नन्ही गोगो के घर के पीछे एक सुंदर-सा पार्क था। वहाँ इतने किस्म-किस्म के झूले थे और बच्चे वहाँ इतने ज्यादा आते कि उसका नाम पड़ गया—झूला पार्क।
एक दिन मम्मी गोगो को पार्क में घुमाने ले गईं तो उसकी खुशी का ठिकाना न था। उसने देखा—अरे, यहाँ तो काफी झूले हैं और बच्चे हँसते-खेलते हुए मजे में झूल रहे हैं!
एक से एक बढ़िया झूले थे वहाँ। फिसलन पट्टी, सी-सॉ, घूमने वाला ढोल, लटकन झूला, पिंग-पों मोटर साइकिल और रस्सी वाले झूले।…और हाँ, एक चकरीदार घूमने वाला झूला भी था, जिसे सब परी झूला कहते थे। वह अपनी जगह गोल-गोल, तेज-तेज घूमता।
नन्ही गोगो को फिसलन पट्टी पर झूलना खूब मजेदार लगा। वह दौड़-दौड़कर झूलती और फिर पीछे जाकर लाइन बनाकर खड़े बच्चों के पीछे आकर खड़ी हो जाती। फिर दूसरे बच्चों के साथ-साथ वह भी सीढ़ियाँ चढ़कर फिसलने के लिए तैयार हो जाती।
फिसलन पट्टी वाकई लाजवाब थी। इतनी चिकनी, इतनी चिकनी कि क्या कहा जाए! उस पर फिसलते हुए गोगो को इतना अच्छा लगा कि वह जोर-जोर से किलकारियाँ भरने लगी।
इसी तरह गोल चकरी वाले रंग-बिरंगे परी झूले पर वह झूली और गिनकर एक-दो नहीं, पूरे तीस चक्कर काटे।
फिर गोगो दौड़कर सी-सॉ के पास गई। वहाँ खेलते हुए बच्चों से बोली, “मुझे भी खिला लो न प्लीज!”
एक शरारती लड़की थी शीनू। वह बोली, “आ जा गोगो, झूल ले।” उसने सोचा, मैं गोगो को इतना ऊँचा उठाऊँगी और देर तक हवा में टाँगे रखूँगी कि यह भी क्या याद करेगी! मगर गोगो इतनी भोली थी, इतनी भली कि शीनू सारी शरारतें भूल गई और प्यार से गोगो को सी-साॅ पर झुलाने लगी।
जब गोगो नीचे होती और शीनू का पलड़ा ऊपर उठ जाता तो गोगो को हँसते-हँसते जीभ चिढ़ाने में मजा आता। यह देखकर शीनू भी खूब जोरों से हँस देती और आसपास देखने वालों की भी हँसी छूट जाती।
शाम को सर्दी बढ़ने लगी तो मम्मी ने उठकर अच्छी तरह शॉल ओढ़ाते हुए कहा, “चल गोगो, ठंड लग जाएगी।”
“अच्छा मम्मी, थोड़ी देर सी-साॅ पर और झूल लूँ। बस थोड़ी देर, फाइव मिनट्स…!”
गोगो थोड़ी देर और इसी तरह मजे में झूलती रही। शीनू को भी गोगो के साथ सी-साॅ पर झूलना अच्छा लग रहा था। गोगो की शरारतों पर बार-बार उसकी हँसी छूट रही थी। लेकिन कुछ बच्चे इंतजार में खड़े थे और उनकी अकुलाहट बढ़ती जा रही थी। उनमें से एक लंबे से लड़के ने दाँत भींचकर कहा, “लालची कहीं की!”
उसने कहा धीमे से था, पर गोगो की मम्मी ने सुन लिया। वे गोगो से बोलीं, “अब हटो गोगो, इनकी भी बारी है।”
गोगो उठी, पर तभी उसे पेंग बढ़ाकर झूलने वाला एक झूला दिखाई पड़ गया। बोली, “मम्मी, बस पाँच मिनट! इस पर थोड़ा झूल लूँ, फिर किसी चीज के लिए जिद नहीं करूँगी।…प्राॅमिस! आप बस पीछे से जरा-सा धक्का दे दो ना।”
मम्मी ने हलके-से धक्का देकर उसका झूला आगे बढ़ाया, तो गोगो खुद पैर आगे बढ़ाकर उस झूले की गति को बढ़ाने लगी। मम्मी से बोली, “हाँ मम्मी, अब जरा फिर से धक्का देना—और तेज, और तेज…!”
आखिर मम्मी को टोकना पड़ा। उन्होंने कहा, “गिर जाओगी गोगो, अब बस भी करो।”
गोगो मम्मी के कहने पर लौटी तो पर उसका
मन वहीं रह गया था। अभी घूमने वाले ढोल और पिंग-पों मोटरसाइकिल पर तो वह झूली ही नहीं थी। रात भर उसे सपने में झूले दिखाई देते रहे। वह झूलती रही, झूलती रही।
अगले दिन क्लास में उसने सभी सहेलियों को अपनी कॉलोनी के शानदार झूला पार्क के बारे में बताया तो सुनकर सबने कहा, “अरे, वाह…फिर तो हम भी कभी आएँगे झूलने के लिए!”
शाम को गोगो ने फिर मम्मी से कहा, “घूमने नहीं चलोगी मम्मी?”
मम्मी हँसकर बोलीं, “चलूँगी, पर इस शर्त पर कि…”
और मम्मी के कहने से पहले ही गोगो समझ गई कि मम्मी क्या कहना चाहती हैं। वह बोली, “मम्मी, मैं समझ गई आपकी बात। अब मैं बिल्कुल जिद नहीं करूँगी और अँधेरा होने से पहले ही आपके साथ उठकर आ जाऊँगी।…और हाँ, मम्मी, इस बार मैं बस दो ही झूलों पर झूलूँगी—घूमने वाला ढोल और पिंग-पों मोटरसाइकिल!”
इस पर गोगो की मम्मी फिर उसका हाथ पकड़कर बगल वाले सुंदर से झूला पार्क की ओर चल दीं।
गोगो का नन्हा दोस्त पोपू भी पूँछ उठाए उछलता-कूदता हुआ पीछे-पीछे चल रहा था। देखकर गोगो की मम्मी जोर से हँस पड़ीं।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
