हनुमान जी पराक्रम, बुद्धि तथा वीरता के प्रतीक माने जाते हैं। संकट के समय हनुमान को ही स्मरण किया जाता है, अत: वे ‘संकटमोचक भी कहलाते हैं। हनुमान को शिव अर्थात् रुद्र का अवतार भी माना जाता है। ‘हनुमान शब्द में ‘ह ब्रह्मï का, ‘न अर्चना का, ‘मां लक्ष्मी का तथा ‘न बल का परिचायक है। हनुमान को समस्त देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त है। विष्णुपुराण के अनुसार रुद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा की भृकुटि टेढ़ी होने से हुई थी। हनुमान जी पवनदेव के पुत्र हैं।
हनुमान जी की उत्पत्ति कैसे हुई?
इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं हैं। एक मान्यता है कि एक बार जब वायुदेव ने अंजनी को वन में देखा, तो वे उन पर आसक्त हो गए, फलस्वरूप हनुमान जी की उत्पत्ति हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार वायु ने कान के माध्यम से अंजनी के तन में प्रवेश किया, जिससे वे गर्भवती हो गईं।
एक अन्य कहानी है कि महाराजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ से प्राप्त जो हविष्य अपनी रानियों को दिया था, उसका एक हिस्सा एक चील उठाकर ले गई तथा उसे पुत्र प्राप्ति के लिए तपस्या कर रही अंजनी की हथेली पर गिरा दिया। उसे खाने से अंजनी गर्भवती हुई और उनके पुत्र के रूप में हनुमान हुए।
कहां हुआ था हनुमान जी का जन्म?
हनुमान जी की जन्मस्थली के संदर्भ में भी कुछ निश्चित नहीं है। एक मान्यता के अनुसार हनुमान जी का जन्म रांचीजिले के गुमला प्रमण्डल में ग्राम अंजन में हुआ था।कर्नाटक के लोगों का विश्वास है कि हनुमान जी का जन्म इसी राज्य में हुआ था। पम्पा और किष्किन्धा ध्वंसावषेष हम्पी में देखे जा सकते हैं। फादर कामिल बुल्के ने अपनी ‘रामकथा में उल्लेख किया है कि कुछ लोगों के अनुसार हनुमान जी वानर वंश में उत्पन्न हुए थे। यह वंश भारत में पुरातनकाल से चला आ रहा है।
अनुपम कलाकार और विलक्षण वक्ता हनुमान
हनुमान जी आदर्श सेवक, राजदूत, नीतिज्ञ, रक्षक, व्याकरण के ज्ञाता, वक्ता, कलाकार, नर्तक, गायक और वेदवेत्ता थे। शास्त्रीय संगीत के तीन संगीताचार्यों में हनुमान जी भी एक माने जाते हैं। अन्य दो शार्दुल तथा कहाल हैं। ‘संगीत पारिजात नामक शास्त्र हनुमान जी के संगीत सिद्धांत से सम्बन्धित है।
हनुमान जी विलक्षण वक्ता और अनुपम कलाकार थे। सबसे पहली रामकथा हनुमान जी ने लिखी थी। यह रामकथा शिलाओं पर लिखी गई थी, जो हनुमन्नाटक के नाम से विख्यात हुई।
जब वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण तैयार कर ली, तो उन्हें लगा कि हनुमान जी के हनुमन्नाटक के संमुख यह टिक नहीं पाएगी तथा इसे कोई नहीं पढ़ेगा। हनुमान जी जब ऋषि की व्यथा की जानकारी मिली, तो उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया तथा अपनी रामकथा वाली शिला उठाकर समुद्र में फेंक दी, जिससे लोग वाल्मीकि जी को की रामायण को पढ़े तथा उसी की महिमा करें। समुद्र में फेंकी गई हनुमान जी की रामकथा वाली शिला राजा भोज के समय में निकाली गई तथा दमोदर मिश्र ने उसे लेखबद्ध किया।
