६४ गृहलक्ष्मी फरवरी २०१६
हमारी पौराणिक संस्कृति में सेक्स को कामदेव की संज्ञा देकर देवताओं की श्रेणी में रखा गया। क्योंकि देव संस्कृति के प्रवर्तक हमारे ऋषि-मुनि जानते थे कि सृष्टि के विकास तथा परिवार व्यवस्था पर आधारित स्वार्थरहित समाज की स्थापना के लिए स्त्री-पुरुष नामक दो विपरीत ध्रुवों का बंधन आवश्यक है। बंधन के लिए एक अविरल आकर्षण अनिवार्य है जिसकी उद्भव स्थली है- मनुष्य के मूलभाव के रूप में स्थित काम-भावना।
मनुष्य की काम-संबंधी आवश्यकताओं की मर्यादित तथा संतुलित पूर्ति तथा उसे समाजोपयोगी बनाने के लिए ही विवाह जैसी पुनीत संस्था का आविष्कार हुआ। काम-भाव के माध्यम से परस्पर प्रेमाकर्षण में बंधे स्त्री-पुरुष जीवन के ललित सुखों का भोग करते हुए पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह करते और अपनी आर्थिक- सामाजिक उन्नति का माध्यम बनते हैं। कालांतर में मनुष्य को भोग-विलास का रोग लगा, व्यवस्था बिगड़ी और वैषम्य का विष व्याप्त होने लगा। विलास ने मनुष्य का विवेक छीना तो हवस हावी होने लगी। हर सबल व्यक्ति निर्बल पर अधिकार जताकर अपने अहंकार को तुष्ट करने लगा और अपने लिए अधिकाधिक भोग की व्यवस्था करने में जुट गया। यहीं से जन्म हुआ स्त्री-पुरुष में भेद-भाव। क्योंकि पुरुष स्त्री से शारीरिक रूप से अधिक सुदृढ़ तथा सशक्त था, उसने स्त्री को अपनी संगिनी के पद से हटाकर अधिकृत भोग्या बना दिया। अधिकाधिक भोग करने की प्रवृत्ति ने जन्म दिया बहुपत्नी प्रथा को जो विकृत होती गई और धीरे-धीरे समाज का एक रोग बन गई।

काम-वासना
काम का उदात्ततम रूप प्रेम है और विकृततम रूप है वासना। इसीलिए जो काम-भाव स्त्री-पुरुष समानता के युग में सुखी दाम्पत्य की आधारशिला था वही वैषम्य के इस युग में पारिवारिक कलह तथा द्वेष का कारण बन गया। बहुपत्नी प्रथा के कारण दाम्पत्य जीवन स्त्री के लिए अनंत यातना का माध्यम बना तो इस यातना से बचने के लिए उनमें परस्पर क्लेश, सौतिया डाह और षड्तंत्रों जैसी कुरूपताओं का भी विकास हुआ। दूसरी ओर पुरुषों में संवेदनहीन विलासिता तथा अधिकाधिक भोग से उनके शारीरिक एवं मानसिक ह्रास का आरंभ हो गया। विद्वत्जन जानते थे कि सुखी समाज की धुरी सुखी परिवार है इसलिए परिवार की ये दुर्दशा देखकर हैरान तथा परेशान हो गए। कदाचित इसीलिए एक युग ऐसा आया कि काम-भाव को घृणित अथवा त्याज्य रूप में देखा जाने लगा। इसके विचार तक का निषेध आदर्श समझा जाने लगा। किंतु प्रकृति का नियम है कि जिस भी प्राकृतिक भाव या बहाव का जितना बलपूर्वक निषेध अथवा दमन किया जाता है वो उतनी ही तीव्रता से प्रतिक्रिया स्वरूप बढऩे का प्रयत्न करती है और इस प्रयत्न में उसके विकृत अथवा विनाशकारी रूप का ही विकास होता है। काम-भाव के साथ भी यही हुआ।
जब समाज अपनी अधोगति की ओर बढ़ा तो उसको पतन से बचाने के लिए संवेदनशील, समर्थ बुद्धिजीवियों का भी प्रादुर्भाव हुआ जिन्हें उनके गुणों के कारण कालांतर में ईश्वर की उपमा दी गई। राम और कृष्ण ऐसी ही शक्तियां थे।
स्त्री शोषण और बहुपत्नी प्रथा
दूषित मानसिकता के विनाश तथा प्राणिमात्र के सुखी जीवन के प्रादुर्भाव के लक्ष्य को समर्पित इन शक्तियों के सम्मुख स्त्री शोषण का ये रूप भी एक चुनौती बनकर खड़ा हुआ। वे जानते थे कि दमन मनोविकृतियों का निर्माण करता है और अतिशय संतुष्टि शोषण का मार्ग उन्मुख करती है। फिर मानव मन के इस मूलभाव का क्या किया जाए? उत्तर मिला संतुलन और रूप परिवर्तन! राम ने काम के वशीभूत होकर बनाई गई बहुपत्नी प्रथा का एकपत्नी व्रत धारण कर विरोध किया और समाज को काम की संतुलित पूर्ति का संदेश दिया। काम जब संवेदना से सज्जित, भावना मिश्रित होकर एक व्यक्ति में समर्पित हो जाता है तो ‘प्रेम’ जैसे उदात्त भाव का निर्माण होता है। जब वासना और अहंकार का सम्मिश्रण अनेक व्यक्तियों में बंट जाता है तो मार्ग खुलता है भोग का, जो शोषण का साधन बन जाता है।
