डॉक्टर – अभी कह तो दिया, मैं तुमसे उतारने को न कहूंगा, चलाओ भी तो।
बुद्धू ने आवश्यक सामान की एक लम्बी तालिका बनायी। डॉक्टर साहब ने सामान की अपेक्षा रुपये देना अधिक उचित समझा। बुद्धू राजी हो गया। डॉक्टर साहब चलते-चलते बोले – ऐसा मंतर चलाओ कि सवेरा होते-होते, चोर मेरे सामने माल लिए हुए आ जाये।
बुद्धू ने कहा – आप निसाखातिर रहें।
डॉक्टर साहब वहां से चले तो ग्यारह बजे थे। जाड़े की रात, कड़ाके की ठंड थी। उनकी मां और पत्नी दोनों बैठी हुई उनकी राह देख रही थी। जी को बहलाने के लिए बीच में एक अंगीठी रख ली थी, जिसका प्रभाव शरीर की अपेक्षा विचार पर अधिक पड़ता था। यहां कोयला विलास्य पदार्थ समझा जाता था। बुढ़िया महरी जगिया वहीं फटे टाट का टुकड़ा ओढ़े पड़ी थी। वह बार-बार उठकर अपनी कोठरी में जाती, आले पर कुछ टटोल कर देखती और फिर अपनी जगह पर आकर पड़ रहती। बार-बार पूछती, कितनी रात गयी होगी। जरा भी खटका होता तो चौक पड़ती और चिंतित दृष्टि से इधर उधर देखने लगती। आज डॉक्टर साहब ने नियम के प्रतिकूल क्यों इतनी देर लगायी, इसका सबको आश्चर्य था। ऐसे अवसर बहुत कम आते थे कि रोगियों को देखने के लिए रात को उस गली में आने का साहस न करते थे। समा-सोसायटी में जाने की उन्हें रुचि न थी। मित्रों से भी उनका मेलजोल न था। मां ने कहा – जाने कहां चला गया, खाना बिलकुल पानी हो गया।
अहिल्या – आदमी जाता है तो कहकर जाता है, आधी रात से ऊपर हो गयी।
मां – कोई ऐसी ही अटक हो गयी होगी, नहीं तो वह कब घर से बाहर निकलता है?
अहिल्या – मैं तो अब सोने जाती हूं, उनका जब जी चाहे आयें कौन सारी रात बैठा पहरा देगा।
यही बातें हो रही थी कि डॉक्टर साहब घर आ पहुंचे। अहिल्या संभल बैठी, जगिया उठकर खड़ी हो गयी और उनकी ओर सहमी हुई आंखों से ताकने लगी। मां ने पूछा आज कहां इतनी देर लगा दी?
डॉक्टर – तुम लोग तो सुख से बैठी हो न! हमें देर हो गयी, इसकी तुम्हें क्या चिंता! जाओ, सुख से सोओ, इन ऊपरी दिखावटी बातों से मैं धोखे में नहीं आता। अवसर पाओ तो गला काट लो, इस पर चली हो बात बनाने।
मां ने दुखी होकर कहा – बेटा ऐसी जी दुखाने वाली बातें क्यों करते हो? घर में तुम्हारा कौन बैरी है जो तुम्हारा बुरा सोचेगा?
डॉक्टर – मैं किसी को अपना मित्र नहीं समझता, सभी मेरे बैरी है। मेरे प्राणों के ग्राहक हैं, नहीं तो क्या आंख ओझल होते ही मेरी मेज़ से पांच सौ रुपये उड़ जाये, दरवाजे बाहर से बंद थे, कोई गैर आया नहीं, रुपये रखते ही उड़ गये। जो लोग इस तरह मेरा गला काटने को उतारू हों, क्यों कर अपना समझूं। मैंने खूब पता लगा लिया है, अभी एक ओझा के पास से चला आ रहा हूं। उसने साफ कह दिया कि घर के ही किसी आदमी का काम है। अच्छी बात है, जैसी करनी वैसी भरनी। मैं भी बता दूंगा कि मैं अपने बैरियों का शुभ चिंतक नहीं हूं। यदि बाहर का आदमी होता तो कदाचित मैं जाने भी देता। पर जब घर के आदमी, जिनके लिए रात-दिन चक्की पीसता हूं मेरे साथ ऐसा छल करें तो वे इसी योग्य हैं कि उनके साथ जरा भी रियायत न की जाये। देखना, सबेरे तक चोर की क्या दशा होती है। मैंने ओझा से मूठ चलाने को कह दिया। झूठ चली और उधर चोर के प्राण संकट में पड़े।
जागिया घबराकर बोली – भैया, मूठ में जान जोखिम है।
डॉक्टर – चोर की यही सजा है।
जागिया – किस ओझा ने चलाया है?
डॉक्टर – बुद्धू चौधरी ने।
जटिया – अरे राम, उसकी मूठ का तो उतार ही नहीं।
डॉक्टर अपने कमरे में चले गये, तो मां ने कहा – सूम का धन शैतान खाता है। पांच सौ रुपये कोई मुंह मारकर ले गया। इतने में तो मेरे सातों धाम हो जाते।
अहिल्या बोली – कंगन के लिए बरसों से झींक रही हूं, अच्छा हुआ मेरी आह पड़ी है। मां – भला घर में उसके रुपये कौन लेगा?
अहिल्या – किवाड़ खुले होंगे, कोई बाहरी आदमी उड़ा ले गया होगा।
मां – उसको विश्वास क्यों कर आ गया कि घर ही के किसी आदमी ने रुपये चुराये हैं।
अहिल्या – रुपये का लोभ आदमी को शक्की बना देता है।
रात को एक बजा था। डॉक्टर जयपाल भयानक स्वप्न देख रहे थे। एकाएक अहिल्या ने आकर कहा – जरा चलकर देखिए, जगिया का क्या हाल हो रहा है। जान पड़ता है, जीभ ऐंठ गयी, कुछ बोलती नहीं, आंखें पथरा गयी हैं।
डॉक्टर चौंक कर उठ बैठे। एक क्षण तक इधर-उधर ताकते रहे मानो सोच रहे थे, यह भी स्वप्न तो नहीं है। तब बोले – क्या कहा! जगिया को क्या हो गया?
अहिल्या ने फिर जगिया का हाल कहा। डॉक्टर के मुख पर हल्की सी मुस्कुराहट दौड़ गयी। बोले – चोर पकड़ा गया। मूठ ने अपना काम किया।
अहिल्या – और जो घर ही के किसी आदमी ने लिये होते?
डॉक्टर – तो उसकी भी दशा होती, सदा के लिए सीख जाता।
अहिल्या – पांच सौ रुपये के पीछे प्राण ले लेते?
डॉक्टर – पांच सौ रुपये के लिए नहीं, आवश्यकता पड़े तो पांच हजार खर्च कर सकता हूं, केवल छल-कपट का दंड देने के लिए।
अहिल्या – बड़े निर्दयी हों।
डॉक्टर – तुम्हें सिर से पैर तक सोने से लाद दूं तो मुझ भलाई का पुतला समझने लगो, क्यों? खेद है कि मैं तुमसे यह सबक नहीं ले सकता।
