रमा आजकल काफी परेशान रहती है अपनी बेटी को लेकर। उसकी बोर्ड की परीक्षा होने को हैं। दसवीं की परीक्षा पूरे जीवन की नींव होती हैं। जरा सी चूक से बहुत कुछ गंवाया जा सकता है। वह जरा सी चूक भी बर्दाश्त करने के मूड में अब नहीं है। अकेले ही तो बेटी को पाला है। कहां उसकी बेटी को पिता का साया मिला। समय का तकाजा ऐसा रहा कि रमा ने कई सहूलियों को लात मारकर अपने स्वाभिमान की खातिर सिंगल मदर बनने का फैसला किया। बोर्ड परीक्षाओं की चिंता केवल रमा को ही नहीं, बल्कि उन तमाम सिंगल मदर्स को है, जिनके बेटी-बेटा परीक्षा देने वाले हैं।

इसके पीछे के कारण
सिंगल मदर कोई महिला अपनी मर्जी से नहीं बनती। असल में, इसके पीछे कई कारण होते हैं। किसी महिला को सामान्य, परंपरागत पारिवारिक वातावरण नहीं मिल पाता तो कभी किसी स्वत:प्रेरित क्षण में प्रेम की उत्कटता की उपज को पालने का कठिन कदम मां उठा लेती है। कुछ दुर्लभ प्रकरणों में दुर्भाग्यपूर्ण दुष्कर्म के नतीजे में बच्चा ठहर जाता है। कमजोर महिला की तरह गर्भपात ना करा कर बच्चे को जन्म देने का निर्णय महिला को सिंगल मदर बना देता है। पिता का असामयिक निधन या किसी कारणवश अभिभावकों का अलगाव महिला को सिंगल मदर बनने के लिए मजबूर कर देता है। 21वीं सदी में जैसे-जैसे आधुनिकता और तकनीक के आवरण में हम ढलते गए, सामाजिक मान्यताएं बदलतीं गईं। इस सदी ने साबित किया कि महिलाएं अब अबला नहीं हैं। न तो वह मोहताज हैं और न ही केवल मोहरा। हजारों मुसीबतों के बावजूद एक नहीं, कई मां सामने आईं, जो सिंगल मदर होने के बावजूद सफल हुईं। बहुत दिलेरी का काम होता है सिंगल मदर बनने का निर्णय।
अकेले दम बच्चे का लालनपालन, यह उनका सोचा-समझा निर्णय हो या न हो, सिंगल मदर के लिए यह जिम्मेदारी अकेले वहन करना बेहद मुश्किल होता है। हालांकि, बहुतों की नजर में यह आश्चर्यजनक है कि कैसे ये महिलाएं अपने दम पर अकेले बच्चे को बड़ा कर पाती हैं और साथ ही अपने आपको मजबूती के साथ भावनात्मक और मानसिक रूप से सामान्य बनाए रख पाती हैं। उदाहरण के तौर पर, जब वे टायलेट जाती हैं, तब बच्चे को प्लेपेन में रखकर जाती हैं कि बच्चा उन्हें देखता रह सके और सुरक्षित खेलता भी रहे। इसी तरह नहाते समय भी वह उन्हें कमरे में अकेला नहीं छोड़ सकतीं। यहां तक कि जब बच्चा सो रहा हो तब भी उन्हें पास में बेबी-मॉनिटर रखकर बहुत जल्दी नहाकर वापस आना पड़ता है कि पता नहीं कब बच्चा जाग जाए?
