parde ke peeche ka sach
parde ke peeche ka sach

अपार रूप-राशि की धनी, लाल जोड़े में लिपटी, सोलह सिंगार किए रुक्मणि परी-सी लग रही थी। दादी ने दिठौना लगाया तो बुआ ने नून-राई उतारी। द्वारचार के लिए आ रही बारात के साथ बैंड-बाजे की आवाज वातावरण में गूँज रही थी। यह गूँज रुक्मणि उर्फ रुक्मी के हृदय में उल्लास का संचार कर रही थी।

उसी काल बुआ ने उसकी ठुड्डी पकड़कर बलैयाँ लीं और बोली, ‘एकदम राजकुमार-सा लग रहा है, मेरी रुक्मी का होने वाला साजन। दो बेटों का बाप है तो क्या, रूप-रंग की ऐसी छटा बिखर रही है कि कुँआरे को भी मात दे रहा है। किसी की बुरी नजर न लगे, भले घर के पूत रूपदत्त को।’ ‘दो बेटों का बाप’ शब्द रुक्मी के दिल पर चोट कर गये। परन्तु अपने ही तरीके से सहला ली रुक्मी ने यह चोट। खुशी के पलों को चोट के गम में गंवाना गवारा नहीं था उसको। माँ-बाप का साया बचपन में ही उसके सिर से उठ चुका था। कहने को वह दादी-चाची की राजदुलारी थी पर माँ-बाप का सुख अलग ही होता है, यह उसने सुना था और अब वह इसे पहचानने भी लगी थी। वह बुदबुदाकर रह गई, ‘माँ-बाप होते तो आज इस घर के दरवाजे पर दुहाजू की जगह कोई कुँआरा वरमाला पहनाने आता।’

जब शादी की बात चली तो रुक्मी ने विरोध जताया था, ‘दुहाजू वर किसलिए?’ इस पर दादी ने तर्क दिया था, ‘जिसने तेरा पल्लू पकड़ा हुआ है, वही तो आएगा, फिर वह दुहाजू हो या…।’ बड़ों ने और भी प्रश्न खड़े किए थे- ‘लल्ली, कुँआरे वर को दहेज चाहिए, उसका इन्तजाम कहाँ से होगा? तुम्हारा बाप कोई मिल चलती नहीं छोड़कर गया। जानती है, आजकल लड़कों की बोली लग रही है। लोगों ने शादी-ब्याह को बाजार बना रखा है। इस बाजार में अपने घर की हालत तो तुम जानती ही हो।’

इन बातों के चलते रुक्मी की एक नहीं सुनी गई। उसकी डोली ससुराल पहुँच चुकी थी। सबने बढ़-चढ़कर उसका स्वागत किया। कंगन, कुंडल, हार, टिकुला न जाने क्या-क्या उपहारस्वरूप मिला। सोने के जेवरातों से लद गई थी वह। इस सुवर्ण बदरिया बीच बिजली की कौंध भी थी, नाते-रिश्तेदारों के इन शब्दों में, पहले वाली का होगा यह सारा जेवर? इस कौंध का किसने क्या उत्तर दिया, यह जानने की रुक्मी ने जरूरत नहीं समझी। प्यार की सौगात समझकर सहेज लिया था उसने यह सब।

झुरमुट की तरह आस-पास मंडराई महिलाओं ने चुटकी ली, ‘बहू! बड़ी किस्मत वाली हो। देखो न, दो-दो बेटे मिल गए। यह है बड़ा वाला, मुकुल। अपने पापा की तरह गोरा-चिट्टा और गोल-मटोल। छोटा है अनुराग, ठीक अपनी माँ की नकल, बड़ी-बड़ी आँखें, सांवला रंग और सलोना रूप। इन्हें अपनी गोद में बिठाओ और ममता के उजाले से इनका जीवन रोशन कर दो। आज इनकी माँ, उस लोक में, जरूर खुश हो रही होगी कि उसके बेटों की देख-रेख करने वाली आ गई है।’

