imandari ka phal
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

मेघालय और बांग्लादेश की सीमा से लगे एक गाँव में दो मित्र थे। जिनका नाम बान्सान और डामे था। दोनों किसान परिवार के थे। उनकी माली हालत ठीक नहीं थी परन्तु उन्हें पढ़ने में बहुत रुचि थी। उनके गाँव में केवल प्राथमिक शिक्षा तक की सुविधा थी। पाँचवी कक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे दोनों शिलांग में आ गए। शिलांग में वे अपने एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ एक छोटा-सा कमरा किराए पर लेकर रहते थे। बान्सान और डामे दोनों ही गरीब परिवार से थे। वे दिन को स्कूल में पढ़ाई करते थे और शाम को अपने घर मालिक के यहाँ कुछ काम करते, जिससे उनको कुछ पैसे मिल जाते थे। इस तरह उनका खर्च किसी तरह चल जाता था।

हमेशा की तरह दोनों मित्र अपने विद्यालय गए। उस दिन आठवीं की कक्षा में कुछ मरम्मत का काम चल रहा था इसलिए बान्सान और डामे की कक्षाएँ आधे दिन की ही हो पायी। दोनों मित्रों ने सोचा कि क्यों न वे पुलिस बाजार जाकर वहाँ से कुछ खा-पीकर अपने घर चले जाएँ। दोनों रोज पुलिस बाजार से होकर विद्यालय जाते थे लेकिन उनके पास इतना समय नहीं था कि वे पुलिस बाजार आराम से घूम सके। उनके लिए आधे दिन की छुट्टी में पुलिस घूमने का यह सुनहरा अवसर था इसलिए दोनों पुलिस बाजार चल पड़े।

पुलिस बाजार शिलांग का सुप्रसिद्ध बाजार है, जहाँ पूर्वोत्तर के अलावा भारत के कोने-कोने से लोग यहाँ बाजार करने आते हैं। शिलांग पर्यटकों के लिए आकर्षण का स्थान है। यहाँ देश-विदेश से पर्यटक अपनी-अपनी खरीददारी व मनोरंजन के लिए टहलते दिखाई देते हैं। होली का त्योहार कुछ ही दिनों में आने वाला था इसलिए बाजार में काफी भीड़ लगी हुई थी। बाजार के चारों तरफ होली के रंगों की दुकान खचाखच लोगों से भरी हुई थीं। सब लोग अपनी-अपनी जरूरतों की चीजों की खरीददारी कर रहे थे। बच्चे अपनी माँ से खिलौने की जिद्द कर रहे थे। जूस के स्टॉल पर कुछ लड़कों का समूह दिखाई दे रहा था। लड़कियों ने पानीपूरी और आलूचाट वाले भैया के स्टॉल को घेर रखा था।

उस भीड़ में एक महिला अपने-आप को बचाती हुई बढ़ रही थी। उस महिला के दोनों हाथों में सामान से भरी थैलियाँ थीं। महिला भीड़ के धक्के खाती हुई कभी आगे तो कभी पीछे, कभी दाएँ तो कभी बाएँ मुड़ती हुई आगे बढ़ रही थी। उस महिला के कंधे पर एक छोटा बैग लटका था, जो आगे-पीछे झूल रहा था। अचानक डामे ने देखा कि उस महिला के बैग से कुछ गिरा। डामे तुरंत भीड़ में घुसा और उस चीज को उठा लिया। उठाते ही वह तुरंत भीड़ से बाहर निकला और देखा तो वह दो हजार रुपये का नोट था। डामे बहुत ही खुश हुआ। उसका मुख मण्डल इस प्रकार प्रफुल्लित हुआ मानो उसे कोई बड़ा खजाना मिल गया हो। इतना बड़ा नोट देखकर डामे का हृदय खुशी एवं भय से भर गया परंतु उसको पैसे उठाते किसी ने नहीं देखा था, इस बात का उसे पूरा विश्वास था।

