भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
रात से ही बादल बरस रहे थे। नवम्बर के महीने में इस कदर बारिश होना दिल की बेचैनी को और बढ़ा रहा था। बाहर बरसात से और भीतर यादों के अतिरेक से सब तरबतर हो रहा था।
अपने भींगे मन को हथेली पर सजा मैं पेन से उसका नाम उकेर रही थी कि तभी बाहर कोई आहट हुई। जैसे कोई आया हो।
“इतनी बारिश में कौन हो सकता है!” मैंने अपने हथेली पर रखे भीगे दिल को अंदर ठूंसते हुए अपने आप से ही पूछा।
तभी दिमाग ने करवट ली, “यूँ दरवाजा न खोल। न जाने कौन है।”
“हम्म…ठीक है। खिड़की से देखती हूँ।” सोचकर मैंने पर्दा हटाया लेकिन वहाँ कोई न था। हाँ, दूर गुलमोहर के नीचे जरूर कुछ हिल रहा था। मैंने गौर से देखा तो…तो देखती ही रह गई।
“ये…ये तो…ये तो वही है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है…ये…ये तो…!!” मैंने तेजी से खिड़की और पर्दा लगभग साथ-साथ ही बन्द किए लेकिन साथ ही मेरे दिल की हजार खिड़कियाँ खुल गईं। एक-एक खिड़की पर एक-एक याद बैठी थी। कोई उसके साथ हँसती तो कोई शर्माती, कोई रोती तो कोई गुमसुम, कोई शरारत से देखती तो कोई पिड्डू खेलती, कोई गुलमोहर के सुर्ख फूल चुनती तो कोई…।
मैंने दिमाग को टटोला, “मैंने तो इन यादों की हर एक खिड़की पर ताला जड़ दिया था लेकिन ये सब आज इस तरह एक साथ…”, मैंने सिर झटका और फिर एक बार बाहर झाँकने के लिए पर्दा हटाया और देखा तो वहाँ… गुलमोहर के नीचे…कोई न था।
“क्या? वह वहाँ से जा चुका है या…”
अब तो बस मैं थी, मेरा दिल था और मेरी यादें। लेकिन ये कमबख्त दिल भी न… कभी किसी सिक्वेन्स को माना है इसने! कब, कहाँ, कौन सी याद को सामने लाकर खड़ा कर देगा, कोई नहीं जानता। लगता है “दिल पर कब किसका जोर चला है”, यह जुमला आज अपनी सत्यता साबित करके ही मानेगा।
सारी यादों को कैद में रखने के बाद भी आज यादों की एक खिड़की… किरर्रर करते हुए… हौले-से थोड़ी खुल ही गई।
नामाकूल गीला दिल, अपने आप को निचोड़ता हुआ, उस झिर्री से अंदर कूद पड़ा।
“ओह! यही खिड़की खुलनी थी आज! कितने जतन से ताला डाला था इस पर।” दिमाग ने फिर एक बार दिल पर चोट की। लेकिन तब तक दिल ओझल हो चुका था।अब तो खिड़की के भीतर दिल की भीनी-भीनी भीगी हँसी गूँज रही थी। वह शहनाई-सी हँसी सुन, मैं तप्ती धूप में हुई पहली बारिश की सौंधी मिट्टी हो गई। इर्द-गिर्द सुर्ख गुलमोहर खिल उठे। पीला पराग हवाओं में घुल गया। सितार बज उठे और मैंने मदमस्त होकर इस अधखुली खिड़की के दोनों किवाड़ पूरे खोल दिये।
भीतर बैठा ‘वो’…मेरी ओर देखकर मुस्कराया। मैं छुईमुई सी, शर्माई। चिलमन को झुकाते हुए, लरजते होठों से उसका नाम पुकारा ही था कि… दिमाग ने फिर मुझे झिंझोड़ा, “अब ‘वो’ तेरा नहीं है…‘वो’ नहीं है अब तेरा!!”
मुझे एक झटका-सा लगा। आँखों में पानी की लकीर उभरी और खिड़की की सलाखों पर दो मोती चमक उठे। आभासी किरणें उन मोतियों में इंद्रधनुष बनाती रहीं और मैं…मैं एक बार फिर दूर… उस गुमसुम-चुप चुप से गुलमोहर को देखने लगी।
‘वो’…वहीं खड़ा था। वैसा ही। वह कहीं गया ही नहीं था। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा था कि वो वहाँ नहीं था…। वहमी दिल भी कितना डरपोक हो जाता है। है न!!
