सदियों से आनंद का उत्सव समझा जाने वाला कुंभ भावनाओं का वो विशाल सागर है जिसकी अनूभूति प्रशंसनीय है। दरअसल, देश विदेशों से पहुंचने वाले लाखों करोडों लोगों के लिए कुंभ मेला पृथ्वी पर होने वाला सबसे बडा आयोजन है। साधू संतों के इस मेले में देष विदेष से सन्यासियों की टोलियां अपने अपने सांप्रदायों एंव अखाडों की ध्वजाओं के नीचे अपना डेरा जमाती हैं। जंगलों, गुफाओं और पर्वतों में बरसों से अपनी भक्ति में लीन रहने वाले और जगह जगह भ्रमण करने वाले साधू संत बिना किसी निमंत्रण के इस मेले का हिस्सा बनने के लिए एकत्रित हो जाते हैं। ये उन साधुओं का समागम है, जो देष के विभिन्न भागों में निवास करते हैं।  आइए देखते हैं, कुम्भ में साधुओं के अनोखे रंग ढंग

 

विविधता का अनूठा उदाहरण:  कुंभ विविधता और विषालता का एक अनूठा उदाहरण है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पष्चिम तक, हर ओर ज्ञान की धाराएं, ध्यान की धाराएं, चेतना की धाराएं प्रवाहित होती है। कुंभ को सनातन परंपरा के प्राण कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। दरअसल, कुम्भ मेला भारत एवं विश्व के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर का एक केन्द्र बिंदू है और करोड़ों साधु संत, महात्मा और तीर्थयात्री इसी आस्था से कुम्भनगरी में पर्व के दौरान पधारते हैं। कुंभ मेला सांसारिक बंधनों से मुक्त कराने का अवसर है। 

 

आस्था के प्रतीक: आस्था और विष्वास के इस महापर्व कुम्भ  में दुनिया के कई देशां से साधुओं के आगमन का सिलसिला लगातार जारी रहता है। कुम्भ मेले में मुक्ति की डुबकी लगाने के लिए साधु संतों की टोलियां भारत से ही नहीं बल्कि विदेषों से भी आती हैं और ईष्वरीय भक्ति में रम जाती हैं। आस्था के प्रतीक पवित्र तटों में डुबकी लगाने से लेकर नदियों की आरती तक कुम्भ क्षेत्र में पूरे विधि विधान में विदेषी संत हर गतिविधि में बढचढ कर हिस्सा लेते हैं। 

नागा साधु:  कुंभ में अपने शरीर पर भस्म लपेट कर दिखाई देने वाले नागा साधु इस महापर्व का सबसे बड़ा आकर्षण होते हैं। नागा साधु कुंभ के दौरान ही नजर आते हैं, पर्वतों में रहने वाले नागाओं को गिरि, नगरों में भ्रमण करने वालों को पुरी, जंगलों में विचरण करने वालों को अरण्य, अधिक शिक्षित को सरस्वती और भारती का उपनाम दिया जाता है। इसी तरह नागाओं में कुटीचक, बहूदक, हंस और सबसे बड़ा परमहंस का पद होता है। नागाओं में शस्त्रधारी नागा अखाड़ों के रूप में संगठित हैं। नागा बनने के लिए वैसे तो कोई शैक्षिक या उम्र की बाध्यता नहीं है। नए नागाओं की दीक्षा प्रयाग, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन के कुंभ में होती है। हरिद्वार में दीक्षा पाने वाले को बर्फानी नागा, प्रयाग में दीक्षा पाने वाले नागा को राजराजेश्वर, उज्जैन में दीक्षा पाने वाले को खूनी नागा और नासिक में दीक्षा पाने वाले को खिचड़िया नागा कहा जाता है। नागा दीक्षा हमेशा जोड़े में दी जाती है। यानि दो व्यक्तियों को एक साथ दीक्षा एक ही गुरू देते हैं और उनकी उपाधियां अलग-अलग दी जाती हैं। 

लहलहाती पताका: 12 साल तक कठोर तप के दौरान साधुओं के बाल कई मीटर लंबे हो जाते हैं और ये तप तभी संपन्न होता है, जब ये कुंभ मेले के दौरान पवित्र नदी में डुबकी लगाते हैं। कहा जाता है कि स्नान के बाद ही एक नागा साधु का तप खत्म होता है। त्रिशूल, शंख, तलवार और चिलम धारण किए ये नागा साधु धूनी रमाते हैं। यह शैवपंथ के कट्टर अनुयायी और अपने नियम के पक्के होते हैं। इनमें से कई सिद्ध होते हैं तो कई औघड़। कुम्भ क्षेत्र में लगने वाले ध्वजों को पताका भी कहते हैं। जो कुम्भ क्षेत्र में दाखिल होते ही चारों तरफ लहलहाती हुई नजर आने लगती हैं। कुम्भ क्षेत्र में पताकाओं का विषेश महत्व हैं। विभिन्न अखाड़ों और साधु संतों तक पहुंचने के लिए ये पताकायें अहम् भूमिका निभाती है। भले ही देखने में अटपटी और अनूठी लगती हैं, लेकिन हैं बड़े काम की। रंग बिरंगी इन पताकाओं में दर्ज सनातन धर्म के प्रतीक चिन्ह कुछ खास मकसद के लिए होते हैं। कहीं काले हाथी वाला झंडा, कही शंख वाला झंडा, कहीं डंडे वाला झंडा तो कहीं नारियल वाला, सभी तीर्थ पुरोहितों के झंडे एक दूसरे से अलग होते हैं। कुम्भ क्षेत्र में दूर से ही नज़र आने वाले ये झंडे, जहां पंडितों के लिए ट्रेड मार्क बनते हैं, तो वहीं श्रद्धालु के लिए ये पताकायें लैंड मार्क का काम करते हैं। झंडों का कुम्भ में एक खास स्थान है। दरअसल, पुरोहितों का झंडा उनके कुल के बारे में बताता है। कुम्भ में सदियाँ निकल गई बहुत कुछ बदल गया लेकिन पंडो के झंडे नहीं बदले।

