होली खेलने वालों की मांग यही होती है कि रंग अच्छा और पक्का होना चाहिए। होली का पक्का रंग जब तक यादों को भी न रंग दे तो उसका फायदा ही क्या? अबीर और गुलाल चमकदार और आकर्षक हो, तो तुरंत बिक जाते हैं। होली के अवसर पर अनेक तरह के अच्छे तथा पक्के, सूखे और पानी में घुलने वाले रंग बेचे जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने इस बात पर विचार किया है कि ये रंग कैसे बनते हैं? और कुछ रंग कच्चे क्यों होते हैं और कुछ रंग पक्के क्यों होते हैं? आइये। हम आपको बताएं कि रंग व गुलाल बनते कैसे हैं?
होली के अवसर पर सबसे ज्यादा बिकता है गुलाल। बड़े-बड़े बर्तनों में पहाड़ों जैसे इसके ढेर बनाकर हर दुकानदार इसी रंग को सबसे आगे रखता है। होली का गुलाल वैसे तो पौधों से परंपरागत रूप से बनाया जाता था। लेकिन आजकल रासायनिक रूप से संश्लेषित या मिला-जुला गुलाल ही ज्यादा बिकता है। मूलतः सभी रंग पौधों और जानवरों से ही प्राप्त होते हैं पर आज के जमाने में जब हर कोई रंगों की मांग कर रहा है, भारी मांग को पूरा करने के लिए इस रासायनिक विधियों से मिश्रित कर बड़ी मात्रा में तैयार किया जाता है। प्राकृतिक स्त्रोत से तैयार रंगों की तुलना में ऐसा संश्लेषित रंग सस्ता भी होता है।
रंगों में रंग कम ये ज्यादा होता है
दुकानदार के बर्तन में जो गुलाल का ढेर रखा होता है, वह रंग नहीं होता। रंग की मात्रा थोड़ी सी ही होती है। इसमें फ्रेंच खड़ियां, स्टार्च, खाने का नमक, बोरिक एसिड वगैरह रहते हैं। रंग की मात्रा को बढ़ाने व इसे हल्का करने के लिए ऐसा किया जाता है।
मुख्यत: तीन रंगों का होता है इस्तेमाल
होली के अवसर पर मुख्यतः तीन तरह के रंगों का उपयोग होता है। तेजाबी रंग मूल रंग और मिश्रित रंग अथवा हल्का रंग। कभी-कभी सीसा से बनाए या पोटैशियम डाइक्रोमेट से बने रंगों का उपयोग भी कर लिया जाता है। तेजाबी रंगों में आमतौर पर सिंदूरी, भड़कीला केसरिया, सफेद और पीली रंगत के रंग होली पर बिकते हैं। सिंदूरी केसरिया और संतरी रंगों से गुलाल बनाया जाता है। यह तेजाबी रंग रेशमी, उनी और नायलान के वस्त्रों को लाल रंग या पीलापन लिए लाल रंग में रंग डालते हैं। प्रोटीन से मिलने से ये रंग रासायनिक रूप से एकदम क्रियाशील हो जाते हैं। इसलिए तेजाबी रंग अगर कई घंटे तक हमारी चमड़ी और बालों पर पड़े रहें तो उनकी रंगत बदल देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बालों और चमड़ी की कोशिकाओं में प्रोटीन होता है। वास्तव में तेजाबी संतरा रंग तो अनेक देशों में बालों को रंगने के लिए ही इस्तेमाल होता है। यदि तेजाबी रंगों से बालों और चमड़ी की रंगत हल्की सी बदलती है तो उसे साबुन या शैम्पू से नहाकर पहले जैसा किया जा सकता है। पर यदि ऐसा रंग काफी देर तक लगा रहे तो पहले जैसा रंग दुबारा आने में कई महीने लग सकते हैं।
चमड़ा रंगने में होता है इन रंगों का इस्तेमाल
