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माँ मंगला गौरी
वैसे तो माँ मंगला गौरी का व्रत प्रत्येक मंगलवार को किया जा सकता है लेकिन सावन के पावन महीने के हर मंगलवार को माँ मंगला गौरी की पूजा का महत्‍व और उसका शुभ फल कई गुना बढ़ जाता है। इस बार श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को किए जाने वाले माँ मंगला गौरी का व्रत 31 जुलाई से शुरू हो रहा है। इसके बाद यह 07 अगस्त, 14 अगस्त आैर 21 अगस्त को पड़ेगा। मान्यता है कि जिस प्रकार माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था उसी तरह ही सुहागिन महिलाएं इस व्रत को करके अपने पति की लम्बी व स्वस्थ आयु का आशीर्वाद प्राप्त कर सकती हैं।
 
 
मंगला गौरी के पूजन में 16 का महत्व 
 
मंगला गौरी व्रत की पूजन विधि में संख्या 16 का अत्यंत महत्व होता है। फूलों की माला, लड्डू, फल, पान, सुपारी, जीरा, इलायची, लौंग, धनिया आदि सभी वस्तुएं 16 की संख्या में रखी जाती हैं। साथ ही साड़ी सहित श्रृंगार की 16 वस्तुएं, 16 चूडियां और 5 प्रकार के सूखे मेवे 16 की संख्या में होने चाहिए। सात प्रकार के धान्य होने चाहिए। व्रत का आरंभ करने वाली महिलाओं को श्रावण मास के प्रथम मंगलवार के दिन 16 मंगलवार व्रत का संकल्प लेकर प्रारम्भ करना चाहिए।
 
मंगला गौरी व्रत कथा 
 
मंगला गौरी व्रत की कथा इस प्रकार है-प्राचीन काल में धर्मपाल नाम का एक सेठ अपनी पत्नी के साथ सुखी-सुखी अपना जीवन यापन कर रहा होता है। उसे किसी तरह की कमी नहीं होती है सिवाय इसके कि उसकी कोई संतान नहीं थी। उसने बहुत पूजा पाठ और दान पुण्य किया, तब प्रसन्न हो भगवान ने उसे एक पुत्र प्रदान किया परंतु ज्‍योतिषियों ने कहा कि ये पुत्र अल्पायु होगा।
 
उनकी गणना के अनुसार सोलहवें वर्ष में सांप के डसने से उसकी मृत्यु हो जाएगी। दुखी सेठ ने इसे भाग्‍य का दोष मान कर धैर्य रख लिया। कुछ समय बाद उसने पुत्र का विवाह एक योग्य संस्कारी कन्या से कर दिया। कन्या की माता सदैव मंगला गौरी व्रत का विधि-विधान से पूजन किया करती थी। इसी व्रत के प्रभाव से उत्पन्न कन्या को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त था। उसी के परिणाम स्वरुप सेठ के पुत्र की आसन्न मृत्‍यु टल गयी और वह दीर्घायु को प्राप्त हुआ।