रुक्मी ने नोट किया कि ‘पहले वाली’ शब्द सबकी जुबान पर राम-नाम की तरह चढ़ा हुआ था। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। कोई हृदयहीन ही होता है जो उन पर स्नेह-फुहार नहीं गिराता। उनकी बाल-सुलभ चंचलता में रुक्मी भी अपनी चंचलता मिला देती। यूँ इन बच्चों को अपनी सगी माँ की धुंधली-सी भी याद नहीं थी। रुक्मी के विवाह को एक साल हो चला तो उनके घर आने-जाने वाले उसकी सास से पूछ बैठते, ‘बहू आस से?’ उत्तर मिलता, अभी तो नहीं। पहले वाली ने तो साल भीतर घर में थाली बजवा दी थी। इन बातों के चलते रुक्मी के मन में अपनी कोख-जायी संतान की माँ बनने की कामना सुगबुगाने लगी। ऐसा नहीं कि वह दोनों बेटों से नेह नहीं रखती हो लेकिन मन उचाट रहने लगा। आँगन में बच्चों की चहक के बावजूद उसे सूनेपन का अहसास होने लगा। काल्पनिक अनुभूति के घोड़े पर सवार होकर कभी वह अपने बच्चे के लिए खिलौने खरीद रही होती, कभी उसे बग्घी में सैर करवा रही होती। कभी-कभी उसे लगता कि उसके स्तनों में दूध उतर आया है और शिशु स्तनपान कर रहा है।

माँ बनने की रुक्मी की इच्छा तेज और तेज होने लगी। एक दिन उसने अपने पति के सामने मन की बात रखी तो वह ठठाकर हँस पड़ा, ‘अरे भई! दो-दो बच्चे ‘माँ, माँ, ’ करते तुम्हारे आगे-पीछे घूमते हैं, फिर तीसरे…?’ यह सुनकर वह बिफर पड़ी, ‘तुम्हारी वंशबेल चलाने वाले मौजूद हैं इसलिए यह सब कह रहे हो। मैं औरत हूँ और माँ का दर्जा हासिल करना मेरा सबसे खूबसूरत ख्वाब है। यूँ भी आज नहीं तो कल समाज मुझ पर बांझ होने का लेबल चिपका देगा।’ स्थिति की गम्भीरता को भाँपते हुए रूपदत्त ने कहा, ‘अरे भई! नगर कोतवाल की तरह तो मत डाँटो। मैं तो यूँ ही विनोद कर रहा था। तुम्हारी भावनाओं को अच्छी तरह समझता हूँ। वैसे अभी कौनसी देर हुई है। फिर भी अगर तुम चाहो तो माँ के साथ जाकर अपना मेडिकल चौकअप करवा सकती हो।’

एक दिन की भी देर किए बिना रुक्मी शहर के जाने-माने क्लीनिक पर जा पहुँची। तरह-तरह के टैस्ट हुए। सबकी रिपोर्ट नार्मल। कहीं कोई कमी नहीं। महंगे से मंहगे टैस्ट भी सब कुछ सही की झंडी दिखा गये। एक डॉ. ने तो यहाँ तक कह दिया, ‘टैस्ट रिपोर्ट्स कहती हैं कि दवा की जरूरत नहीं और मेरा अपना सुझाव है कि दुआ से काम लीजिए।’ इसके बाद रुक्मी प्रतिदिन घंटों पूजा-पाठ करती, व्रत-उपवास रखती, खुले हाथ से दान देती, तीर्थ-स्नान कर आती और तरह-तरह के अनुष्ठान करती। पूजास्थलों में देवप्रतिमाओं के दर्शन कर मन्नत मानी गई। यहाँ तक कि टोने-टोटकों का दामन भी पकड़ बैठी। कभी मन्दिर में माथा टेकती, कभी दरगाह में जियारत कर आती। इस दौरान कभी उसका पाला ढोंगियों से पड़ा तो कभी किसी से सुनने को मिला कि कुंडली में माँ बनने का योग है लेकिन एक बहुत बड़ी अड़चन है। उस अड़चन को दूर करने के लिए रुक्मी लाखों खर्च कर सकती थी परन्तु उपाय तो किसी ने बताया ही नहीं।

रुक्मी के मन पर अवसाद हावी होने लगा। वह करे तो क्या करे। उसे लगता था जैसे वह दलदल में धँसती जा रही थी। जब-तब घर-परिवार वाले कहते, अपने पेट का नहीं है तो क्या पति के बच्चे तो हैं। उनको अपना नहीं मानना बहुत बड़ी तंगदिली है। इन व्यंग्यपूर्ण शब्दों को नजरअंदाज कर कठपुतली-सी नाचती रही वह अपनी इच्छा के इशारों पर। कभी-कभी वह अपने पर झुंझला उठती, क्यों नहीं भूल पाती मैं उस चाह को जो किसी तरह भी पूरी होने में नहीं आ रही। परन्तु इसका असर थोड़ी देर ही रहता। मातृत्व-सुख की कल्पना झिंझोड़ती रहती उसके मन-मस्तिष्क को।

धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि इस सफर में वह अकेली रह गई थी। उसका साथ देने के लिए मन से कोई भी तैयार नहीं था। आरम्भिक दौर में सहानुभूति के स्वर सुनाई देते थे मगर अब वे भी लुप्त हो चले थे। देखते-देखते कई वर्ष बीत गये। रुक्मी ने आस-विश्वास का दामन नहीं छोड़ा। वह स्वयं से सवाल-जवाब करती, उसके घर में देर है, अन्धेर नहीं। धीरज के घूँट पीकर मुझे इंतजार करना होगा। मैंने आँसू बहुत बहाये पर वे मेरी सूनी गोद को कहाँ भर पाये। मन जरूर हलका कर जाते पर समस्या का हल तो नहीं निकाल पाये। ऐसा सोचते-सोचते कब मौन साधिका बन गई वह, यह तो वह स्वयं भी नहीं जानती।

अब रुक्मी न मन्दिर-मस्जिद जाती थी, न पीर बाबा के यहाँ। बस मन ही मन अपनी अरदास दोहराती रहती। उगते सूरज, घनघोर घटाओं व बहते पवन से अपनी बात कह देती इस विश्वास के साथ कि प्रकृति की ये शक्तियाँ कभी न कभी उसको मातृत्व का आशीर्वाद देंगी। आशा की डोर के सहारे दूर-दूर तक उड़ान भर आती वह। एक दिन वह मुग्धभाव से अपने काल्पनिक शिशु को लोरी सुना रही थी तभी रूपदत्त के साथ उसके दोस्त का आना हुआ। रूपदत्त ने परिचय दिया, ‘यह है मेरा दोस्त, डॉ. रत्नेश। हमारी शादी से कुछ समय पहले अमेरिका में सैटल हुआ है। खूब नाम, दाम कमा रहा है वहाँ। डॉ. साहब, यह है मेरी जीवन संगिनी – रुक्मी।’

यह सुनते ही रुक्मी अपने कमरे की ओर दौड़ी। जल-पान की औपचारिकता निभाना भी ध्यान नहीं रहा उसे। अपनी टैस्ट रिपोर्ट्स की फाइल डॉ. रत्नेश के सामने रखकर बोलती चली गई वह, ‘डॉ. साहब, अपने डॉक्टरी ज्ञान के बूते बताइए न क्या कहती है इन रिपोर्ट्स की भाषा?’ रिपोर्ट्स पर सरसरी नजर डालकर रत्नेश ने अर्थपूर्ण ढंग से रूपदत्त के चेहरे पर आँखें गड़ा दीं। रूपदत्त को काटो तो खून नहीं। ठंड के बावजूद उसके माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आईं। बिना एक पल की देरी किए दोनों दोस्त कमरे से बाहर जाने के लिए उठ खड़े हुए।

रुक्मी जान चुकी थी कि उनके मध्य कोई रहस्य था, जिसका खुलासा उसके सामने करना ठीक नहीं समझा गया। विचारों के सागर में गोता लगाने लगी वह- क्या मुझ में कोई ऐसी कमी है जो मुझे माँ नहीं बनने दे रही? क्या परदे के पीछे इतना डरावना सच है, जिसे मैं सहन नहीं कर पाऊँगी। अजब पहेली थी उसके सामने। लेकिन ऐसी कोई बात है तो उसके पति ने आज तक बताई क्यों नहीं। भँवरे की तरह दिन-रात उसके आस-पास मंडराने वाले, उसके हृदय सम्राट कहलाने वाले ने उसे अंधेरे में किसलिए रखा। सम्राट का हृदय तो इतना बड़ा होता है कि प्रजा का दुख-दर्द उसमें समाया होता है। फिर यह कैसा सम्राट, जिसे एक प्राणी का दुख भी विचलित नहीं कर पाया? क्यों नहीं जा सका वह एक बार भी, कतरा-कतरा टूटती अपनी पत्नी के साथ, डॉक्टरी परामर्श के लिए? इस प्रकार के प्रश्नों की जुगाली करते-करते रुक्मी का सिर भन्ना गया था।

