भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
एक दिन चांद अपनी ड्यूटी पर निकला तो बड़ा प्रसन्न था। उसने नीचे धरती पर झांक कर देखा-लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहने पूर्णिमा के मेले में जा रहे थे। बच्चों के रंग-बिरंगे झालरदार कपड़ों को देखकर उसका मन भी कपड़े पहनने को मचल उठा। वह सब काम छोड़ सीधा ‘अम्बर दर्जी’ की दुकान पर पहुंचा।
अम्बर मियां दुकान बन्द करने की तैयारी में थे, बोले- ‘‘देखो बेटे, अब तो दुकान बढ़ाने का समय है। तुम कल आना।’’
‘‘चाचा, तुम मेरा नाप तो ले लो।’’
‘‘कपड़ा लाए हो?’’ दर्जी ने चश्मे में से आंखें तरेरकर कहा।
‘‘कपड़ा…..अभी ले आता हूं।’’ कहकर चांद कपड़ा लेने घर की ओर भागा तो पीछे से अम्बर मियां ने ऊंची आवाज में कहा- ‘‘अब तो कल ही आना चांद बेटा!’’
दूसरे दिन चांद बादलों का एक थान लेकर दर्जी के पास पहुंचा। दर्जी ने उसका नाप लेकर कापी में लिख लिया।
‘‘कब दोगे सिलकर चाचा?’’
‘‘अभी नाप तो पूरा लिखा नहीं और ‘कब दोगे’ पूछने लगा। आठ दिन लगेंगे।’’
‘‘आठ दिन!’’ रोनी सूरत बना चांद ने कहा–‘‘जल्दी दे देना चाचा।’’
‘‘अच्छा सात दिन में सिल दूंगा।’’
सात दिन बाद अम्बर मियां की दुकान पर चांद खड़ा था, पर अम्बर मियां गायब थे। खैर, थोड़ी देर में बीड़ी फूंकते अम्बर मियां आए। चांद ने पूछा- ‘‘मेरे कपड़े सिल गए?’’
‘‘अमां चांद, इत्ती जल्दी कहीं कपड़े सिलते हैं? आखिर काटूंगा, सीऊंगा, काज करूंगा, बटन लगाऊंगा….’’
‘‘अच्छा-अच्छा! फिर दोगे कब, यह बताओ।’’ चांद ने बीच में टोकते हुए कहा।
‘‘परसों ले जाना।’’
चांद दो दिन के लिए धीरज धर घर आ गया।
तीसरे दिन सुबह-सुबह चांद अम्बर मियां की दुकान पर पहुंचा और अपने कपड़े मांगे। बूढ़े दर्जी ने नाप की कापी सब जगह ढूंढी, पर नहीं मिली। साथ ही अपने नाती-पोतियों पर गुस्सा भी उतारा- ‘‘न जाने कहां-कहां रख देते हैं मेरी चीजें, ये बच्चे।’’
‘‘पर चाचा, मैं कपड़े लेने आया हूं, कापी नहीं।’’ चांद ने कहा।
‘‘हां-हां बेटा, मुझे पता है। पर नाप के बिना कपड़े कैसे सिलता। कापी नहीं मिल रही।
‘‘तुम मेरा दूसरा नाप ले लो चाचा, कपड़े जल्दी सिल दो।’’ चांद ने क्रोध करते हुए कहा।
अम्बर मियां को एक बहाना और मिला। उन्होंने चांद का दूसरा नाप ले लिया। तीसरे दिन भी यह कहकर ले लिया कि उस दिन मैं तुम्हारा गला नापना तो भूल ही गया था। इस सब झंझट में बारह दिन बीत गए। चांद काफी दुबला भी हो गया।
बारह दिन में अधीर होकर चांद सुबह-सुबह अम्बर मियां की दुकान पर जा बैठा। थोड़ी देर में अम्बर मियां सब्जी का भारी थैला लिए आए और दुकान के चौतरे पर रखकर सुस्ताने लगे।
नमस्ते करने के तुरन्त बाद अधीर चांद ने दर्जी से कपड़े मांगे।
‘‘बेटा चांद, तुम तो बड़े बेसब्र हो रहे हो। अभी देखता हूं कपड़े सिले या नहीं।’’