राह में मुश्किलें
सच तो यह है कि भारत में सिंगल मदर होना इतना आसान भी नहीं है। कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, सिंगल मदर को एक बच्चे के लालन-पालन में। समाजशास्त्री डॉ. राकेश कुमार बताते हैं कि भारत में सिंगल मदर होना इतना आसान नहीं है। पूरी हिम्मत दिखा कर सिंगल मदर बनने पर भी महिलाओं को अकसर चुभते सवालों का सामना करना पड़ता है। मसलन, बच्चे के पापा अब कहां हैं, आप लोग साथ क्यों नहीं हैं? या फिर हतोत्साहित करने वाली प्रतिक्रियाएं जैसे अकेले बच्चा पालना बहुत मुश्किल है, सिर पर बाप का साया होना जरूरी है आदि। इसके अलावा स्कूल में बच्चे के दाखिले के समय या कोई सरकारी-गैर सरकारी फॉर्म भरते समय भी अभिभावक के बजाय पिता का नाम पूछा जाता है। भारत की सामाजिक स्थिति ऐसी है कि यहां किसी लड़की का बिना शादी के मां बनना अपराध माना जाता है जबकि विदेशों में ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं। हमारे समाज में शादी में परिवार की मरजी सब से अहम होती है, इसलिए शादी से पहले मां बन कर रहना बड़ी चुनौती है। इसीलिए आए दिन भ्रूण के कूड़े के ढेर में पाए जाने के मामले सामने आते रहते हैं।
एडवोकेट की राय
सीनियर एडवोकेट सरफराज ए. सिद्दीकी कहते हैं कि कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया है, जिसमें कहा गया है कि बिन ब्याही मां को बच्चे की गार्जियनशिप के लिए पिता की मंजूरी जरूरी नहीं। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि जिससे उसने शादी ही नहीं की और न ही पिता को बच्चे के अस्तित्व के बारे में कोई जानकारी है, तो उससे फिर मंजूरी क्यों ली जाए! याचिका दायर करने वाली महिला ने खुद कोर्ट में तर्क देते हुए कहा कि जब बच्चे की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी मां की है, तो ऐसे में पिता की मंजूरी की क्या
जरूरत!
मनोचिकित्सक की राय
मनोचिकित्सक डॉ. प्रकाश कुमार कहते हैं कि आप डाइवोर्सी हैं, तो यह बात अपने बच्चे को समझदार होने पर साफ तौर पर बताएं। आपके बताने से बच्चा पूरा सच जान जाएगा। बाहरी तत्वों से पता लगने पर उसके नन्हे दिल पर गहरी ठेस लगेगी। उसे छला हुआ महसूस होगा। ऐसे में बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं। ऐसे में आपका हमेशा सकारात्मक रहना बेहद जरूरी है। नन्हीं जान का मूड आपके मूड से अच्छा- खराब होता है। आप खुश रहेंगे, तो बच्चा भी हंसेगा, चहकेगा। आप दुखी रहेंगे, तो बच्चा भी यहां-वहां गुस्सा निकालेगा। बच्चे को समझाएं कि बुरे समय के बाद अच्छा समय आता है। मनोवैज्ञानिक काउंसलर निवेदिता कहती हैं कि मदर होने का यह मतलब नहीं कि आपकी पर्सनल लाइफ खत्म हो गई है। सप्ताह में एक दिन सिर्फ अपने लिए जीएं। अपनी पसंदीदा किताबें पढें, फिल्म देखें। दोस्तों के साथ शॉपिंग पर जाएं। अपनी शौक को तरजीह दें। याद रहे खुद को स्पेस देना बहुत जरूरी है।
इसके लिए केयर टेकर या बेबी सिटर की मदद लेनी पड़ेगी। अन्यथा एक-सी लाइफ से आप उकता जाएंगी। निवेदिता बताती है कि भारत में आमतौर पर सिंगल मदर होने के नाते आपका सारा फोकस बच्चे पर रहता है। बच्चा छोटा हो या बड़ा, आप उसकी हर खिदमद के लिए सदा हाजिर होते हैं। प्यार व अपनत्व की भावना इतनी असीम होती है कि बच्चा दब्बू बन जाता है। साथ ही आप बच्चे के प्रति ओवर पोसेसिव हो जाते हैं। ऐसे में आपको खुद को और अपने बच्चे को भी स्पेस देना बहुत जरूरी है, ताकि बच्चा आत्मनिर्भर बन पाए।