तेजाबी एवं रासायनिक रंगों के बाद ज्यादा गहरी रंगत मूल रंगों की होती है। मूल रोगों के मणिम (अत्यन्त चमकीले ) होते हैं, और पानी में घुलने के बाद इनकी रंगत गहरी व भड़कीली होती है। रंगों में अधिकतर तांबाई हरा, बैंगनी, चमकीला हरा आदि रंगों का उपयोग होता है। इनका व्यापारिक उपयोग कागज व चमड़ा रंगने तथा कई रंगतों की लेखन स्याही और पेंसिल से लिखने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले कार्बन बनाने में होता है, जिंक क्लोराइड युक्त मूल रंग सामग्री कुछ हद तक जहरीला प्रभाव उत्पन्न करती है।
ऐसे पहचाने कि कैसा है आपका रंग
हमारे लिए होली के अवसर पर केवल तेजाबी रंग हानिकारक होते हैं, और वह भी रासायनिक रूप से मिश्रित रंग हो। इसीलिए ऐसे रंगों की पहचान होनी चाहिए। ऐसा करने के लिए किसी भी रंग को बिना किसी पूर्वाग्रह के उठा लें। उसे साधारण तरीके से पानी में घुलने दें। इसमें उनी व सूती कपड़े का टुकड़ा डालें फिर थोड़ा सिरका डालकर उबलने दें। अब ठंडा होने पर टुकड़ों को साबुन व पानी से धोयें। अगर रंग सूती कपड़ें पर से उतर जाए और उनी पर चिपका रहे तो समझ लेना चाहिए कि यह रंग तेजाबी है। यदि सूती व उनी दोनों कपड़ों से रंग न उतरे तो समझना चाहिए कि यह प्राकृतिक रंग है।
मूल रंग वैसे तो तेजाबी रंग की तरह कपड़ों पर प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन उनकी रंगत जल्दी उड़ जाती है और सूर्य के प्रकाश में तो ये फौरन फीके पड़ जाते हैं, जैसे हल्दी में रंगा कपड़ा।
गुलाल से रंगें कपड़ों को ही ले लें, पहली बार धोने पर भी कपड़े पर लगे रंग के धब्बे नहीं छूटते, चूंकि पानी लगने के बाद गुलाल कपड़े से चिपक जाता है, इसलिए बेहतर है कि कपड़ों को पानी में डालने से पहले झाड़ लिया जाए, ताकि अधिकाशं सूखा रंग उतर जाए। बाद में धब्बों को धोना एक जहमत ही है।
सूती कपड़ों पर चढ़ा होली का रंग जल्दी उतरता है, क्योंकि इन पर तेजाबी और मूल रंगो का इतना नहीं होता जितना कि प्राकृतिक रंग का। तेजाबी और मूल रंगों में रंगे कपड़े को साबुन से साधारण ढंग से धोने पर इसके धब्बे छूट जाते हैं पर अगर कुछ धब्बे न उतरें तो पहले कपड़ों को नमक मिले पानी में डुबों कर रखना चाहिए और हल्का गरम कर लेना चाहिए, तभी धब्बे छूटेंगें।
हमारी त्वचा एक ऐसा रक्षा कवच है जो थोड़ी मात्रा में हानिकारक रासायनिक तत्वों को रक्त के जरिये शरीर में नहीं पहुंचने देती, लेकिन होली खेलने वालों को जिनके शरीर पर कोई घाव हो या घाव अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ हो, ऐसी स्थिति में रंगों में घुला रासायनिक तत्व घाव के जरिये रक्त में मिल जायेगा और इससे हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं।
चूंकि बाजार में बिकने वाले अधिकतर अबीर-गुलाल रासायनिक होते हैं, इसलिए उत्साहित होकर रंग शरीर पर चिपकाए रखने में फायदा तो कुछ नहीं नुकसान ज्यादा हो जायेगा। बच्चों की तो विशेष सावधानी रखने की जरूरत होती है क्यांेकि उन्हें रंग तुरंत झाड़ने या धोने का बोध नहीं रहता, इसलिए होली के दौरान रंगो की महफिल में जाइए जरूर पर थोड़ी देर ही उन्हें अपना साथी बनाइये।
(साभार – साधनापथ)
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