World No Tobacco Day: तंबाकू ऐसा जहर है जो सेवन करने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे मौत की ओर धकेलता है। स्त्री हो या पुरुष परिस्थिति, परेशानी या गलत सोहबत में जाने-अनजाने तंबाकू उत्पादों का सेवन करने लगते हैं। शुरू-शुरू में तो वे इसे शौकिया तौर पर, शेखी बघारने या दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे उनका यह शौक लत में बदल जाती है और तंबाकू का नशा सिर चढ़कर बोलता है। यानी व्यक्ति चाहे या न चाहे, तंबाकू लेना उसकी मजबूरी बन जाती है। तंबाकू शरीर को धीरे-धीरे खोखला कर देता है, कई क्रोनिक डिजीज का शिकार बना देता है और उसकी मौत तक हो जाती है।
तंबाकू के प्रकार

यह तंबाकू ओरल या स्मोकलेस यानी चबा कर खाया जाने वाले तंबाकू और स्मोकिंग या धूम्रपान के रूप में लिया जाता है। ओरल तंबाकू में गुटखा, जर्दा, पान, खैनी, नसवार या सूंघनी जैसी चीजें आती हैं और सिगरेट, ई-सिगरेट, बीड़ी, सिगार, हुक्का के रूप में स्मोकिंग की जाती है। इनमें सबसे ज्यादा खतरनाक है-सिगरेट। सिगरेट पीने से निकोटिन न केवल उस व्यक्ति के शरीर में जाता है, बल्कि धुएं के माध्यम से आसपास के लोगों और वातावरण को भी प्रभावित करती है। अध्ययनों से साबित हो चुका है कि सिगरेट के 30 फीट के दायरे में आने वाले लोग भी पैसिव स्मोकिंग की गिरफ्त में आ सकते हैं।
क्यों है खतरनाक

वास्तव में तंबाकू के विभिन्न उत्पादों में निकोटिन नामक जहरीला पदार्थ होता है जो ‘निकोटियाना‘ प्रजाति के पेड़ के पत्तों को सुखाकर बनाया जाता है। तंबाकू में निकोटिन के साथ कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, टार, नाइट्रोजन, अमोनिया, सल्फर, एल्कोहल जैसे खतरनाक पदार्थ भी मिलते हैं। ये पदार्थ शरीर में नशा पैदा करते है। निकोटिन तेजी से मस्तिष्क में पहुंचता है और वहां रिसेप्टर्स को बांधता है। वहां से निकले हार्मोन्स के जरिये यह शरीर के मेटाबाॅलिज्म केा प्रभावित करता है और पूरे शरीर में फैल जाता है। ये जहरीले पदार्थ तंबाकू का सेवन करने वाले व्यक्ति के शरीर में पहुंच कर उसे कई तरह की बीमारियों का शिकार बनाते हैं। शुरुआत में यह नशा व्यक्ति को सुखद अनुभूति या खुशी का अहसास कराता है, लेकिन नियमित रूप से तंबाकू का सेवन करने से इसमें मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा को कम करता है और टार कैंसर पैदा करने वाले एजेंट का काम करता है।
तंबाकू का दुष्प्रभाव
लंबे अरसे तक गुटखा, जर्दा जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन करने से मुंह में ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस या मुंह का कैंसर हो जाता है। चूंकि इनउत्पादों का सेवन चबाकर किया जाता है। ये पदार्थ काफी समय तक मुंह में दबा कर रखे जाते हैं। जिससे मुंह के अंदर सबम्यूकस टिशूज में जलन और छाले पड़ जाते हैं। टिशूज डैमेज हो जाते हैं। मुंह की स्किन में बदलाव आने लगते हैं। स्किन सफेद होने लगती हे या उस पर सफेद दाग पड़ जाते हैं। दांत भी खराब हो जाते हैं। सेवन करने वाले व्यक्ति के मुंह में सूजन आ जाती है, मुंह में दर्द रहता है, मुंह खोलने और खाना खाने में दिक्कत आती है। मुंह की स्वाद-ग्रंथियों पर भी असर पड़ता है जिससे खाने का कोई स्वाद नहीं आता। वहीं बोलने में भी परेशानी होती है। ध्यान न देने पर सबम्यूकस फाइब्रोसिस गंभीर रूप लेता है। मुंह में बने स्लायवा के साथ कैंसर टिशूज शरीर के दूसरे अंगो तक पहुंच कर प्रभावित करते हैं। शुरुआत में ही अगर इन लक्षणों की पहचान हो जाए तो पेशंट को सावधानी बरतनी चाहिए वरना लास्ट ऑप्शन मुंह की सर्जरी होता है।
गले, फेफड़ों और लीवर को खतरा

