भारतीय संस्कृति में गुरु का होना न केवल गर्व की बात थी वरन् गुरु का होना अनिवार्य भी था। जिसके पास गुरु नहीं होते थे उन्हें निम्न दृष्टि से देखा जाता था और उन्हें अनाथ, दरिद्र और अभागा समझा जाता था। संस्कृत में अनाथ उनको कहा जाता है जिनके गुरु नहीं होते हैं। गुरु तत्त्व हमारे जीवन में विद्यमान है। हमारी मां हमारी प्रथम गुरु होती है। उसके बाद विज्ञान से लेकर ब्रह्मज्ञान तक, जन्म से लेकर मृत्यु तक, गुरु तत्त्व हमारे जीवन के हर पहलू में विद्यमान है। जीवन के हर एक विषय के लिए गुरु होते हैं, धर्म के लिए धर्म गुरु, परिवार के लिए कुल गुरु, राज्य के लिए राजगुरु और किसी विषय को अध्ययन करने के लिए विद्या गुरु तथा अध्यात्म के लिए सद्गुरु। गुरु न केवल आपको ज्ञान से भरता है बल्कि वह आपके भीतर उर्जा की ज्योति जलाता है। गुरु की उपस्थिति में आप अधिक जीवंत हो जाते हैं। बुद्धि की पराकाष्ठा एक प्रबुद्ध चेतना है। गुरु न केवल आपको बुद्धिमान बनाते हैं बल्कि आपको ज्ञानी भी बनाते हैं।
ज्ञान से बुद्धिमान बनना आवश्यक नहीं है लेकिन प्रबुद्ध अवस्था में ज्ञान समाहित होता है। आचार्य (अध्यापक) आपको ज्ञान देता है लेकिन गुरु आपको सजगता की उन ऊंचाइयों तक ले जाता है जहां आप जीवन्त हो जाते हैं। तीन प्रकार के लोग गुरु के पास आते हैं- विद्यार्थी, अनुयायी और भक्त। विद्यार्थी वह है जो अध्यापक के पास आकर कुछ सीखता है, कुछ सूचनाएं एकत्र करता है और विद्यालय से चला जाता है। परंतु महज जानकारियों से ज्ञान नहीं मिलता है, उससे प्रबुद्ध नहीं बन सकते हैं। उसके बाद अनुयायी होते हैं। ये अनुयायी गुरु के आदेशों का अनुसरण करते हैं। परंतु अनुयायी गुरु के पास ज्ञान प्राप्ति के लिए आते हैं, अपने जीवन को सुधारने आते हैं, मोक्ष पाने आते हैं। वे अपने जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। उसके बाद भक्त आते हैं। भक्त के अंदर गुरु से ज्ञान पाने की आसक्ति नहीं होती। वे गुरु के साथ, अनंतता के साथ, ईश्वर के साथ गहरे प्रेम में डूबे रहते हैं। इस तरह विद्यार्थी प्रचुर मात्रा में होते हैं, अनुयायी कम होते हैं और भक्त तो विरले ही होते हैं।
यहां एक कथा प्रासंगिक होगी कि बुद्ध भगवान के सारिपुत्र नाम के एक भक्त थे जिनको निर्वाण प्राप्त हुआ। कुछ समय बाद भगवान बुद्ध ने उनसे कहा कि ‘अब आगे संसार में जाओ और लोगों को ज्ञान दो।’ निर्देश मिलते ही सारिपुत्र ने भगवान को छोड़ दिया परंतु वे रो रहे थे। लोगों ने उनसे पूछा कि आपको तो निर्वाण मिल चुका है फिर आप क्यों रो रहे हो? उन्होंने कहा, ‘निर्वाण की कौन परवाह करता है, मैं तो इसलिए रो रहा हूं कि मैं उनके सान्निध्य से वंचित हो रहा हूं..। इस निर्वाण के बजाय मैं भक्त होना अधिक पसंद करता हूं।’
गुरु वास्तव में एक खिड़की की तरह होता है। गुरु जीवन में अधिक सजकता, और जागरुकता लाने का माध्यम है। गुरु वह नहीं है जो आप पर हुकुम चलाए बल्कि गुरु आपको आत्मसात होने के लिए प्रेरित करते हैं। वे आपको वर्तमान क्षण में जीना सिखाते हैं और आपसे अपराध बोध, व्यग्रता, दुख, क्षोब को निकाल देते हैं। यही गुरु का वास्तविक अर्थ है। उपनिषदों में गुरु के पांच लक्षण बताए गए हैं। ज्ञान रक्षा, दुख क्षय, सुख आर्विभाव, समृद्धि और सर्वसंवर्धन। सद्गुरु की उपस्थिति में ज्ञान पल्लवित होता है, दुख क्षीण होने लगता है, मन बगैर कारण प्रसन्न रहने लगता है, व्यक्ति में सभी योग्यताएं बढ़ जाती हैं और समृद्धि भी आने लगती है। एक बार सद्गुरु मिल जाए तो यह याद रखना चाहिए कि वे सदैव आपके साथ हैं, आपको देख रहे हैं और आपको ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। अध्यात्म का पथ कुछ सीखने का मार्ग नहीं है बल्कि सीखे हुए को छोड़ने का मार्ग है। सच्चा मार्ग वह होता है जो आपको स्वयं से मिलाता है, आपके अंदर के गहरे प्रेम को जागृत करता है।
गुरु तत्त्व जीवन के लिए अति आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति में गुरु तत्त्व विद्यमान होता है। प्रत्येक में इस ज्ञान का आह्वान न करना चाहिए, जागृत करना चाहिए। जब यह तत्त्व जागृत होता है तो जीवन के सारे कष्ट चले जाते हैं। यह कष्ट की दवा है और सभी ज्ञान की पूंजी है।
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