Overview:
आज की जनरेशन सोशल मीडिया को आदर्श मान बैठी है। उनकी जिंदगी इससे काफी प्रभावित है और यह उनके लिए काफी मायने रखती है। ऐसे में माता-पिता को अपनी पेरेंटिंग में जरूरी बदलाव करने की जरूरत है।
Lessons from Adolescence: नेटफ्लिक्स की ड्रामा सीरीज ‘एडोलसेंस’ इन दिनों चर्चा में है। इस सीरीज ने किशोरों की मानसिक स्थिति, सोशल मीडिया और उनकी भाषा को लेकर छिपे कई राज खोल दिए हैं। आज की जनरेशन सोशल मीडिया को आदर्श मान बैठी है। उनकी जिंदगी इससे काफी प्रभावित है और यह उनके लिए काफी मायने रखती है। ऐसे में माता-पिता को अपनी पेरेंटिंग में जरूरी बदलाव करने की जरूरत है।
ये है सीरीज की कहानी
तीन हफ्तों से नेटफ्लिक्स पर टॉप 10 में रहने वाली इस सीरीज में 13 साल के जेमी की कहानी दिखाई गई है। जेमी को अपनी क्लासमेट कैटी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है। जैसे-जैसे यह ड्रामा खुलता है, यह कई सवाल आपके सामने खड़े कर देता है। कैसे सोशल मीडिया बच्चों की मानसिकता को प्रभावित करता है। कैसे उन्हें हिंसक बना रहा है और कैसे उनकी अलग ‘इमोजी दुनिया’ है। हर पेरेंट्स के जहन में यह सीरीज कई सवाल छोड़ जाती है। सबसे बड़ा सवाल था, क्या इस हत्या को रोका जा सकता था।
जानिए क्या है एडोलसेंस
एडोलसेंस, बचपन से वयस्क होने के बीच का चरण होता है। यानी 10 से 19 साल के बीच का समय। इस दौरान बच्चों में कई शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलाव होते हैं। उनका नया फ्रेंड सर्कल बनने लगता है। इस समय हर पेरेंट्स की यह जिम्मेदारी है कि वह बच्चों पर पूरा फोकस करें।
संतुलन बनाने की है जरूरत
गौतम हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की मनोचिकित्सक डॉ. अनीता गौतम कहती हैं कि स्मार्टफोन ने पेरेंट्स की परेशानियां और जिम्मेदारियां, दोनों ही काफी हद तक बढ़ा दी हैं। अब वो समय है जब न आप बच्चे को फोन से दूर कर सकते हैं, न ही उनके इंटरनेट पर पूरी तरह से लिमिट कर सकते हैं। क्योंकि अब मोबाइल फोन उनकी स्टडी का भी हिस्सा है। ऐसे में पेरेंट्स को बैलेंस बनाने की जरूरत है।
सबसे जरूरी है संवाद
डॉ. गौतम कहती हैं कि कम्यूनिकेशन आपके और बच्चे के बीच वो पुल है, जहां से भावनाओं का आदान प्रदान होता है। इसलिए बच्चे को पूरा समय दें। उससे खुलकर बात करें। बस ये न पूछें कि स्कूल में क्या किया। ये भी जानें कि स्कूल में किस बात पर सबसे ज्यादा हंसे या किस बात ने आपको परेशान किया। जब बच्चे आपसे बात करें तो पूरी तरह से बातों पर फोकस करें। अब वो समय है जब आपको हर टॉपिक पर बच्चों से खुलकर बात करनी होगी। आप बच्चे को हमेशा उनकी कमियां सुधारने की और गुणों को और निखारने की शिक्षा दें। उसे कॉन्फिडेंस के साथ बड़ा होने दें।
मेरा बच्चा अच्छा! क्या सच में
हर माता पिता को यही लगता है कि उनका बच्चा बहुत सीधा और अच्छा है। लेकिन आपको यह स्वीकार करना ही होगा कि आज के समय में बच्चे इंटरनेट के साथ बड़े हो रहे हैं। उनके अलग वॉट्सएप ग्रुप हैं। वे इंस्टाग्राम पर चैट करते हैं, ऑनलाइन गेमिंग करते हैं, यूट्यूब देखते हैं। वे आपके बिना बताए ही सेक्स, पावर, हिंसा और प्यार के बारे में जान रहे हैं। इसलिए कुछ कदम उठाएं। बच्चों की प्राइवेसी जरूरी है, लेकिन उन्हें कमरा बंद करके सोने की इजाजत न दें। अगर वे ऑनलाइन गेम खेल रहे हैं तो उन्हें लिविंग रूम में बैठाएं। जहां से आप उनकी बातें सुन पाएं। रात को 11 बजे के बाद बच्चे से फोन ले लें।
बदलाव को पहचानने की कोशिश
बच्चों में बदलाव कभी भी एक बार में नहीं होता। यह एक धीमी प्रक्रिया है, जिसे अक्सर पेरेंट्स देख नहीं पाते। आप ये गलती न करें। अगर बच्चा आपकी बातों का जवाब सिर्फ एक या दो शब्दों में दे रहा है। अपना फोन लॉक रखता है। उनके बात करने के अंदाज में बदलाव है। वो ऐसे नए दोस्त बना रहा है, जिन्हें आप नहीं जानते तो आपको सावधान होने की जरूरत है। आप दिन में कम से कम 15 मिनट बच्चों से उनके दोस्तों के बारे में बातें करें। इमोजी की नई भाषाओं के बारे में जानें। आप उन्हें ये विश्वास दिलाएं कि वे आपसे सारी बातें शेयर कर सकते हैं।
महिलाओं का सम्मान सिखाएं
आज के दौर में जहां महिलाओं को लेकर मजाक करना एक ट्रेंड बन गया है। बच्चों के लिए उनका सम्मान करना और इसकी जरूरत को समझना एक मुश्किल काम है। इसलिए यह शिक्षा आप बचपन से ही बच्चों को दें। उन्हें बताएं कि सिर्फ मां, बहन, दादी, नानी का ही नहीं हर महिला का उन्हें सम्मान करना है। बच्चे बाहर से कुछ सीखें, उससे पहले ही आप अपनी शिक्षाएं उन्हें देना शुरू करें। एडोलसेंस जैसी फिल्मों पर भी खुलकर बात करें।
