंग-बिरंगी है। उसमें कितने रंग, कितने रूप और कैसी-कैसी सुंदरताएँ हैं।

यही नहीं, जो चीजें नील ने अपने इतिहास और साइंस की किताबों में पढ़ी थीं, उन्हें अपने सामने देखकर उसे बहुत मजा आया।

*

सुबह नील गिली गुलगुल के पेट में बैठा। हिलता-डुलता घर पहुँचा, तो देखा, मम्मी- पापा परेशान! आस-पड़ोस के लोग भी वहाँ आकर सोच रहे हैं कि आखिर नील चला कहाँ गया! लेकिन नील ने जब रात भर की पूरी दुनिया की सैर का किस्सा सुनाया, तो सभी के चेहरे खिल उठे। नील ने अपने मम्मी-पापा और दोस्तों को गिली गुलगुल से मिलवाया।

कुछ देर बाद गिली गुलगुल सबसे विदा लेकर चला गया। जाते-जाते उसने नील से कहा, “नील, इस बार जब तुम्हारी गरमी की छुट्टियाँ होंगी तो हम और भी लंबी सैर पर निकलेंगे। तैयार रहना।” खुश होकर नील ने प्यार से हाथ हिलाकर गिली गुलगुल को विदा किया।

ये कहानी ‘इक्कीसवीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं 21vi Sadi ki Shreshtha Baal Kahaniyan (21वी सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियां)