रुद्राभिषेक, एक ऐसी पूजा, जिसका आयोजन अक्सर घरों में किया जा रहा है ताकि अपनी मानोकामना पूरी की जा सकें। ताकि हर तरफ खुशहाली हो, पूरी दुनिया धन-धान्य से भरपूर हो। मगर इस पूजा से जुड़े कई रोचक तथ्य भी हैं। ये कोई साधारण पूजा बिलकुल नहीं है, बल्कि भोलेनाथ को खुश करने की गारंटी देता आयोजन है। इसमें कई घंटों के तप के बाद भक्ति की शक्ति दिख पाती है। ये पूजा अंदाजन 3 घंटे चलती है और आसान नहीं होती है। रुद्राभिषेक क्यों होता है खास, आइए जानें इससे जुड़े तथ्य-

स्नान से है नाता-
अभिषेक का मतलब होता है स्नान। चूंकि ये रुद्राभिषेक है तो इसको शिव जी के स्नान से जोड़ा जाता है। इसमें मंत्रों के बीच शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।
अलग स्नान-अलग फायदे-
रुद्राभिषेक के दौरान अलग-अलग चीजों से किए गए अभिषेक के अलग-अलग परिणामों को माना गया है। इनको पहचान लीजिए-
- दूध में चीनी मिलकर किए गए अभिषेक से विद्वान होते हैं
- घी से अभिषेक वंश बढ़ाने का आशीर्वाद देता है तो शक्कर मिले जल से अभिषेक करने से संतान की कामना पूरी होती है।
- गाय का दूध जब अभिषेक में इस्तेमाल होता है तो इंसान आरोग्य होता है।
- पुरानी बीमारियों से बचने के लिए शहद से अभिषेक किया जाता है।
- मुक्ति और मोक्ष की कामना के लिए भस्म से अभिषेक किया जाता है।

रुद्राभिषेक की अहमियत-
धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव का रुद्र रूप दुखों को जल्द हर लेता है। भगवान शिव तब हमें हमारी उन गलतियों के लिए भी माफ कर देते हैं जिनके परिणामस्वरूप हमें ये दुख मिले हैं। भक्तों को याद रखना होता है कि प्रकृति के खिलाफ उठाए हर कदम को गलती ही माना जाता है।
इसलिए किया जाता है रुद्राभिषेक-
रुद्राभिषेक का आरंभ ब्रह्मा जी और विष्णु जी की लड़ाई के बाद हुआ था। माना जाता है कि भगवान विष्णु की नाभि से कमल का फूल उत्पन्न हुआ। खुद ब्रह्मा जी ने इसका कारण पूछा तो उन्होने कारण तो बताया साथ में ये भी बताया कि उनके कारण ही ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए हैं। बस इसके बाद दोनों के बीच लड़ाई होने लगी। इस लड़ाई से शिव जी इतने नाराज हुए कि रुद्र लिंग रूप ले लिया। मगर भगवान की महिमा देखिए कि ब्रह्मा और विष्णु दोनों को ही इस लिंग की न शुरुआत मिले और न ही अंत। फिर दोनों ने इस लिंग का अभिषेक किया और रुद्राभिषेक की प्रथा शुरू हुई।
शिवलिंग का भी हो ध्यान-
रुद्राभिषेक किस शिवलिंग का करें इसको लेकर भी कुछ मान्यताएं हैं-
- रुद्राभिषेक का सबसे ज्यादा फल नदी तट या पर्वतों पर करने पर मिलता है।
- मंदिर और घर पर करना भी उत्तम होता है।
- शिवलिंग न मिले तो अंगूठे को भी शिवलिंग मानकर पूजा की जा सकती है।
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