तंबाकू चाहे किसी भी रूप में लिया जाए, उसका असर शरीर के मुख्य अंगों पर जरूर पड़ता है। ओरल तंबाकू अक्सर मुंह में रहता है, उसका स्लायवा या थूक के साथ मुंह से अंदर जरूर जाता है। कई मामलों में मुंह के कैंसर के टिशूज फैल जाते हैं और हमारी सांस की नली ट्रेकिया से होता हुआ लंग्स तक पहुंचता है। निकोटिन, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे तंबाकू के विषैले पदार्थो के पार्टिकल्स सांस की नली और फेफड़ों में जम जाते हैं। फेफड़ों में कैंसर हो सकता है। इससे सांस की नली सिकुड़़ जाती है। इस स्थिति को क्राॅनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) कहते हैं। गले में खराश रहती है, सूखी खांसी की शिकायत रहती है, सांस लेने में तकलीफ होती है, दम फूलने लगता है। समुचित कदम न उठाए जाने पर टीबी, ब्रोंकाइटिस जैसी समस्याएं हो जाती हैं। तंबाकू के ज्यादा सेवन से लीवर सिरोसिस का खतरा भी होता है। निकोटिन जैसे विषैले पदार्थं लीवर की कोशिकाओं केा भी असर डालतें हैं जिससे लीवर ठीक से काम करना बंद कर देता है।
हार्ट अटैक की बढ़ती है संभावना

तंबाकू के सेवन का सबसे ज्यादा असर पड़ता है हमारे हार्ट पर। तंबाकू हार्ट की कोरोनरी आर्टरीज़ को प्रभावित करता है। आर्टरीज सिकुड़ जाती है, जिससे हार्ट में ब्लड सप्लाई बाधित होती है और हार्ट अपना काम सुचारू रूप से नहीं कर पाता। इसे कोरोनरी हार्ट डिजीज कहते है। दूसरी तरफ जिन लोगों में हाई काॅलेस्ट्राॅल और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होती है, तंबाकू का नियमित सेवन करने से उन्हें हार्ट अटैक का ज्यादा खतरा होता है।
महिलाओं पर असर
तंबाकू के सेवन से महिलाओं में न केवल इन्फर्टिलिटी या बांझपन की समस्या देखने को मिल रही है। ओवरी में एग-फोर्मेशन और उनकी फर्टिलाइजेशन की दर पर भी असर पड़ता है। निकोटिन के प्रभाव से कई महिलाओं केा अनियमित पीरियड्स या माहवारी और प्री-मैच्योर मेनोपाॅज की समस्या का भी सामना करना पड़ता है। इससे ऐसी महिलाए आमतौर पर मानसिक तनाव से भी ग्रस्त रहती हैं। तंबाकू का सेवन करने से गर्भवती महिलाएं ज्यादा प्रभावित होती हैं। उनमें गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है। तंबाकू की लत पड़ने से डाइट कम हो जाती है। जिसका असर उनके गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है और उसका विकास ठीक नहीं हो पाता। प्री-मैच्योर बेबी होने की संभावना रहती है या फिर बेबी लो बर्थ रेट वाला पैदा होता है या बच्चा कमजोर या विकृतियां लिए होता है।
क्या है उपचार
सिगरेट छोड़ने की प्रक्रिया में व्यक्ति को सिरदर्द और चक्कर आना जैसे विड्रॉल सिम्टम्स हो सकते हैं, जिन्हें थोड़ी सी मेहनत से काबू किया जा सकता है। स्मोकिंग की कमी से नींद न आना, डिप्रेशन बढ़ सकता है। लेकिन अगर ये लक्षण एक-डेढ़ सप्ताह से ज्यादा समय तक चलते हैं तो डॉक्टर को कंसल्ट करना बेहतर है। व्यक्ति की स्थिति के आधार पर काउंसलिंग की जाती है और समुचित दवाइयां दी जाती हैं। तंबाकू लेने की तलब को शांत करने और व्यक्ति में तंबाकू सेवन के प्रति विरक्ति पैदा करती है। इस दिशा में केवल व्यक्ति की दृढ़ इच्छा शक्ति ही काम आती है जिसके बल पर वो अपने अमूल्य जीवन को तंबाकू के जाल से बचा सकता है। डॉक्टर निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपीए निकोटिन पैचेज़, निकोटिन च्यूंगम, मेडिसिन उपलब्ध हैं। निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी में निकोटिन बिना किसी नुकसानदेह कैमिकल्स के दिया जाता है। यह थेरेपी कई प्रकार से दी जाती है- स्किन पैचेज़, मीठी गोलियां, च्यूंगम, नेज़ल स्प्रे, इन्हेलर, मेडिसिन। सिगरेट छोडने के तकरीबन एक साल बाद कई तरह के बदलाव आने लगते हैं और धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार होने लगता है।
( संटोम अस्पताल, रोहिणी, दिल्ली की फिजीशियन डाॅक्टर आरिका वोरहा से की गई बातचीत के आधार पर)