‘स्व’ का विस्तार
कृष्ण जैसी युग प्रवर्तक शक्ति ने भी इस मनोवैज्ञानिक सत्य को पहचाना और काम के उदात्त रूप ‘प्रेम से जगत का परिचय करवाने का प्रयत्न किया। उसे प्रेम में परिवर्तित कर देने से ये भाव भोग के बजाए समर्पण सीखता है। ‘स्व का विस्तार सीखता है। इसे कलाओं के रूप में परिवर्तित करके मनुष्य न केवल आंशिक संतुष्टि पाता है, बल्कि समाज के विकास में सहभागी भी बनता है। अभुक्त काम वासना में परिवर्तित न होकर उसकी परिणति ललित कलाओं में हो, इसी का प्रयत्न श्रीकृष्ण की बांसुरी और रास-लीला नामक नृत्यों में दिखाई पड़ता है। जिसमें कृष्ण के प्रति आकर्षित हर युवती उनके साथ नृत्य करके काम-भावना की मर्यादित पूर्ति कर सकती थी। शिव-पार्वती ने भी गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से काम-भाव की संतुष्टि का मार्ग प्रशस्त करने में अपना योगदान दिया। इस प्रकार कृष्ण और शिव ने अपने मनोवैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग कर इसे ललित-कलाओं के रूप में संशोधित कर इसे मर्यादित रूप में बांधने का प्रयत्न किया।
कुंठाओं का मूल
पाश्चात्य चिंतक फ्रायड ने काम के अप्राकृतिक दमन को समस्त कुंठाओं का मूल उत्स बताया। फ्रायड, एडलर, युंग आदि आधुनिक युग के मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा कुछ सत्य उद्घाटित किए जो कालांतर में सभी मनश्चिकित्सकों द्वारा मान्य हो गए। बचपन में मां द्वारा बेटे को तथा पिता द्वारा बेटी को दिया गया वात्सल्य पूर्ण आलिंगन, चुंबन तथा लाड़-दुलार उन्हें जो काम संबधी तुष्टि प्रदान करता है उससे उसके व्यक्तित्व के विकास पर सकारात्मक असर पड़ता है। किशोरावस्था में विपरीत लिंग के साथ स्वस्थ मैत्री से और अपनी प्रतिभाओं तथा कलाओं की प्रशंसा विपरीत लिंग से सुनने से किशोरों की ‘रोमांटिक आकांक्षाएं संतुष्ट हो जाती हैं। इस प्रकार संतुष्ट बचपन तथा कैशोर्य के अभुक्त काम को संतुष्ट करने के प्रयत्न में अमर्यादित कदम उठाने की आशंका कम हो जाती है।
आज वैदिक संस्कृति के वैज्ञानिक विश्लेषण और पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों के चिंतन ज्ञान के कारण सेक्स अथवा काम की दिशा में लोगों की मानसिकता बदली है और इस दिशा में काफी खुलापन आ रहा है जो आधुनिकता तथा स्वस्थ समाज की स्थापना का उद्घोष है। आज लोग समझने लगे हैं कि वस्तुत: दमन और उपेक्षा दोनों ही मानव मन में रहने वाले भाव को विकृति में बदलते हैं इसीलिए हमारे समाज में काम का जो विकृत रूप दिखाई दे रहा है वो युगों से चले आ रहे दमन और उपेक्षा से बनी मनोग्रंथियों का परिणाम है।
सेक्स में खुलापन
आज सेक्स में आ रहा खुलापन सही अर्थों में शिक्षित समाज द्वारा समस्या स्वीकार कर समाधान खोजने का प्रयत्न है। समाज की काम से जुड़ी समस्याओं के समाधान लिए स्वीकार किया गया कि काम मूलत: प्राणीमात्र के मन में स्थाई रूप से रहने वाले भावों में से एक है जिसे जीवन की मूलभूत आवश्यकता भी कहा जा सकता है। ये भी समझा गया कि मनुष्य पशु से श्रेष्ठ है, वो अपनी भावनाओं पर समाज द्वारा निर्धारित मर्यादाओं के अनुसार नियंत्रण कर सकता है। शिक्षित समाज काम की अतिशय संतुष्टि द्वारा व्यक्तित्व और स्वास्थ्य का ह्रास या दमन द्वारा विकृति नहीं चाहता। इसीलिए बचपन से सभी शारीरिक एवं भावनात्मक आवश्यकताओं की तरह इसका भी ध्यान रखता है और खुलकर विचार-विमर्श द्वारा कोई ऐसा मार्ग ढूंढऩे का प्रयत्न करता है जो संतुष्टि तो दे पर शोषण अथवा टूटन को आमंत्रित न करे। सहजीवन की ओर बढ़ते युवा ऐसे ही प्रयोगों के उदाहरण हैं।
६६
गृहलक्ष्मी फरवरी २०१६