और अगले ही पल रुक्मी स्वयं को कोसने लगी, ‘घटिया सोच की दलदल में दिन-दिन क्यों धँसती जा रही हूँ मैं? जिस पति ने मेरे लिए अपनी तिजोरी का मुँह सदा खुला रखा, मेरे कहीं आने-जाने पर कभी रोक-टोक नहीं लगाई, आज उसी देवता जैसे आदमी को अपराधी की तरह कटघरे में खड़ा कर रही हूँ? भगवान मुझे माफ नहीं करेगा। अब, आज और इसी समय अपनी उस इच्छा का गला घोट देती हूँ, जिसने इतने सालों से हमारी जिंदगी में जहर घोला हुआ है। आज से मेरी नई जिंदगी की नई शुरूआत होगी। मेरे दाता, बहुत सारी ताकत देन, नई मंजिल की ऊँचाइयाँ छूने की।’

बहुत चहकने के बाद यकायक खामोश हो जाने वाले परिंदे की भांति अति खामोश हो गई रुक्मी। अब वह कुदरत की इच्छा के आगे नतमस्तक होकर जीना चाहती थी। संध्या हुई तो रत्नेश व रूपदत्त ने घर में प्रवेश किया। रत्नेश ने सफाई दी- ‘भाभी! आप जानती हैं, कोहरे को छँटने में समय लगता है। और कोहरा छँटने के बाद बाकी बचे दिन को गरमाइश का तोहफा मिलता है। इस तोहफे से राहत महसूस की जाती है, जिससे जिंदगी रफ्तार पकड़ती है। आज समय आ गया है, आपकी गृहस्थ जिंदगी से रहस्य का कोहरा हटाए जाने का। रहस्य भी ऐसा, जिसे केवल मैं और मेरा दोस्त जानते हैं। अफसोस! आज तक मेरा दोस्त इसको उजागर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। इसके लिए तुम उसे मनमानी सजा दे सकती हो।’

बोलते-बोलते डॉ. रत्नेश के होंठ काँपने लगे, वहीं रुक्मी का दिल डूबता-सा महसूस कर रहा था मानो मस्तिष्क की कोशिकाएँ एक साथ धधकने लगीं थीं। अन्तत: डॉ. ने कहा, ‘असल में, मेरा यह दोस्त छोटे परिवार में विश्वास रखता है इसलिए अनुराग के जन्म के बाद इसने नसबंदी…।’

रुक्मी स्वयं पर काबू नहीं रख सकी। वह संज्ञाशून्य होकर धड़ाम से जमीन पर जा गिरी। होश आया तो वह पहले वाली रुक्मी नहीं थी। मुकुल और अनुराग बार-बार कह रहे थे, ‘पापा, डॉ. अंकल से कह दो कि हमारी मम्मा को ठीक कर दें। देखो तो, कैसी बहकी-बहकी बातें करती हैं। न टाइम पर नहाना-धोना, न खाना-पीना, न…। हमसे उनकी यह हालत देखी नहीं जाती।’

रूपदत्त बुदबुदा रहा था, ‘काश! परदे के पीछे का सच बातों-बातों में पहले बता दिया होता। बेचारी रुक्मी खुद को ही सजा दे बैठी। मैं इसकी भावनाओं से खुलकर खिलवाड़ करता रहा। इसके हर टोटके पर तमाशबीन बनकर तालियाँ बजाता रहा। कितना निर्मम निकला मैं। यही निर्ममता एक दिन मेरी गृहस्थी को तबाह कर डालेगी। नहीं-नहीं… मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। मुझे रुक्मी का इलाज करवाना होगा। आखिर वह मेरी अर्धांगिनी है। रुक्मी का दोष भी क्या था। ‘पूरी औरत’ बनने की चाह में उसने एक सुंदर सपना देखा था और मैंने उसके सपने का भी हिसाब माँग लिया। बहुत बुज़दिल और स्वार्थी हूँ मैं।’ भावावेश में रूपदत्त ने रुक्मी के पैर पकड़ लिए। सामान्यावस्था में, रुक्मी उन हाथों को अपने सिर पर रख लेती और गुहार करती, ‘मेरे नाथ! मुझे इतना सिर न चढ़ाओ। मैं ठहरी एक साधारण-सी औरत।’ मगर आज विक्षिप्तावस्था में वह नहीं जानती पैर पकड़ने के मायने। निर्विकार भाव से रूपदत्त की ओर देखती रही वह। उसके सामने एक ऐसा जाल बुनकर फैला दिया था, जिससे आज तक उसका सरल, निष्कपट हृदय कभी नहीं टकराया था। रुक्मी कभी रोती है, कभी हँसती है और कभी गाती है- जोगन चल गंगा के तीर। बहा दे पावन जल में पीर।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’