संकटमोचन हनुमान

गोस्वामी तुलसीदास जी राजापुर गांव से तीन कोस (करीब 9.6 किमी.) पर स्थित नादीतौरा में हनुमान जी की मूर्ति की रोजाना पूजा-उपासना करने जाया करते थे। बरसात का मौसम आता, तब तुलसीदास को वहां पहुंचने के लिए कइ्र्र नदी-नाले पार करने पड़ते थे, जिससे उनको बेहद परेशानी झेलनी पड़ती थी। अपने भक्त तुलसीदास की परेशानी देखकर हनुमान जी ने स्वप्न में तुलसीदास जी से कहा, ”आप नादीतौरा जाने की परेशानी मत झेलो। आप यहीं किसी पत्थर पर चंदन से मेरी आकृति बनाकर आराधना कर लिया करो। स्वप्न में मिली हनुमान जी की आज्ञा को शिरोधार्य कर तुलसीदास ऐसा करने लगे। प्रतिदिन नादीतौरा की भांति हनुमान जी का रेखाचित्र चंदन से बनाते तथा पूजा-अर्चना के पश्चात पानी से मिटा देते।एक दिन पूजा-अर्चना करने के बाद गोस्वामी जी हनुमान जी का चित्र मिटाना भूल गए और चित्र पत्थर पर उभर आया, वह आज भी ज्यों का त्यों है। शांत मुद्रा वाली हनुमान जी की यह मूर्ति ‘संकटमोचन के नाम से जानी जाती है।
असाधारण ज्ञान और भक्ति भाव से ओत – प्रोत महापुरुष
हनुमान जी परम तपस्वी, बाल ब्रह्मचारी और शक्तिपुंज थे। उन्होंने कई ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। अध्ययन पूर्ण होने पर गुरुदेव ने कहा, ‘बेटा, किसी भी पीड़ित की रक्षा सबसे बड़ा धर्म है। ऋष्यमूक पर्वत पर मेरा ही अंश सुग्रीव रहता है। उसका ज्येष्ठ भाई बाली दुष्चरित्र है। उसने सुग्रीव को राज्य से भगा दिया है तथा उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया है। बाली से सुग्रीव की रक्षा करो। इस कार्य के पुण्य से तुम्हें भगवान श्रीराम का साक्षात्कार होगा। यही मेरी गुरु दक्षिणा है।
श्रीहनुमान गुरु का आदेश शिरोधार्य कर ऋष्यमूक पहुंचे। बाली के आतंक से छिपे हुए सुग्रीव को सांत्वना देते हुए उन्होंने कहा, ‘मेरे रहते आपको किसी से डरने की जरूरत नहीं है। सदाचार पर अटल रहते हुए भक्ति साधना में लगे रहें। एक दिन बाली का अन्त होगा।
गुरु की भविष्यवाणी सत्य हुई तथा एक दिन सीता जी की खोज में श्रीराम-लक्ष्मण वहां पहुंचे। हनुमान जी से प्रथम मुलाकात में ही भगवान राम प्रभावित हो गए। हनुमान जी ने सानुरोध श्रीराम से कहा, ‘मैं और सुग्रीव सीता माता की खोज में पूरी तल्लीनता से जुट जाएंगे, परन्तु रावण की भांति एक और दुराचारी बाली यहां रहता है, जिसने अपने भाई सुग्रीव की पत्नी का अपहरण कर रखा है। आप सुग्रीव को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाएं। इस भेंट में श्रीराम हनुमान की तर्कपूर्ण बातें सुनकर समझ गए कि कोई अत्यंत नीतिज्ञ मनीषी उनसे वार्ता कर रहा है। श्रीराम ने लक्ष्मण जी से कहा, ”लक्ष्मण, अपने राजा का पक्ष रखते समय हनुमान जी ने नीति निपुणता का परिचय दिया है। निश्चय ही ये असाधारण ज्ञान तथा भक्तिभाव से ओत-प्रोत महापुरुष हैं।प्रभु श्रीराम की बात सुनकर हनुमान जी बोले, ”भगवान मेरे अंदर कोई योग्यता नहीं है। यह तो आपकी असीम अनुकम्पा है कि मुझ जैसे अकिंचन को इतना महत्त्व दे रहे हैं।
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