खुशी भय पर हावी होने लगी। उसके दिमाग में वह सारी चीजें नाचने लगी थी जो पैसे न होने के कारण हासिल नहीं कर पाया था। वह सपनों में खो गया। सपने में डामे फुटबाल के मैदान में खड़े बॉल हाथ में लिए अपने दोस्तों को अपने समूह में शामिल कर रहा था। फुटबाल मैच के सारे नियम डामे के हिसाब से चल रहे थे। वह लाल रंग का ट्रक जो आइराइ के पिताजी ने ला कर अपने बेटे को दिया था, डामे के पास उससे भी बड़ा ट्रक आ चुका था। डामे अपने दोस्तों के बीच से ट्रक चला रहा था और मुँह से ट्रक की आवाज निकालकर ट्रक चला रहा था।

इतना ही नहीं डामे को एक बार अपने घर मालिक के यहाँ स्वादिष्ट चाव खाने का मौका मिला था। जिसके बारे में सोचकर उसके मुँह से आप ही पानी टपकने लगा था। आईसक्रीम, फुटबाल, चॉकलेट, खिलौने आदि की कल्पना मात्र से डामे का हृदय हर्षित हो रहा था। “डामे! डामे! इतनी देर से क्या सोच रहे हो?” बान्सान ने आवाज लगाई। आवाज सुनकर डामे ने बान्सान को पैसा दिखाकर आईसक्रीम खाने के लिए कहा। डामे के पास इतना पैसा देख कर बान्सान चौंक गया। उसने डामे से पूछा- तुम्हारे पास इतना पैसा कहाँ से आया?

डामे ने सारी बातें बताई। पूरी बात जानकर बान्सान डामे को समझाने लगा कि उसे दूसरों का गिरा हुआ पैसा नहीं लेना चाहिए बल्कि उसे तुरंत लौटाना चाहिए। परंतु डामे बान्सान की बात मानने से इनकार कर रहा था। उसके दिमाग में उसकी मनपसंद वस्तुएँ अभी भी हावी हो रही थी। डामे बाजार की तरह-तरह की वस्तुओं को दिखाकर बान्सान को मनाने का प्रयास करने लगा। उसने बान्सान से कहा- याद है बान्सन, एक दिन तुमने कहा था कि तुम्हें भी चाव बहुत पसंद है। चलो खाते हैं। तुम कहते थे न कि जब गाँव जाओगे तो घर में अपने भाई बहनों के लिए सेब और अंगूर लेकर जाओगे। चलो न, आज इसी पैसे से वह सारी वस्तुएँ खरीदते हैं और खूब मजे करते हैं।

बान्सान को वे सारी बातें याद आने लगी और उसका मन भी ललचाया। कुछ देर चुप रहकर बान्सान फिर से डामे को समझाते हुए बोला- मुझे सब याद है डामे, लेकिन हमें किसी और के पैसे से अपनी पसंद की वस्तुएँ नहीं पाना है। और हम दोनों को खूब पढ़ना है, बहुत मेहनत करनी है और बहत आगे जाना है। हम अपनी मेहनत के पैसे से वे सब कुछ खरीदेंगे, जो हमें पसंद हैं। अगर तेरा भी पैसा भीड़ में इस तरह गिरता और कोई उसे उठा लेता तो तुम्हें बुरा लगेगा न? तुम्हें पैसा उठाते हुए किसी ने नहीं देखा हो परंतु ऊपर से भगवान तो तुमको देख ही रहा है। भगवान तेरी इस हरकत पर बहुत दुखी होंगे। बान्सान की बातें सुनकर डामे को अपनी गलती का एहसास हो गया। वे दोनों तुरंत उस महिला की खोजने लगे। महिला भीड़ में ही फँसी दोनों थैला उठाकर धक्का खाते-खाते आगे बढ़ रही थी। डामे ने महिला के पास जाकर उनसे क्षमा माँगते हुए उनका पैसा वापस कर दिया। महिला दोनों बालकों की ईमानदारी पर बहुत खुश हुई और उसने बख्शीश के तौर पर एक सौ रुपया दिया। दोनों मित्र खुश होकर पैसे लेकर आईसक्रीम खाने चल पड़े।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’