अनोखे तिलक: ध्वज पताकाओं के साथ साथ कुंभ नगरी में साधुओं के ललाट पर लगे अनोखे तिलक भी श्रद्धालुओं की आस्था और कोतूहल का विशय बने हुए हैं। कुम्भ क्षेत्र में जो बात हर साधू संत में समान रूप से दिखाई देती है वह है इनके ललाट पर लगे छापा तिलक। ये तिलक साधुओं का श्रंगार ही नहीं बल्कि पहचान का सबसे बड़ा संकेत है। साधू के ललाट पर लगे तिलक के साथ जुडी होती है साधू की साधना और परम्परा। हिन्दू धर्म में जितने मत और जितने सम्प्रदाय है उतने ही तिलक है। अगर अखाड़ों को बात करें तो शैव परंपरा के अखाड़ों में साधुओं की सबसे प्रमुख पहचान है उनके ललाट पर अंकित चन्दन की आड़ी 3 रेखाएं, जिसे त्रिपुंड कहते है। अमूमन अधिकतर शैव साधु इसी तरह का तिलक लगाते हैं। त्रिपुंड तिलक भगवान शिव के सिंगार का हिस्सा है, इस कारण अधिकतर शैव संन्यासी त्रिपुंड ही लगाते हैं। शैव परंपरा में जिनके पंथ बदल जाते हैं, जैसे अघोरी, कापालिक, तांत्रिक तो उनके तिलक लगाने की शैली अपने पंथ और मत के अनुसार बदल जाती है। शैव सम्प्रदाय की तरह ही वैष्णव सम्प्रदाय में भी संतो के ललाट पर लगे तिलक उनकी जन्म कुंडली के समान होते हैं। वैष्णव पंथ राम मार्गी और कृष्ण मार्गी परंपरा में बंटा हुआ है। इनके भी अपने-अपने मत, मठ और गुरु हैं, जिनकी परंपरा में वैष्णव तिलकों के कई प्रकार हैं। शक्ति के आराधक शाक्त तिलक की शैली से ज्यादा तत्व पर ध्यान देते हैं। वे चंदन या कुंकुम की बजाय सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

रुद्राक्ष मालाओं से ढके साधुसंत: भगवान शिव के उपासक के लिए रुद्राक्ष किसी बहुमूल्य मणि से कम नहीं होता है। ऐसे में शिव की साधना में लीन रहने वाले तमाम साधु-संत रुद्राक्ष को विशेष रूप से धारण करते हैं। कुंभ मेले में रुद्राक्ष की मालाओं से ढके हुए कई साधु-संत नज़र आते हैे। किसी ने सिर पर रुद्राक्ष की जटाएं बना रखी होंगी तो किसी ने बकायदा सिर पर ही रुद्राक्ष का शिवलिंग बना दिया होगा। पूरे शरीर में हजारों रुद्राक्ष धारण किए कई साधुओं की पहचान रुद्राक्ष बाबा के नाम से भी की जाती है। कुंभ मेले में रुद्राक्ष के अलावा जो चीज़ लोगों को सबसे ज्यादा आकर्शित करती है, वो है साधुओं की जटाएं, जहां कुछ साधु सिर के पूरे बाल मुंड़ाए हुए मिल जाएंगे, वहीं कुछ साधुओं की पहचान उनकी लंबी जटाएं ही होती हैं। साधु-संत अपनी लंबी और मोटी जटाओं की विशेष देखभाल करते हैं। कुछ साधु तो इन जटाओं का रुद्राक्ष, मोतियों, फूल-मालाओं आदि से श्रृंगार करते हैं। इन तमाम श्रृंगार के अलावा जटा-जूटधारी साधु-संत पैरों में कड़ा, कानों में कुंडल, हाथ की अंगुलियों में अंगूठी आदि भी धारण करते हैं। इसीलिए कुंभ मेले में साधुओं की वेषभूशा, उनका रहन सहन और उनके पंडाल आने वाले राहगीरों और भक्तों के आकर्शण का केन्द्र बनते हैं। 

 

कुम्भ का मूल उददेष्य भेदभाव भुलाकर भक्ति, ज्ञान और कर्म के समन्वय से आस्था की डुबकी लगाना है। कुंभ षास्त्र, साधना और गृहस्थ परंपरा का समागम है। कुंभ में आने वाले साधु संत अलग अलग संप्रदायों से जुडे रहते हैं। अलग अलग षास्त्रों का पठन करके अपने इश्ट देवता की पूजा करते हैं। अलग अलग पद्धियों से उस सत्य को जानने का प्रयास करते हैं, जिसकी खोज में वो यहां तक पहुंचे हैं।

 

धर्म -अध्यात्म सम्बन्धी यह आलेख आपको कैसा लगा ?  अपनी प्रतिक्रियाएं जरूर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही  धर्म -अध्यात्म से जुड़े सुझाव व लेख भी हमें ई-मेल करें- editor@grehlakshmi.com

 

ये भी पढ़े

श्रद्धा के साथ पढ़ें साईंबाबा की व्रत कथा, तो मिलता है शुभ फल