………..सहसा उसने कदमों की चाप सुनी तो अपने विचारों से जागी, कितनी सारी बातें वह सोच गई।

उसने देखा, राज विजयभान सिंह पधार रहे हैं। शाही लिबास में उनका लम्बा-चौड़ा शरीर बहुत खिल रहा था, फिर भी सुंदर मुखड़े पर अत्यधिक गंभीरता थी, ऐसा लगता था मानो दिल के साथ उनकी सारी दौलत भी छिन गई हो। वह राधा के समीप ही आकर खड़े होे गए। राधा ने घृणा से अपनी पलकें दूसरी ओर फेर लीं।

‘गांव वाले अपनी फरियाद लेकर आए थे।’ उन्होंने कहा‒ ‘कल रात कुछ लुटेरों ने उनके झोपड़ों में आग लगा दी है।’

राधा उसी प्रकार बैठी रही। घृणा से मन-ही-मन उन्हें कोसती रही। गांव वाले लुटेरों को जानकर भी अनभिज्ञ थे, फरियाद लाए भी तो लुटेरे के पास!

‘मैंने उन सभी को मुंहमांगी कीमत दे दी है, इसलिए कि इन लुटेरों से मैं उनकी हिफाजत नहीं कर सका। कैसे समझाता कि ये लुटेरे नहीं, मेरे अपने ही लोग हैं, जिनके द्वारा लड़कियों को उठवाकर मैं अपनी वासना की भूख मिटाने में आनंद उठाता रहा हूं।’ राजा विजयभान सिंह ने एक आह भरी। ‘केवल उन्हें समझा दिया कि अब यहां कोई लुटेरा नहीं आएगा। मैंने भोला की मांग भी पूरी कर दी है।’

राधा की भीगी पलकें ऊपर को उठीं, उसने आश्चर्य से राजा विजयभान सिंह को देखा।

‘हां…!’ वह बोले‒ ‘उसी प्रकार खड़े-खड़े उसने तुम्हारी कीमत केवल पंद्रह हजार लगाई। कहने लगा कि डाकुओं ने राधा को उठा लिया। मंडप में आग लगा दी। दहेज को आग में फेंक दिया। पांच हजार रुपया साथ ले गए। मैं जानता हूं मेरे लोगों का ऐसा साहस कभी नहीं हो सकता। रुपया तो वह जितना चाहे मुझसे ले सकते हैं, परंतु मैं चुप ही रहा। तुमको भूलने के लिए उसने पंद्रह हजार रुपए की मांग की, जो मैंने तुरंत पूरी कर दी।’

‘पंद्रह हजार!’ राधा के होंठों से अचानक ही निकल गया।

‘हां, पंद्रह हजार तो क्या, तुम्हारी कीमत में मैं उसे अपनी सारी दौलत तक दे देता, परंतु शर्त यही होती कि तुम मुझे क्षमा कर दो, मुझे अपना लो। मुझे अपनी मांग में सिंदूर भरने का अधिकार सौंप दो। मुझे यह महसूस होने दो कि तुम मुझे चाहती हो, प्यार करती हो, तड़पती हो।’

राधा को भोला पर बहुत क्रोध आया। जीवनभर उससे प्यार करने का दावा करने वाला केवल पंद्रह हजार रुपए में ही फिसल गया। उसके प्यार के सहारे तो उसने आशा की थी कि इस हवेली की ईंट-से-ईंट बजा देगी, उसकी मजबूत बांहों की छांव में सुरक्षित रहकर वह गांव वालों को भड़काते हुए अवश्य ऐसा समय उत्पन्न कर देगी कि यहां इंकलाब आ जाएगा। परंतु यह सब क्या हो गया?

भोला इतनी जल्दी बदल गया, यदि भोला इतनी जल्दी बदल सकता है, तो भला दूसरे लोग उसका साथ क्यों देने लगे? फिर भी उसने राजा विजयभान सिंह की बात के उत्तर में कहा‒ ‘यह झूठ है। भोला कभी मेरी कीमत नहीं लगा सकता।’

‘यह सच है राधा! बिलकुल सच है।’ उन्होंने गंभीर होकर कहा‒‘यह बात तुम स्वयं उससे पूछ लेना, मैंने उसका दिल टटोला तो उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि अब वह तुम्हें किसी अवस्था में स्वीकार नहीं करेगा।’