मैं मन-ही-मन मुस्कराई। हाँ, अब मुझे यकीन हो चला था कि ये वो ही है…।
दिमाग की ताकीद पर, न चाहते हुए भी, मुझे वह फूलों से सजी खूबसूरत यादों की खिड़की बन्द करनी पड़ी। लेकिन दिल ने न मानना था, न उसने माना।
अब उसने हौले से यादों की दूसरी खिड़की भी खोल दी। यहाँ…यहाँ सिर्फ रेत थी। रेत-ही-रेत और सामने था लहराता हुआ विशाल समुंदर।
ये लापरवाह दिल अब मचलते हुए सागर की लहरों पर अठखेलियाँ करने लगा। समुंदर की रेत में छुपे काँच के महीन कण हीरे जैसे चमचमा रहे थे। जब भी कोई लहर किनारे पर आती, इनमें से कुछ हीरे अपने साथ ले जाती। और मैं…मैं रेत में थोड़ा और अंदर धंस जाती।
लहरों से बनते-बिगड़ते सफेद झाग के छल्लों से दूर बैठा वो…रेत के ढेर से महल बना रहा था। मैं अपने सुर्ख कुर्ते के कोनों से टपकती पानी की बूँदों को उँगलियों से हवा में उछालती, उसे अपलक निहार रही थी।
उसके दोनों हाथ कुहनी तक रेत में सने हुए थे। समुंदर से उठती ठंडी हवाएँ बार-बार उसके बालों से खेल रही थीं। जैसे ही उसने बिखरे बाल संवारने के लिए अपना रेत सना हाथ माथे पर लगाया, मुझे एक साथ बॉबी की डिंपल के ‘बेसन लगे हाथ’ और दिलीप कुमार जी का “उड़े जब-जब जुल्फें तेरी” याद हो आया। मैं मुस्कराए बिना न रह सकी।
अब अकेले भीगना मुझे मंजूर न था। मैं दौड़कर उसके पास गई लेकिन गलती से मेरा पैर…उफ्फ!! उसके रेत के महल को समतल कर गया। उस ठंडी हवा में भी मेरे माथे पर पसीना चमक उठा। मैं बुत बनी उसे घूरती रही। और वो…वो बिना कुछ बोले मेरे पास से हवा के झोंके की तरह गुजर गया…।
आज फिर मैं बुत बनी उसे गुलमोहर के नीचे खड़े देख रही हूँ। आज फिर वह बिना कुछ कहे हवा के झोंके की तरह गुजर रहा है…
दिमाग कुछ कहे उससे पहले ही मैंने यादों की यह खिड़की भी बन्द कर दी। मन में एक अजीब-सा डर बैठ गया है कि अब ये दिल न जाने कौन सी खिड़की खोलेगा…
ना ना कहते बहुत सारी खिड़कियाँ आज एक साथ खुलती जा रही थीं। पहले सौंधी मिट्टी सी तो फिर समुंदर की रेत सी।
मैंने दिल को कसकर पकड़ लिया था कि कहीं ये फिर किसी रोशनदान से फिसलता हुआ कोई खिड़की का कुंदा न खोल दे। लेकिन आज तो दिल यूँ फिसलता जा रहा था मानो किसी ने पानी की धार पर मोरपंख रख दिया हो।
हाँ, वो आज मोरपंख ही तो लेकर आया था मेरे लिए, रजनीगंधा के फूलों के साथ। नामाकूल! न जाने मेरी पसंद, ना पसंद कहाँ से पता कर ली थी उसने!!
मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था। यकीन हो चला था कि आज तो यह सिर्फ मुझसे ही मिलने आया है तभी तो मेरी पसंद के फूल और…
ओह! दिल किया आज समय यहीं रुक जाए। मैं दौड़कर भीतर गई और ‘सजना है मुझे सजना के लिए…’ गुनगुनाते हुए आईने के सामने खड़ी हो गई।
बड़ा नाज था मुझे अपने चम्पई रंग, घने लंबे बाल और नीली आँखों पर। तभी तो मुझे रजनीगंधा और मोरपंख पसंद थे। ये दोनों ही कितना मिलते थे मेरे वजूद से।
“धत! कुछ भी!” खुद ही खुद पर इठलाती मैं कहीं खो सी गई। मैंने कभी ख्वाब में भी
न सोचा था कि इस मोरपंखी रजनीगंधा को ‘उसके’ जैसा निर्मोही…लड़का भा जाएगा।
मैं आईने में जितना खुद को देखती उतना ज्यादा मुझे ‘वो’ दिखाई देता। मेरा गोरा रंग कब उसके गहरे रंग में घुलकर गेहुंवा हो गया, पता ही न चला। अब तो मेरी नीली आँखें भी अपना रंग छोड़ने लगी थीं, उसकी तरह काली होने की चाह में!
