sarp maran yagy - mahabharat story
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परीक्षित की मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र जनमेजय का राज्याभिषेक किया गया। कुछ समय बाद उनका विवाह काशी के राजा सुवर्णवर्माक्ष की कन्या वपुष्टमा के साथ कर दिया गया। जनमेजय एक कुशल, धर्मात्मा और सत्यवादी राजा थे।

एक बार जनमेजय के राजदरबार में उतंक नामक ऋषि पधारे। जनमेजय ने उनका उचित आदर-सत्कार किया और आगमन का प्रयोजन पूछा। उतंक ऋषि बोले-“राजन! तक्षक अत्यंत दुष्ट और विषैला नाग है। आपके पिता की मृत्यु भी उसी के डसने से हुई थी। मुझे भी एक बार उसने भयंकर कष्ट पहुंचाया था। अतः आप तक्षक से अपने पिता की मृत्यु और मेरे अपमान का बदला लें। यही राजधर्म है।”

जनमेजय ने उनसे पूछा-“यह किस प्रकार संभव है? मुझे क्या करना चाहिए, जिससे मैं तक्षक नाग को दंड दे सकूं?”

तब ऋषि उतंक ने उन्हें सर्प मरण यज्ञ कराने का सुझाव दिया। जनमेजय ने उसी समय अपने मंत्रियों को बुलाया और उन्हें सर्प मरण यज्ञ की तैयारी करने का आदेश देते हुए कहा- “मंत्रीवरो! गंगा-तट पर सुंदर यज्ञ -मंडप का निर्माण किया जाए। इस यज्ञ में तक्षक यज्ञ-पशु बनेगा और ऋषि उतंक इसके पुरोहित होंगे।”

मंत्रियों ने शीघ्र ही यज्ञ की तैयारियां आरंभ कर दीं। उचित मुहूर्त पर यज्ञ आरंभ हुआ। सर्पों की आहुति दी जाने लगी। इधर तक्षक नाग को जनमेजय के यज्ञ की बात ज्ञात हुई तो वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए आस्तीक मुनि की शरण में चला गया। निश्चित समय आने पर ऋषि उतंक तक्षक नाग का आह्वान करने लगे। इससे वह भयभीत होकर आस्तीक मुनि से रक्षा की प्रार्थना करने लगा।

तब आस्तीक मुनि स्वयं राजा जनमेजय की यज्ञ-वेदी पर पहुंचे। उन्हें वहां देखकर जनमेजय अति प्रसन्न हुए। उन्होंने आस्तीक मुनि का स्वागत करते हुए उन्हें इच्छित वस्तु प्रदान करने की इच्छा प्रकट की। आस्तीक मुनि बोले-“राजन! यदि आप मुझे इच्छित वस्तु देना ही चाहते हैं तो मेरी यह इच्छा है कि आप इस पापयुक्त यज्ञ को तुरंत रोक दें। इस यज्ञ में आप असंख्य निर्दोष सर्पों की आहुति दे चुके हैं। अब कृपया इस कृत्य को बंद कर दें।”

आस्तीक मुनि की इच्छा जानकर जनमेजय ने सर्प-यज्ञ बंद करवा दिया।

इस प्रकार आस्तीक मुनि ने सर्पों की प्राण-रक्षा की।