हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है और वर्ष के सभी 24 एकादशी में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तो विशेष कल्याणकारी मानी जाती है, जिसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन 4 महीनो से क्षीर सागर में सोए हुए भगवान विष्णु जागृत अवस्था में आते हैं, ऐसे में इस दिन किए गए व्रत और पूजा पाठ बेहद कल्याणकारी सिद्ध होती है। इस बार यह दिन शुक्रवार, यानी 8 नवंबर को पड़ रहा है। चलिए आपको देवउठनी एकादशी के बारे में विस्तार से बताते हैं, साथ ही आपको ये भी बताएंगे कि कैसे आप इसका पूरा लाभ उठा सकते हैं।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु, शंखासुर नामक भयंकर राक्षस का वध करआषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को क्षीर सागर में शेषनाग पर सोने चल गए और फिर चार महिने की योग निद्रा के बाद वो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे थें। ऐसे में मान्यता है कि भगवान विष्णु के जागृत होने के इस दिन को सभी देवी-देवता दीप उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसलिए ये दिन देव प्रबोधिनी एकादशी के रूप में जाना जाता है और इस दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी के साथ तुलसी की पूजा करने का भी विशेष महत्व माना जाता है। 

व्रत और पूजा विधि

देवउठनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठे और स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें। इसके साथ व्रत का संकल्प करें… अगर सम्भव हो सके तो निर्जल व्रत रखें और सम्भव ना हो तो फलाहार लेलें। इसके बाद शाम को घर के पूजा स्थल को साफ करके वहां चूना और गेरू से रंगोली बनाएं। फिर वहां घी के 11 दीपक जला कर उन्हें देवताओं को समर्पित करें। इसके बाद द्राक्ष,ईख,अनार,केला,सिंघाड़ा,मूली जैसे मौसमी फलों का भोग चढ़ाएं और उसके बाद उन्हें प्रसाद स्वरूप ग्रहण करेँ। ऐसेा करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है।