‘‘सिले या नहीं, क्या मतलब? मैंने तीन तारीख को कपड़े दिए थे, आज पन्द्रह हो रही है।’’ चांद क्रोध में आ गया।
‘‘बेटा, क्यों खामखाह गुस्सा करते हो सुबह-सुबह। तारीख़-वारीख मैं नहीं जानता, पुराना आदमी हूं, तिथि बताओ।’’
‘‘तिथि…..हां उस दिन पूर्णिमा थी। लोग मेले में जा रहे थे।’’
‘‘हां तो आज बारह ही हुई है। कौन देर हुई।’’ दर्जी ने फिर चांद को टरकाना चाहा।
चांद अड़ गया- ‘‘कपड़े लेकर ही जाऊंगा।’’
अम्बर मियां ने जैसे-तैसे एक घंटे में कमीज तैयार करके चांद को थमाई- ‘‘लो, पहनकर देखो।’’
चांद ने पहनी तो वह कमीज क्या, एक बड़ा ढीला-ढाला चोगा था, जो गले से पैर तक लटक रहा था। चांद क्रोध से लाल हो गया। उसने कमीज उतारी और फाड़कर चिंदी-चिंदी बिखेर दी। सारे आकाश में वे चिंदियां बादलों के रूप में उड़ने लगीं। अम्बर मियां ने बहुत समझाया- ‘‘चांद, तुम तेरे दिनों में बहुत दुबले हो गए हो। भला इसमें मेरा क्या कसूर है? पूनम को तुमने कपड़ा दिया था और आज बारह है।’’
‘‘सिलने में तुमने देर लगाई है, चाचा। मुझसे क्या कहते हो बारह हो गई और तेरह हो गई।’’ कहकर चांद क्रोध में बचे कपड़े की भी चिंदियां फाड़ने लगा। अम्बर मियां ने लपककर कपड़ा छीन लिया- ‘‘बेटा, इतना गुस्सा ठीक नहीं। सब्र करो, मैं दूसरी कमीज सिल दूंगा।’’
नया नाप देकर चांद घर चला गया। दो दिन बाद अमावस होने के कारण रातें अंधेरी थीं। अम्बर मियां रात में बाहर नहीं निकले। घर में बैठे कपड़े सिलते रहे। दूसरे ही दिन चांद की कमीज सिलकर दुकान में लटका दी। चांद को दर्जी के यहां चक्कर लगाने का पहला अनुभव याद था ही। वह सीधे पन्द्रह दिनों बाद दर्जी के यहां पहुंचा। अम्बर मियां ने जल्दी से सिली रखी कमीज चांद के सामने रख दी। पर यह क्या? कमीज तो चांद के सिर में भी नहीं फंस रही। पूरी बाजू आधी भी नहीं आ रही। चांद फिर क्रोध में पागल हो गया। कमीज के टुकड़े-टुकड़े करके बिखेर दिए। वे आकाश में बादल बन तैरने लगे। बच्चे उन्हें देख उछल-उछलकर खेलने लगे- ‘काले-नीले बद्दर आए, मोटा धान चबेना लाए।’ चांद चिढ़ गया और बादलों में जा छिपा।
अम्बर मियां ढूंढते-ढूंढते चांद के पास पहुंचे। बहुत समझाते हुए बोले- ‘‘बेटा, तुम्हारा शरीर अब मोटा हो गया है, पूर्णिमा आ रही है न! मैं भी बूढ़ा हो गया हूं। बड़ी देर में अक्ल आई। भगवान ने तुम्हें बनाया ही ऐसा है कि तुम पन्द्रह दिन घटते रहते हो और पन्द्रह दिन बढ़ते रहते हो। वैसे तो बेटा, हर व्यक्ति मोटा-दुबला होता रहता है, पर तुम में तो यह गुण-दोष बहुत अधिक है।’’
अम्बर मियां ने चांद के पन्द्रह नाप लिए और बचे कपड़े की पन्द्रह छोटी-बड़ी पोशाकें बना दीं।
अब चांद नित्य अपने नाप की एक पोशाक पहनकर आता है और बच्चों को गर्व से अंगूठा दिखाता है। जब कभी बच्चे चिढ़ाते हैं तो अपनी ही फाड़ी चिंदी से बने बादलों में मुंह छिपा लेता है।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