राधा का दिल टूट गया, सिर झुकाए वह सिसक पड़ी। राजा विजयभान सिंह बोले‒ ‘और इस जुल्म का मुआवजा यही है कि मैं तुमसे शादी कर लूं। तुम्हें अपनी पत्नी बना लूं।’

‘पत्नी!’ राधा ने तिरस्कत भाव से कहा‒‘भारतीय नारी केवली एक बार ही पत्नी बनती है… और वह मैं बन चुकी हूं… भोला की पत्नी, हमारी मंगनी पहले ही हो चुकी थी।’

‘परंतु वह तुम्हें अब कभी नहीं अपनाएगा।’

‘मैं स्वयं भी अपना सब कुछ लुट जाने के बाद उसके पास नहीं जाना चाहती, विशेषकर ऐसी अवस्था में। उसने मेरे विश्वास को सख्त ठेस पहुंचाई है, मैं मरना भी नहीं चाहती, मैं अपने खानदान की अंतिम निशानी हूं। मैं जीवित रहना चाहती हूं… और जीवित रहकर यह देखना चाहती हूं कि ऐसे आदमी का क्या हश्र होता है, जिसने अपने आनंद के लिए मेरा खानदान लूट लिया…

अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए गांव की लड़कियों की डोली उठाना कठिन कर दिया है। उसकी आज्ञा के बिना कोई लड़की जवान नहीं हो सकती और जिसने अपनी दौलत के नशे में उन नवयुवकों के होंठों पर खामोशी की मुहर लगा रखी है, जो इस जुल्म के विरुद्ध आवाज उठाना चाहते हैं।’

‘राधा!’ राजा विजयभान सिंह की पलकें भीग गयीं।

राधा की बातें बरछियों के समान उनके दिल में चुभने लगीं। वे बोले‒ ‘क्या इस संसार में मेरे लिए कोई ऐसा प्रायश्चित नहीं, जिसके कारण तुम मुझे प्यार न सही, क्षमा ही कर सको?’

‘हरगिज नहीं।’

‘राधा! मैं तुम्हें चाहता हूं, तुम्हें प्यार करता हूं, तुम्हारी खुशी के लिए अपना सब कुछ भेंट चढ़ा देना चाहता हूं।’ राजा विजयभान सिंह उसके समीप झुककर बोले‒ ‘अपने दिल के दर्पण पर तुमने जिस भोला का रूप खींच रखा था, वह इस योग्य नहीं था।

वह इस योग्य होता तो तुम्हारे लिए डाकुओं से लड़-लड़कर अपनी जान दे देता। तुम्हारा मूल्य लगाने की बजाय पागल हो जाता। उसने तुम्हें कभी प्यार नहीं किया। तुम उसकी पत्नी भी नहीं बनी।

पत्नी मैं तुम्हें बनाना चाहता हूं। मैं तुमसे प्यार करता हूं, जाने कौन-सी ऐसी बात मेरे मन में घर कर गई है कि तुम्हारी इतनी बातें सुनने के पश्चात् भी मैं अपना दिल निकालकर तुम्हारे कदमों में रख देना चाहता हूं। चाहो तो मुझे आजमा कर देख लो, मेरी परीक्षा ले लो। मैं कभी तुम्हें निराश नहीं करूंगा।’

‘यदि ऐसी बात है तो आप मुझे स्वतंत्र कर दीजिए, मैं अपने बाबा के पास जाना चाहती हूं।’ राधा ने यहां से बच निकलने का रास्ता ढूंढा।

राजा विजयभान सिंह के दिल को निराश करने वाली दूसरी बात थी, परंतु वह बोले कुछ भी नहीं। वहां से हटकर वह सामने के एक्वेरियम के समीप खड़े हो गए। राधा की ओर पीठ किए उन्होेंने जोर से ताली बजाई। राधा ने एक ओर दर्पण में देखा‒ उसकी आंखें भीगी हुई है।

उसने सोचा, अपनी घृणा की आग के सहारे ही वह शायद इस जालिम को प्यार की खातिर तड़पा-तड़पाकर मार सकती है। उसे उससे बदला लेने का एक सहारा मिला। दो दासियां सामने प्रकट हुर्इं और झुककर आदाब किया तो राजा विजयभान सिंह ने मानो क्रोध अपने ऊपर ही उतारते हुए कहा‒ ‘इन सारी मछलियों को आजाद कर दो, इन्हें समुद्र में डाल दो।’…….

आगे की कहानी कल पढ़ें, इसी जगह, इसी समय….

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