मैं कितनी देर यूँ ही आईने के सामने खड़ी रही। उसे महसूस करती रही। वो कतरा कतरा मुझमें ढलता रहा। मैं कतरा कतरा घटती रही।
वो आया और…और मेरा ‘वजूद’ टेबल पर रखकर चला गया। उसके जाते हुए कदमों की आहट पर मैं चौकी। दौड़कर बाहर आई लेकिन… वह तो जा चुका था! “आखिर क्यों हर बार वो पास आते-आते दूर हो जाता है! क्यों!!” मेरे अंदर कोई चिल्लाया। मैं दरवाजे पर सिर टिका उसे जाते देखती रही। मेरे आँखों के नीलम पिघलते रहे…
और आज…आज फिर वो आया है। खड़ा है गुलमोहर के नीचे। शायद… शायद फिर आकर जाने के लिए…
मैं अभी भी खिड़की की सलाखें पकड़ी खड़ी थी और वो…वो वहीं खड़ा था, गुलमोहर के नीचे।
मैंने गौर से देखा। उसके होंठ और आँखें शरारत से मुस्करा रहे थे। उसके हाथ पीठ पीछे कुछ छुपा रहे थे लेकिन…लेकिन उसकी आँखें बोल रही थीं।
इतनी दूर से भी मैंने उसकी आँखों का लिखा पढ़ लिया था। आज फिर वो मेरे लिए गजरा लेकर आया था। हाँ, वो गजरा ही तो छुपा रहा था पीठ पीछे। वही…मोगरे के फूलों वाला गजरा। मैं उसकी खुशबू से महक उठी और यादों की वह खिड़की भी खुल गई जिस पर मैंने सबसे मजबूत ताला डाला था।
मुझे याद है, उस दिन घर में कोई न था। मैं अपने कमरे में बैठी गुनगुना रही थी। “घर आया मेरा परदेसी…” और…और जैसे उसने मेरी गुनगुनाहट बुन ली।
दरवाजे पर आहट हुई। मैं पलटी। वही था। उसे देखते ही मैं बाती की तरह सुलग उठी। दिल मोम बन पिघलने लगा। लेकिन वो…वो वहीं खड़ा रहा। वैसी ही शरारती मुस्कराहट होठों और आँखों में लिए। हाथ पीठ पीछे कुछ छुपा रहे थे।
मैंने हौले से झुककर देखा। वह थोड़ा पीछे हट गया। मैं थोड़ी और आगे बढ़ी तो वह और पीछे हट गया। मैं और आगे बढ़ी…लेकिन इस बार वो वहीं खड़ा रहा। मैं और आगे बढ़ी। अब मैं ठीक उसके सामने खड़ी थी। उसकी गर्म सांसें मुझे छू रही थीं। उसका सांवला रंग आज कुछ ज्यादा ही गाढ़ा लग रहा था और काली आँखें कुछ ज्यादा ही गहरी।
मैं अपनी सुध-बुध खो बैठी थी। कब मैं उसके रंग में रंगती हुई मीरा हो गई मुझे पता ही न चला। वो बंसी बजाता रहा और मैं…मैं मगन हो गीत गाती रही। मैंने एक पल भी अपनी पलकें न मुंदी। मैं इस पल को जी भर कर जी लेना चाहती थी। न जाने यह पल दोबारा आए न आए!
हमारे शरीर अलग-अलग थे लेकिन रूहें एक हो चुकी थीं। मैं ‘वो’ हो चुकी थी और वो ‘मैं’।
उसने हौले से अपने हाथ में पकड़ा गजरा मेरे बालों में लगाना चाहा ही था कि तभी…
…दरवाजे पर दस्तक हुई। कोई चिल्लाया, “पेशेंट नम्बर 42…चलो हटो अब उस खिड़की से। जब देखो तब उस गुलमोहर को ताकती रहती हो। बिस्तर पर आओ। लाइट बन्द करने का समय हो चुका है। जो आज भी रात भर जगी रही तो कल डॉ. को मजबूरन तुम्हें शॉक ट्रीटमेंट देनी होगी।” एक पल में कमरे में अंधेरा हो गया। शायद बत्ती बन्द कर दी गई थी। मैंने एक बार फिर दूर…गुलमोहर को देखा। इस बार सचमुच वहाँ कोई न था। लेकिन…मेरा कमरा मोगरे की खुशबू से महक रहा था। अनायास ही मेरे हाथ मेरे बालों को छू गए। मेरे होठों पर हँसी खिल उठी। आखिर उसने अपने हाथों में छुपाया गजरा मेरे बालों में लगा ही दिया…
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
